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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Tuesday, June 17, 2014

मोरी कौथिक

मोरी कौथिक 
Jay Gusain from Garhwal Facebook group 

मौरी मेले का आयोजन पौड़ी जिले में गगवाड़स्यूँ पट्टी के अंतर्गत पड़ने वाले ग्राम सभा तमलाग और कुंजेठा में किया जाता है। अगर इस मेले को समय के खांचे में मापा जाये तो यह पूरे विश्व का सबसे ज्यादा दिनों तक चलने वाला धार्मिक मेला है इस धार्मिक मेले कि अवधि छः महीने है, इसमें हर रोज दिन और रात के कुछ पहर पांडव का अवाहन किया जता है। इस मेले का शुभारम्भ २२ गते मर्गशीर्ष में होता है, तथा इसकी समापन तिथि २२ गतै अषाढ़ है। इन छः महीनों के मध्य पूर्वजों द्वारा ग्राम के मध्य एक सुंदर भैरव मंदिर के परागण में दिब्य शाक्तियों व ग्राम वासियों द्वारा पांडव नृत्य होता रहता है। इस अवधि काल में इस मेले में लाखों लोग सिरकत करके पुण्य कमाते है। यह मेला पांडव से सम्बधित है।
अब प्रश्न उठता है कि मौरी का अर्थ क्या होता है ? और इसका नाम मौरी क्यों पड़ा ? तथा इसका आयोजन ग्राम सभा तमलाग में ही क्यों होता है ? सबसे पहले मै यह स्पष्ट कर दू कि इसका नाम मौरी क्यों पड़ा। मौरी शब्द माहौरू शब्द से बना है। इस शब्द का जिक्र एक जागर में बड़े स्पष्ट रूप से होता है।
दिशा कूs माहौरू, माहौरू लगाण
बांझू माहौरू, माहौरू लगाण
भैजी चल्दू बणाण, माहौरू लगाण

इस मेले कि समाप्ति इस माहौरू शब्द की ब्याख्या को पूर्णता प्रदान करती है इस लिए हम इन दोनों शब्दों में समानता होने के कारण कह सकते है की माहौरू का सरलतम रूप मौरी है। जैसे जैसे समय गुजरता गया माहौरू शब्द गौण रूप में चला गया तथा सही रूप मौरी शब्द ने ले लिया। मौरी शब्द का अर्थ होता है दान देकर किसी बंजर इलाके को हरा-भरा करके समृद बनाना। अब सवाल यह उठता है की आखिर दान देकर किसको समृद बनाया गया। दन्त कथाओं में कहते है की पांडव की एक धर्म बहन थी जिसका नाम रूपेणा था। जिसका विवाह नारायण के साथ हुआ था पर यह स्पष्ट नहीं है की यह भगवान नारायण थे या कोई और। एक बार नरायण नदी के किसी कुंड में स्नान कर रहे थे वही उस नदी के ऊपर वाले कुंड कुसमा कुवेण नाम की एक नारी भी स्नान कर रही थी जो दिखने में बहुत सुंदर थी। कहते है की उसकी सुनेहरी लटे थी। स्नान करते समय उसकी एक लट टूटकर नारायण की ऊँगली से उलझ जाती है। नारायण इस लट को देख कर अचंभित रह जाता है। और अपने मन में सोचता है कि जिस नारी की लट ही सोने की है तो वह खुद कितनी ख़ूबसूरत होगी वह उस लट के सहारे कुसमा तक पहुचते है। तथा कुसमा के रूप सौंदर्य यौवन को देखकर हमेशा के लिए कुसमा कुवेण के हो जाते है।इस दौरान वह अपनी राज रानी रूपेणा तथा राज पाठ और अपने भावी कुलवंशों को भूल जाते है। इस समय का लाभ उठाकर कुछ राक्षस उसके राज्य पर हमला कर उसके हरे-भरे राज्य को उजाड़कर बंजर बना देते है। तथा उसके पुत्रों को तेल की कड़ाई में भूनकर खा जाते है। रूपेणा को अपने राज्य का सर्वनाश और पुत्रों की अकाल मृत्यु से बहुत बड़ा आघात पहुचता है। तब उसे इस दुःख की घडी में अपने धर्म भाई पांडव का स्म्रण आता है। और वह यह सोच कर हस्तिनापुर आ जाती है की मेरे भाई मेरी मदद जरुर करेंगे। हस्तिनापुर आकर जब वह अपनी साडी दास्तान कुंती माता को सुनती है।उसकी दुःख भरी दास्ता सुनकर कुंती उसे बचन देती है कि मै तेरे राज्य को एक बार फिर खुशहाल और समृद बनाऊंगी। तुझे जो भी दान चाहिए मै वह दान देकर तुझे अपनी बेटी की तरह विदा करुँगी। इस प्रकार रूपेणा कुंती से दान में भतीजा भिभीसैण, भतीजी भभरोन्दी, कल्यलुहार, नागमौला तथा काली दास ढोली की मांग करती है। काली दास ढोली जिसे समस्त ढोल सागर का ज्ञान था आज की तारीख में यह लोग हमारी संस्कृति के अभिन्न अंग है। अगर मै सरल शब्दों में यह कहूं की मौरी मेला का अर्थ ही ढोल बादक है तो अतिशयोक्ति नहीं होगा। अगर इनकी यह बिद्या ज़िंदा है तो मौरी मेला है अन्यथा आने वाले समय में यह मेला अपना अस्थित्व् खो देगा। इसलिए हमें इनकी इस बिद्या और इनकी कला को ज़िंदा रखने के लिए अभी से उन्चित कदम उतने होंगे जिससे हम अपनी आने वाली पीढ़ी को इस अमूल्य धरोहर को देने में सक्षम हो सके। इस प्रकार पांच पांडव अपनी धर्म बहन रूपेणा को दान में सब खुछ देकर उसे उसकी थाती तक विदा करते है। और इस प्रकार रूपेणा का राज्य एक बार फिर अन्न धन से खुशाल और समृद हो जता है।

