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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Thursday, June 23, 2016

ग्रामीण उत्तराखंड में प्रशासनिक भ्र्स्टाचार पर कटाक्ष करती कविता

नए तेवर और नए प्रतीकों के इस्तेमाल को देखिए 
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 किनग्वड़ा कु झुम्पा 
हरीश जुयाल 'कुट्ज ' 
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परस्यूं क्य ह्वाइ कि
मिल.. ..
रस्ता मा अयूं
एक किनग्वड़ा कु झुम्पा
त्वड़नै छाई
जनि मिल वु
लिम्हाणै छाई
त.......
वु झुम्पा
मीफर
खिरसे ग्याई
वैल ब्वाल कि
"मि सरकरि ह्वै ग्यों "
इलैकि अब मिथै क्वी
माई कु लाल
नि तोड़ सकदु
मिल ब्वाल
त्वैथै क्य परेशानी च
यि त सरासर बेमानी च
त दिदाओ !
वै किनग्वड़ा कु झुम्पा ल
जबाब द्याई.........
कि रै जुयाळ !!!!!
त्यारु बुबा कु
क्य जाणू च....
बल...
तु त
मिथै तोड़कि
सटिगि जैलि
पर.....
त्वै यि पता नी च
कि
मनरेगा मा
एक आदिम कि
ध्याड़ी........................
लटिगि... जैलि
Copyright harish juyal Kutaj