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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, June 2, 2010

अशांत हूँ !!!

सूरज ने ,
अपनी तपन से मुझे
कई बार तपाया है
तपा हू, जला हूँ
फिर भी शांत हूँ !

लेकिन,

तुम्हारे...., एक अबिश्वाश के ,
घात के आघात ने
मेरे मन की बेदना को
चीखौ में बदल के रख दिया
चीख रहा हूँ ,, बेचैन हूँ , करारहा हूँ
अशांत हूँ !

पराशर गौर
जून २ ,२०१० समय ६ १२ पर