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Tuesday, June 21, 2016

जख्या-दुबलू वख आज जम्युं चा (गढ़वाली कविता )

Modern Garhwali Folk Songs, Poems 

    
जख्या- दुबलू वख आज जम्युं चा (गढ़वाली कविता )

रचना --  डा नरेंद्र गौनियाल   ( जन्म  - 1961 , जमणधार , गुजुड़ु , पौड़ी   गढ़वाल  ) 
Poetry  by - Dr . Narendra Gauniyal 
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
-इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या : भीष्म कुकरेती 
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हैरी-भैरी छै पुंगड़ी जु कैइ दिन,जख्या-दुबलू वख आज जम्युं चा.
जौंकि तिबारी मा लगदी छै कछ्डी,हिन्सोली-किन्गोड़ी वख आज लगीं चा.
बुढया-बुढड़ी अर छवटा नौनि-नौना,इकुला-दुकला ही गौं मा रैगेनी.
बुढया बल्द अर ढांगी गौड़ी,कूड़ी-छनुड़ी बि रीति ह्वैगेनी.
पुंगड़ी-पटली ह्वैगेनी बांजी,सेरी-घेरी बि रुखड़ी ह्वैगेनी.
सगोड़ा-पतोड़ों मा जमदो कंडेया,छूटा-पूटा निकज्जू ह्वैगेनी.
उन्द चली गैनी क्वी द्वार ढेकी
कैन ब्वे-बाब रखीं जग्वाल.
ढुन्गु फर्कैकी क्वी चली गैनी,छट छोडि कि अपणो पहाड़.
गाड-गद्न्युं कु सुक्की गे पाणि,डांडी-कांठी बि नांगी ह्वैगेनी.
पाणि मोला कु गौं मा ऐगेनी,पंदेरा-नवल्यूं अग्यार नि रैनी.
दूध -घ्यू का सुकी गईं जळडा,दारू गौं-गौं मा मिलण लगीं.
दूधि छोडि की पीणा छन नौना,मूल़ा की कच्बोळी का दगड़ी
सड़क-इस्कूल खुली की जगों मा
सभ्यता कु विस्तार ही हूंदा .
इन्नू फूटी गे ख्वारो हमारो
सभ्यता सर्र हरचण लगीं चा.
मेरा प्रवासी भै-बन्दों सूणा,चाहे छा तुम दुन्या कैबि कूणा.
तुम ख़ुशी से कमावा अर खावा
कब्बि -कब्बि तुम पहाड़ बि आवा.
अपणि ब्वेई त अपणि ही हूंद,अपणि भूमि बि अपणि ही हूंद.
रिंगदा-रिंगदा कखि-कखी बि जैला
अन्तुरी मा त पहाड़ ही ऐला...

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