उत्तराखंडी ई-पत्रिका की गतिविधियाँ ई-मेल पर

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

Wednesday, June 2, 2010

कुछ भुज्जी जो अब गढ़वाल मा नि बणदन या भौत ही कम बणदन

Garhwali Cuisines, Garhwali Recipies, Garhwali Vyanjan, गढ़वाली व्यंजन
कुछ भुज्जी जो अब गढ़वाल मा नि बणदन या भौत ही कम बणदन
भीष्म कुकरेती
गढ़वाल कुमाओं हिमाचल प्रदेश मा अकाळ जरुर पड़दो छौ पण भुखमरी नि होंदी छे किलैकी बौण (जंगळ )
होण से खाणक मिली जान्दो छौ . कुछ भुजी इन छे जू भुखमरी को टैम पर जादा खाए जान्द छे
जन कि:
ग्वीराळ का फूलों का टूसा (Buds without petals) , तिमला का पतों का टूसा
यूँ टूसों तैं काटिक हरी भुजी जन बणये जान्द . कभी कभी टूसों तैं मुग्राड़ी (मकई को आटा ) दगड़ मिलैक झोळ बि बणये जान्द छौ
Copyright Bhishma Kukreti, Mumbai, bckukreti@gmail.com, India 2010

शहरूं मा मूल़ी को सुख्सा

भीष्म कुकरेती
आम गढ़वाली जो गौं मा रयां छन तैं पट च मूल़ा को सुख्सा कन बणये जान्द अर सुख्सा को स्वाद कनु होंद
सुख्सा को अर्थ होंद Dehydrated Vegetables . अब शहरूं मा मूल़ा त मिलदु नी च त मूली को सुख्सा बणये जै सक्यांद
बाजार बिटेन जिन्नी बड़ी मूल़ी ल्ह़ाण चयांद
मूल़ी तैं ध्वे धाई क सूखे द्याव . फिर मूली तैं तिर्छां अर म्वाटो काटी द्याव जन भुज्जी का बान कटदन . कटीं मूल़ी फर ज़रा सि हल्दी अर लूण
लगे द्याव . फिर चों मा अर घाम मा चार पाँच दिनूँ तलक सुखाणद जाओ जब तक सुखी नि जाओ जब मूल़ी को पाणी सुखी जाओ त समजी जाओ सुख्सा तैयार ह्व़े गे द्वी चार मैना तक सुख्सा ठीक ही रौंद
सुख्सा की भुज्जी बणाणो बान सुख्सा तैं एकाद घंटा पाणी मा भिजाओ फिर जन चायणो च तन भुज्जी बणाओ
सिल्वट मा थींची क सुख्सा की तरीदार भुजी बि बणी सकद
सूखी भुजी बणाणाई त सूखी भुजी बणावो . पिण्डाल़ो ( अरबी ) का दगड बि सुखी या थिन्चौणी / भुजी बणदी
मैणु मसाला कथगा डाळण यू आप पर निर्भर च . हाँ भ्न्गुल का बीज ह्वाओ त मजा कुछ हौरी होंद
Copyright bckukreti@gmail.com, Bhishma Kukreti India