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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, June 2, 2010

मुक्ति !

गड्वाली कहानी

शहर का बीचो बीचम एक जगह छे , जखमाँ एक जगहम सात रस्ता मिल्दं छा ! वखमा , बिचरू एक बुढया बल्द कमजोर हालत माँ कै दिन से पुड्यु छो ! आंदा जादा लोग वे थै घास /पाणी दे दीदा छा ! पर, अबत वो , नत घास खै सकणु छो , अर ना पाणी ही पे सकणु छो ! बिचरू अपना जीवन का आखरी दिन छो गिणु ! मून चाणू छो पर, पर मौत छेक़ि , ध्वारै निछेई आणी ! इनी हलतौ माँ भी वेका दम निछा जाणा ! वो बिचरू ज्यादै छो झिकुणु ! बाट बटोई , गली मौहला का आंदा जांदा लोग , वेपर तरस खादा रैनी अर दागदा -दगडी भगवान से ये बिनती भी करदा रैनी क़ि, हे भगवान्....!!!!!!!! कै ना कै तरह से येथै मुक्ति मिली दे !

एक रोज स्ब्युन एक मीटिंग करी, क़ि, क्यों ना , हम सब धर्म का लोग मिली अपणा अपणा धर्म का अनुसार पूजा पाठ करा ! हवे सकदक़ि इन करण से येथे मुक्ति मिलिजौ ! सी साब .. हिनुवालौंन पडा जी बुलाया उन अपणा मन्त्र बाचा कुछ नि ह्वे... ! उ बल्द उन्या उनी ! फिर मुसलमान का मौलबी जी ऐनी , उन भी जू कुछ कन छो काय ! अभी वो उन्या उनी ! इसैयुं पधारीजी बुलाया ,! उन भी , अपणा हिसाब से जू कनु छों कया पर कुछ ना.. ! युकी दुआऔ से क्वी फर्क नि पड़ी ! उ बिचरू औरी भी तडफुणु !

लोग क़ि भीड़ छे लगी ! हिन्दी,मुस्लिम ईसाई का सात सात औरी भी कई धर्म का लोग छा पूजा पाठ छा कना क़ि तभी समण बाटी गंगू बाई आई ! वींन देखि क़ि , आज ये चौराह माँ इतका लोग, अर, वो भी सब धर्मो का ! थोड चकित भी ह्वे और घबराई भी, क़ि , किले होला ये लोग य्ख्म ! गंगू बाई ये रस्ता से थोड़ा दू रमा रैंदी छे ! लोग वीका धंधा करणा का बजह से वीसे घर्णा करदा छा ! जनी वा नाजीखु आई ! लोग रस्तौ से छांटा हूँण बैठा ! तब वें देखि क़ि एक बल्द बिचरू च तड़फुणु ! वा खड़ी ह्वे ! जनी वीं नजर घुमाई ! इने उने देखी .. पडाजी दिखी नि ! मौलबी जी दिखिनी ! पाधरी जी दिखिनी ! स्ब्यु थै हाथ जोड़ी बोली ... " आपल, अपणा अपणा अनुसार दुआ माग्याली ... , मित आपकी नजरो माँ गिरी छो !
आपका वास्ता पतित छो ! अगर इज्जाजत ह्व़ात मीभी एका वास्ता दुआ मागू ! कैल कुछ नि बोली ..., सब चुप .... ! गंगूल आसमानी तरफ हाथ उठै क़ि बोली .. हे इश्वर , तूत जणदी छे, क़ि मी पतिता छो .. लेकिन अगर भूल्या बिस्र्याम मिन भी क्वी अछु काम कै होलू , नेकी कै होली त, प्रभो .. तुम मेरी वे अच्हा कामै दुआ मीना ..... !!! बल्कि ये बलद पे लगी ज्या अर ऐका प्राण निकली जै ! जनी , वींन य बुल्दै अपणा आँखा बंद करीनी उनी वे ब्ल्द्ल भी दम देनी ! ये द्रश्य देखी , सबी लोग हैरान छा ! सब्यु क़ि नजर वीक पर छे अर वा उठी अर छड़ी अपणा घर क़ि तरफ !

पराशर गौर
जून २ २०१० स्याम ६ ४८ पर