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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Monday, June 14, 2010

हे चुचा तू

प्यारा पहाड़ ऐजा,
ऐगि मौळ्यार,
डांडी काँठ्यौं मा,
फ्योंलि, बुरांश हैंसणा छन,
घुघती हिल्वांस बासणा छन,
छोया कू ठण्डु पाणी पीजा,
हिंसार, काफल खूब पक्याँ,
खैजा हे चुचा, छक्किक खैजा.

प्यारा पहाड़ ऐजा,
कौथगेर मैना ऐगिन,
ये बैसाख कौथिग लगणा,
स्वाळि, पकोड़ी, प्यारी पापड़ी,
आलू पकोड़ी, जलेबी की घेरी,
खैजा हे चुचा, छक्किक खैजा.

प्यारा पहाड़ ऐजा,
घनघोर बस्गाळ लग्युं छ,
अपणा बाँठा की,
काखड़ी, मुंगरी, गोदड़ी, चचेन्डी,
गलगला पक्याँ आम, लमेन्डी,
खैजा हे चुचा, छक्किक खैजा.

प्यारा पहाड़ ऐजा,
ह्युन्द की बार ऐगि अब,
पंचैती मंडाण लग्युं छ,
चार पुर्कणा फुर्र नाची जा,
कंडाळी कू साग, झंगोरू,
गौथ कू गथ्वाणि,
करकरा अंगारौं की आग तापी,
खाजा बुखणा खैजा,
खैजा हे चुचा, छक्किक खैजा.

पहाड़ प्यारू मुल्क हमारू,
सब्बि धाणि यख प्यारू,
परदेश मा न घुट तू,
बारामास की रंगत चुचा,
आँखौंन अपणा देखि जा.

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित, यंग उत्तराखंड पर प्रकाशित)
दिनांक: ११.६.२०१०,
"दर्द भरी दिल्ली" प्रवास से
(ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी, टिहरी गढ़वाल)