यह इस मेले का अंतिम दृश्य होता है यह दृश्य काफी भावुक होता है।तमाम देवी देवता रांसा, ऐसा अलाप जिसमे मन करुणा में आनंदित होता है। लगते है लोगों की आँखों में अंसधरा बहने लगती है।यह दृश्य ऐसे प्रतीत होता है मनो लोग अपनी बेटी को विदा कर रहें हो। पूरा वातावरण पांडव भक्तिमय हो जाता है। लोग एक दूसरे को गले से लगते है। और फिर आने वाले बारह साल बाद इस मेले के कारण अपने पित्र भूमि में मिलने तथा इकट्ठे होने का संकल्प लेते है।

यह मेला केवल ग्राम सभा तमलाग कुंजेठा के गाँवों वालों को ही इस देव कार्य में इकट्ठे होने का काम नहीं करता अपितु गगवाड़स्यूं पट्टी के आलावा आस-पास में पड़ने वाली पट्टियों के गाँवको भी एक साथ लाने का कार्य करता है।

दूसरा सवाल यह है की यह मेला तमलाग गाँव में ही क्यों होता है। तो इस बारे में मानपति दास बताता है जब पांडव अपने वनवास काल के समय गढ़वाल के इलाके से गुजर रहे थे तो उनका कुछ दिन का वास तमलाग गाँव में हुआ था। इस कारण माता कुंती ने तमलाग गाँव को अपने ससुराल की उपाधि दी।और इस गाँव को आशर्वाद सवरूप ऐ वारदान दिया की जिस गाँव ने मेरे पुत्रों का आदर संस्कार अपने बेटों की तरह किया तो इस गाँव में हर बारह साल बाद हमारी बिशेष पूजा होगी। इसी प्रकार सबदरखाल के कुण्डी गाँव में भी पांडव ने कुछ दिन का वास किया था तो माता कुंती ने कुण्डी गाँव को अपने मायके की उपाधि दी इसलिए इस मेले में कुण्डी गाँव की अहम् भूमिका होती है। और मेले के दिन ग्राम सभा तमलाग कुंजेठा के पांडव कुण्डी के पांडव को निमंत्रण देकर उन्हें आदर पूर्वक ढोल दामो के साथ गाँव की सीमा पर उनकी अगवाई करके चांदणा चौक(मंदिर के पास) में लाते है। कुण्डी गाँव के देव पांडव और नर नारी रांसे लगाते हुए अपने नृत्य स्थल तक पहुचते है, इस दृश को हजारों लोग आस-पास कि छतों से देखकर अपने आप को धन्य समझते है। इस वक्त असे प्रतीत होता है मनो चौसठ करोड़ देवी देवता आज धरती पर उतर आयें हो। सारा वातवरण पांडव भक्तिमय हो जा जाता है। भक्तगण पूरी रात देवताओं का आशीर्वाद लेते रहते है, कुण्डी गाँव के अलावा इस मेले में गगवाड़स्यूं पट्टी के और गाँव भी सिरकत करते है। इन गाँव को ग्राम सभा तमलाग के द्वारा निमंत्रण भेजा जाता है। ऐ प्रमुख़ गांव है, गुमाई,पुर सुमेरपुर, पंडोरी, चमल्याखल, गहड़, और नेगयाना, ऐ सारे गाँव अपनी पतकाओं और ढोल दमों के साथ इस मेले में सिरकत करते है। इन गाँव का अथिति देवो भावो कि तर्ज पर गाँव में स्वागत किया जाता है। इस प्रकार भक्तजन रातभर पांडव नृत्य करते रहते है। और प्रातः काल सारे देवी देवता गाँव के धारा मगरों में स्नान करके वापस मेला स्थल चांदणा चौक में आते है। कुंती माता सभी देवी देवताओं पर रौली ज्यूंदाल (चावल कि पिटाई) लगाती है। इसके बाद हजारों नर नारी पांडव नृत्य करते हुए सुमेरपुर स्थित जंगल में चीड़ के पेड़ लेन के लिए जाते है। जहाँ इन पेड़ों पर कुछ दिन पहले ज्यूंदाल् लगाकर उन्हें चिन्हित (न्यूती) किया जाता है। ज्यूंदाल लगते ही ये पेड़ दैविक चमत्कार से खुद ब खुद कांपने लगते है। मेले के अंतिम दिन कुण्डी तथा तमलाग गाँव के भीम, बजरंबली हनुमान, और नारायण इन पेड़ों पर चढ़कर इन्हे जड़ सहित उखड़ते है। इस दैविक चमत्कार को देखने के लिए सुमेरपुर के जंगल में लाखों लोगों का जनसमूह एकत्र रहता है। इन पेड़ों को जड़ से उखडकर बिना जमीं पर टिकाये जैंती की थाती में लाया जता है। तथा इनकी पूजा अर्चना करके कुछ दिन पश्चात इन्हे नदी में बिसर्जित कर दिया जाता है। इन पेड़ों को जड़ सहित उखारड़कर लेन के पीछे भी एक दन्त कथा है।

