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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, April 19, 2015

पलायन कम करने की कुछ पूर्व शर्तें।

सम्पूर्ण विकास पद्धति 
                                                                          - डॉ. बलबीर सिंह रावत  

उत्तर प्रदेश के प्रवतीय क्षेत्रों से पलायन के बढ़ते जाने के कारण जो आर्थिक और सामजिक असमर्थता और समस्याएं पैदा हो गयीं थीं , उनक समाधान खुद करने के लिए अलग राज्य का आंदोलन तीव्र हुवा. राज्य मिला जितना माँगा था उस से अधिक, बिन मांगे, मिला।  १४ सालों में कितनी प्रगति हुई ?
 उच्च शिक्षा के और मोटर सड़कों के होते जा रहे बिस्तार ने पलायन बढ़ाया।  मैदानी तर्ज पर विकास हुवा कि  इंफ्रास्टक्चर बना दो, जनता अपना रोजगार खुद ढूंढ लेगी।  जो भी काम हुए उनकी गुणवत्ता ख़राब होने से मरम्मत इत्यादि के खर्चे लागत से अधिक होने लगे,  रोजगार के पुराने एकमात्र जरिये ,नौकरी , को ही आगे बढ़ाया गया और बेरोजगार युवा वर्ग की संख्या सात लाख पंजीकृत के पार पहुँच गयी और इनमे हर साल सवा लाख की बृद्धि का कोई संज्ञान नहीं लिए गया। स्वरोजगार के लिए प्रशिक्षण, कौशल विकास और सूक्ष्म,लघु,मध्य अकार के लघु उद्द्योगों को गम्भीरता से नहीं फैलाया गया। कृषि का व्यवसायीकरण करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया। उल्टे मनरेगा, सत्ता अनाज ,  बिभिन्न रियायतों और आरक्षणों ने जनता की रचनात्मक शक्ति का ह्रााश कर दिया, उन्हें स्वाधीन भारत के पराधीन नागरिक बनाने का काम किया। ऐसी उदासीनता क्यों कर हुयी ?  इसलिए की सरकारी तंत्र में नीति निर्धारकों और निर्णयकर्ताओं ने क्षेत्रीय विकास का विज्ञान पढ़ा ही नही।  इस विज्ञान की मूल प्रस्तावना , इंटरनेट से निकाल कर प्रस्तुत हैं। मैं इंटरनेट से इसलिए उद्धृरित करता हूँ ताकि लोगमेरे अपने विचारो को हलके में न लें, जैसा की हम "घर का जोगी जोगड़ा, अंत गाँव का संत "की कहावत चरितार्थ करते रहते हैं तो ये "अंत गांव के संत' क्या कहते है ? पढ़िए 
      
१. Regional development is the provision of aid and other assistance to regions which are less economically developed. Regional development may be domestic or international in nature. The implications and scope of regional development may therefore vary in accordance with the definition of a region, and how the region and its boundaries are perceived internally and externally
२.  In the development discourse, the basic needs model focuses on the measurement of what is believed to be an eradicable level of povertyDevelopment programs following the basic needs approach do not invest in economically productive activities that will help a society carry its own weight in the future, rather it focuses on allowing the society to consume just enough to rise above the poverty line and meet its basic needs. These programs focus more on subsistence than fairness. Nevertheless, in terms of "measurement", the basic needs or absolute approach is important. The 1995 world summit on social development in Copenhagen had, as one of its principal declarations that all nations of the world should develop measures of both absolute and relative poverty and should gear national policies to "eradicate absolute poverty by a target date specified by each country in its national context".
 अनुवाद है  :- 
१. क्षेत्रीय विकास वह विकास है जो आर्थिक रूप से पिछड़े क्षेत्रों के आर्थिक विकास के लिए सहायता देने से होता है।  क्षेत्रीय विकास एक देश के किसी भाग में या संसार के किसी भाग में हो सकता है।  इस लिए क्षेत्रीय विका का लक्ष्य और समस्याओं की विशिष्टता, क्षेत्र विशेष की परिभाषा को किस रूप में लिया गया है। 
२. विकास  को परिभाषित  करने में , 'मूलभूत आवश्यकता मॉडल'  केवल उन समस्याओं पर ध्यान देता है जो गरीबी दूर करने योग्य स्तर को नापने में सीमित है। यह मॉडल उन आर्थिक गतिविधियों को नजरअंदाज कर देता है जो आर्थिक रूप से , भविष्य में  (खेत्र के लोगों को ) अपना भार  स्वयं उठाने के योग्य बना सके। यह केवल गरीबी से बाहर निकाल पाने ने के लिए ही, मूलभूत आवश्यकताओं को देने का ही काम करता है। इन आयोजनों में फोकस गुजर बसर पर ही होता है।   तो भी  (यथा स्तिथि को )"नापने" के संदर्भ में ' मूल भूत आव्शयक्ता' या  'सम्पूर्ण' विकास का आशय  समझना महत्व पूर्ण है।   १९९५ में कोपेनहेगन में  सामाजिक विकास पर  जो वर्ल्ड समिट हुयी थी  इस समिट की प्रमुख घोषणाओं में  से एक   थी : ' दुनिया के सभी देशों को दोनों 'सम्पूर्ण'  और 'संबंधित ' गरीबी का आंकलन कर लेने के राष्ट्रीय नीतिया बनानी चाहियें जिन पर चल कर , एक पूर्व निश्चित समय में , पूरे देश के संदर्भ में,  'सम्पूर्ण गरीबी' दूर की जा सके '। 

