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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Thursday, March 28, 2013

गढ़वाली में अनुदित साहित्य परम्परा


भीष्म कुकरेती 
   किसी भी भाषा के साहित्य में अनुवाद का महत्वपूर्ण स्थान होता है। अनुवाद से साहित्य को नये नये विषय, नई शैली, नये विचार, नई संस्कृति , अनुभव मिलते हैं।
अनुवाद विषयी साहित्य में कई धारणाएं व सिद्धांत साहित्य में बताये गये हैं जसे अनुवादक को  दोनों भाषा का महति ज्ञान होना आवश्यक है। जिस भाषा  में अनुवाद किया जा रहा है उस भाषा का अनुवादक को पूरा ज्ञान होना चाहिए। अनुवादक को अनुवादित विषय का घन ज्ञान बांछित है। अनुवादक को दोनों भाषाओं में अंतर और सम्बन्ध का ज्ञान भी आवश्यक है। एन्ड्रयु चेस्टरमैन, फिलिप्स कोड ,इतामार इवान जौहर, रोज गाडिज, ई जेंतजलर , टी हरमान्स, जेरमी  मुंडे, नाम फुंग  चैंग, जी टौरी, इंड्रे लीफवेरे , सुसान बासनेट, आदि समीक्षकों ने कई सिद्धांत प्रतिपादित किये और अनुवाद सम्बन्धी सिद्धांतो  की समीक्षा भी की है।      
          गढवाल में प्रिंटिंग व्यवस्था ब्रिटिश काल से आई और गढवाली इस विधा में पारंगत व धनी  भी नही थे तो यह आश्चर्य नही है कि आधुनिक गढ़वाली गद्य की शुरुवात तो अनुदित साहित्य से ही हुयी। गढवाली में अनुदित  साहित्य को निम्न भागों में बंटाना सही होगा:
अ- अन्य भाषा साहित्य का गढवाली में अनुवाद 
ब- गढवाली साहित्य का अन्य भाषा में अनुवाद   

                                अ- अन्य भाषा साहित्य का गढवाली में अनुवाद 
 
   अन्य भाषाओं का गढ़वाली में अनुदित साहित्य को इस प्रकार विभाजित किया जाना ही श्रेय कर है 
१-अन्य भाषाइ कविताओं का गढ़वाली कविता में अनुवाद   
२- अन्य भाषाइ कविताओं का गढ़वाली गद्य में अनुवाद 
३-अन्य भाषाओं के गद्य व पद्य लोक साहित्य का गढवाली में अनुवाद 
४- अन्य भाषाओं के धार्मिक, आध्यात्मिक  व दार्शनिक साहित्य का   गढवाली में अनुवाद 
५- अन्य भाषाओं की कहानियों का गढवाली में अनुवाद
६- अन्य भाषाओं के नाटक का अनुवाद या नाट्य रूपांतर 
७- अन्य भाषाओं के समाचारों व समाचार पत्र हेतु गढ़वाली में विभिन्न अनुवाद 
८- अन्य भाषाओं की अन्य विधाओं का गढवाली में अनुवाद 
 ऐसा माना जाता है सन  1820 के करीब  क्रिस्चियन मिसनरीयों ने बाइबल का अनुवाद किया था। सन  1876 में 'न्यू टेस्टामेंट' का अनुवाद प्रकाशित हुआ।
 गढ़वाल के प्रथम डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर गोविन्द घिल्डियाल ने संस्कृत शास्त्रीय  पुस्तक 'हितोपदेश' का पांच खंडो में अनुवाद किया जो डिवेटिंग क्लब अल्मोड़ा से 1902 में प्रकाशित हुआ।

                          गढवाली भाषा में काव्यानुवाद 
 
सन 1920 में कुला नन्द स्वयंपाकी ने 'जर्जर मंजरी' का अनुवाद 'गढ़भाषोपदेस' नाम से छापा   
सन चालीस से पहले बलदेव प्रसाद नौटियाल ने वाल्मीकि रामयण  का 'छाया रामायण ' के नाम से गढवाली में अनुवाद किया 
 
सन सैंतालीस से पहले तुलाराम शर्मा ने गीता के 'कर्मयोग' भाग का गढवाली में अनुवाद किया  
भोला दत्त देवरानी ने गीता के  कुछ भागों का   गढवाली में अनुवाद किया 
भोला दत्त देवरानी ने कालिदास के मेघदूत का अनुवाद किया जो बाडुळी में छपा। 
सन सैंतालीस से पहले परुशराम थपलियाल ने तुलसी कृत रामयण के कुछ भागों का अनुवाद किया 
अबोध बंधु बहुगुणा  द्वारा सन 1965 में गोविन्द स्रोत्र का 'भज गोविन्द स्रोत्र नाम से किया गया 
'मेघदूत' का अनुवाद 'मेघदूत छान्दानुवाद ' के नाम से सन 1971 में धर्मा नन्द जमलोकी ने  प्रकाशित किया 
गढ़वाली काव्यानुवाद में प्रखर स्वतंत्रता सेनानी आदित्यराम दुदपुड़ी सर्वाधिक योगदान है।  उन्होंने निम्न अनुवाद साहित्य रचा 
 