कहते है कि पांडव के पिता पांडू राजा को मुक्ति प्रधान करने के लिए पांडव द्वारा यज्ञ का आयोजन किया गया था, इस यज्ञ को सफल बनाने के लिए उन्हे गैंडे कि खाल की अवश्यकता थी। यह खाल केवल नागलोक में ही मिलनी थी। जहाँ की रानी वासुदेवा जब पांडव के बिच यह परिचर्चा चल रही थी कि नागलोक से गैंडे कि खाल कौन लेकर आयेगा। उसी रात अर्जुन के सपने में नागलोक कि रानी अर्जुन के सपने में आती है और धनजय कि वीरता को ललकारती है। और कहती है कि अगर तू सच्चा क्षत्रीय है तो मुझे पाँसौ (चौपड़) में हराकर ले जा। अर्जुन वासुदेवा कि इस चुनौती को स्वीकार करता है। और अपने बड़े भैया से नागलोक जाने की अनुमति मांगता है। धर्मराज से अनुमति लेने के बाद जब अर्जुन नागलोक जाने के लिए तैयार होने लगता है तो द्रौपदी भी अर्जुन के साथ चलने कि जिद्द करने लगती है। अर्जुन द्रौपदी को काफी समझता है पर वह नहीं मानती आखिर में अर्जुन द्रौपदी को अपने साथ ले जाने को तैयार हो जाता है। इस प्रकार जब अर्जुन और द्रौपदी नागलोक जाने के लिए एक घनघोर वन से गुजर रहे थे तभी अर्जुन द्रौपदी से आराम करने के लिए कहता है और दोनों के दोनों दो जुड़वाँ पेड़ों के निचे आराम करने लगते है। इस बीच द्रौपदी को घनघोर निंद्रा आ जाती है। अर्जुन द्रौपदी को नींद में छोड़कर अकेले ही नागलोक चला जाता है। इधर जब द्रौपदी नींद से जगती है तो अर्जुन को वहाँ पर ना पाकर समझ जाती है कि अर्जुन मुझे छोड़कर अकेले ही नागलोक चला गया है। तब वह उन दोनों जुड़वाँ पेड़ों को वचन देती है कि अगर मेरा अर्जुन सुख शांति से वापस घर हस्तिनापुर आ जायेगा तो मै तुम्हें जड़ सहित अपनी थाती में ले जाकर तुम्हारी बिधि विधान से पूजा करवांगी। कुछ समय पश्चात जब अर्जुन रानी वासुदेवा को पांसों में हराकर गैंडे कि खाल के साथ वापस हस्तिनापुर आता है तब द्रौपदी इन दोनों पेड़ों को जड़ सहित उखाड़कर इनकी पूजा करवाती है। तथा गैंडे कि खाल से यज्ञ सफल बनाकर राजा पांडु कि आत्मा को मोक्ष प्रदान करते है l

मौरी मेला में पहले छः महीने का पण्डो तमलाग गाँव और मेले के सम्पति के बाद छः महीने कुण्डी गाँव में नाचते है। कुण्डी गाँव में दो केले के बृक्ष को जड़ सहित उखाड़ कर लाया जाते है।

कहाँ जता है कि कुछ मौरी पहले हमारे पूर्वज गैंडे कि जगह भेड़ को बरछा और भालों से मारते थे पर अब लोग काफी जागरूक हो गए है तथा अब भेड़ कि बलि देने कि वजाह उसकी पूजा करके उसे ज़िंदा वापस घर ले आते है

इस मेले में अहम् भूमिका ढोल वादक निभाता है। कुछ समय तक इस मेले के मुख्य आकर्षण मूली दास, खिलपत्ति दास थे जिन्होंने कई वर्षों इस मेले में ढोल वदाक की भूमिका निभायी। अब खिलपत्ति दास जी लड़का मानपत्ति दास तथा दो अन्य दास चन्दन दास (फकीरा) और प्रेम दास, इस कार्य को भली भांति निभा रहे है। इन सब को ढोल सागर के आलावा पण्डो वार्ता का अच्छा ज्ञान है।