"सम्पूर्ण गरीबी " केवल आर्थिक गरीबी ही नहीं है, उससे आगे सामर्थ की गरीबी भी है जिसे भी दूर करना जरूरी है , नही तो आज का गरीब गरीबी रेखा से ऊपर उठा भी दिया गया तो कुछ समय के बाद फिर से  असर्थ हो कर  फिर गरीब बन सकता है।  उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र के विकास के सम्बन्ध में असमर्थता को भी गरीबी मानना और सिर्फ और सिर्फ " सम्पूर्ण विकास" मॉडल ही लागू करना ही अकेला सार्थक विकास करना  है। क्यों कि इसके बिना आम जन मानस अपना भार स्वयं उठाने लायक बन ही नही हे सकता और "मूलभूत आवश्यकताएं" देने वाला मॉडल पीढ़ी दर पीढ़ी, चिरकाल एक चलाया नहीं जा सकता , केवल इस लिए की जो राष्ट्र अपनी आय का अधिकाँश भाग अनुत्पादक मदों में लगाता है ( और जिसमे ब्रष्टाचार देश की जड़ें खोखला कर सकता है ) वह कर्ज वान हो कर एक न एक दिन दिवालिया हो सकता है  और यह दिवालिया हो जाना किसी भी सामर्थवान नागरिक की अात्म गरिमा , स्वाभिमान और सृजनशीलता का नाश कर देता है। 

सम्पूर्ण विकास के सिलसिले को इस तरह समझ सकते हैं। एक शिशु पूरी तरह से पराश्रित होता है, स्वप्रेरणा से बढ़ने की सहायता पाता है, बढ़ता रहता है,  बालक/बालिका बन कर आंशिक रूप से, किशोरी और किशोरिया केवल कौशल विकास के लिये पराश्रित रहते हैं। वयस्क बनाने पर अपने, अपने परिवार और समाज का "भार" उठाने लायक जब बन जाता है ता है तब वह सम्पूर्ण रूप से विकसित हो गया कहा जा सकता है।  ठीक इसी प्रकार एक समूह, एक इलाका, एक क्षेत्र, एक प्रदेश और एक देश भी इन्ही  सम्पूर्ण विकास की सीढ़ियों को चढ़ता रहता है और एक दिन सम्पूर्ण रूप से विकसित हो जाता है।  तब वह  अपने देश को अन्य देशों की सहायता करने के लायक भी बना देता है। जैसे जापान. चीन, रूस योरोप, कनाडा और अमेरिका, तथा इजराइल इत्यादि विकसित देश ।
     
इस  ऊंचाइयों को छूने वाली विकास यात्रा में सरकारों की भूमिका " शिशु के माँ -बाप " की होती है , जो शिशु को  सम्पूर्ण विकास को दिशा और दशा देती है।  एक बार आम जन को "वयस्क " बना कर प्रगति और उन्नति के शिक्षर छूने लायक बनान ही  सरकारों का पावन कर्तव्य है। उत्तराखंड के संदर्भ में , उपरोक्त लेख पढ़ कर आप सब स्वयं अनुमान लगाइये की क्या हमारी सरकारों ने इस दिशा में कोई सार्थक कदम उठाये हैं ? अगर उठाये हैं तो पलायन कम क्यों नही हो रहा है,   सामर्थ्वानो की संख्या क्यों नहीं बढ़ रही है ?अगर नहीं उठाये हैं तो क्या उन्हें सम्पूर्ण विकास पद्धति सीखने  किसी विशेष  ( हमारी ?) "पाठशाला" में नहीं आना चाहिए ?