1979 में आदित्यराम दुदपुड़ी ने उपनिषद का अनुवाद इशादी उपनिषद के नाम से अनुवाद छपवाया 
1990 में उपनिषदों का अनुवाद 'प्रश्नादि  छ उपनिषद 'के नाम से आदित्यराम दुदपुड़ी का अनुवाद साहित्य प्रकाश में आया 
1991में आदित्यराम दुदपुड़ी ने नीतिशतकम का अनुवाद गढ़ नीतिशतकम नाम से अनुवाद किया  
1991में ही आदित्यराम दुदपुड़ी ने चाणक्य नीति का अनुवाद गढ़ चान्यक  नीति के नाम से प्रकाशित किया 
1992 में आदित्यराम दुदपुड़ी द्वारा विदुर नीति का नौवाद किया गया 
1992 में पन्द्रह उपनिषदों -शिव-संकल्पादि का अनुवाद आदित्यराम दुदपुड़ी ने छापा   
आदित्यराम दुदपुड़ी द्वारा 1993 में छान्दोगेय  उपनिषद का अनुवाद सामने आया 
1993 में वृहदारण्यक   उनिषद का अनुवाद  गढ़ वृहदारण्यक नाम से दुदपुड़ी द्वारा प्रकाशित किया गया 
आदित्यराम दुदपुड़ी  1995 में मनुस्मृति का गढ़ मनुस्मृति का अनुवाद प्रकाशित हुआ 
1987 में डा नन्द किशोर ने श्रीमद भगवत गीता का अनुवाद किया 
डा नन्द किशोर ढौंडियाल ने कुछ उपनिषदों का अनुवाद प्रकाशित किया 
1980 के दरमियान अबोध बंधु बहुगुणा ने टैगोर रचित गीतांजली के कुछ पदों का अनुवाद किया 
1985-87 के करीब पंडित वैदराज पोखरियाल द्वारा गीता का अनुवाद अलकनंदा में श्रीख्लाव्ध प्रकाशित हुआ 
1989-90 में जयदेव  द्वारा गीता का अनुवाद गढ़ ऐना में श्रृंखला बद्ध  प्रकाशित हुआ 
2001 में चिट्ठी में मोहन लाल नौटियाल का गीता के कुछ खंडो का  अनुवाद प्रकाशित हुआ 
2012 में भीष्म कुकरेती ने दार्शनिक शकर रचित आत्मा का अनुवाद नाटक विधा में रस और रस्वादन (रस अर रस्याण )  स्पष्ट करने के लिए किया 
2012 में गीतेश नेगी द्वारा अन्तराष्ट्रीय स्तर के उर्दू , हिंदी व  विदेशी कवियों   काव्यानुवाद इन्टरनेट माध्यम में छपे। गीतेश नेगी का यह कार्य गढवाली भाषा के लिए साहित्यकारों के मध्य अत्त्याधिक सरहनीय कार्य माना गया।  
 गीतेश नेगी ने नवाज देवबंदी (सहारनपुर ), मिर्जा ग़ालिब , कातिल और  निदा फाजली की गजलों का गढवाली में पद्यानुवाद प्रकाशित किया 
सुमित्रा नन्द पन्त के दो कविताएँ मोह और पर्वत प्रदेश में पावस का गढवाली में काव्यानुवाद किया 
सीगफ्राइड सासून की  विश्व युद्ध विभीषिका आधारित  ,विश्वप्रसिध कविता 'द सर्वाइवर्स, हाउ टु  डाई' का अनुवाद कन कै मोरण' नाम से किया 
वाल्ट हिटमैन की कविता 'ओ कैप्टेन ओ कैप्टेन ' का 'ओ कप्तान  ओ कप्तान ' नाम से किया .
नोबेल पुरुष्कार विजेता विजेता जर्मन कवि गुटुर ग्रास की इजरायल समस्या सम्बन्धी कविता 'व्हट  मस्ट बि सेड' का सुन्दर काव्यानुवाद किया 
युवा कवि गीतेश नेगी का प्रसिद्ध कवि रुडयार्ड किपलिंग, अल्फ्रेड टेनिसन, की  कविताओं का अनुवाद सराहनीय है 
                                 लोक कथा अनुवाद 
 
 आदित्यराम दुदपुड़ी  ने पंचतन्त्र की कथाओं का अनुवाद 'कथा कुसुम ' नाम से प्रकाशित की 
भीष्म कुकरेती ने  पंचतन्त्र के दस कथाओं का अनुवाद गढ़ ऐना में 1989-1900 के मध्य प्रकाशित किये 
भीष्म कुकरेती ने मिश्री, चीनी और जर्मनी लोक कथाओं का अनुवाद 1989-1900  के मध्य गढ़ ऐना में प्रकाशित किये। कुछ कथाएँ इंटरनेट पर भी पोस्ट हुयी हैं  
                         अन्य भाषाओं की कथाओं का गढ़वाली में अनुवाद 
 
 भीष्म कुकरेती ने जर्मनी , यदीज (प्रवासी यहूदियों की भाषा ), चीनी कथाओं का अनुवाद इन्टरनेट में छपवाया 
भीष्म कुकरेती द्वारा विद्या सागर नौटियाल की हिंदी कथा दूध का स्वाद ' 'का अनुवाद  'दूधो स्वाद ' से किया जो  खबर सार (2012) में प्रकाशित हुई,
भीष्म कुकरेती ने प्रसिद्ध उर्दू कथाकार सदाहत मंटो की कथा 'सौरी ब्रदर' का अनुवाद 'सौरी भुला' नाम से इन्टरनेट माध्यम में प्रकाशित की।  
 
                अन्य भाषाओं के  नाटकों का गढ़वाली में अनुवाद 
 
 
प्रेम लाल भट ने अ नाईट इन इन का अनुवाद ' किया जिसका मंचन 'चट्टी की ek  रात ' से हुआ 
इसी नाटक अ नाईट इन इन का अनुवाद भीष्म कुकरेती द्वारा 'ढाबा की एक रात ' नाम से इन्टरनेट माध्यम में 2012 में प्रकाशित हुआ
राजेन्द्र धषमाना ने मराठी नाटक का अनुवाद 'पैसा ना धेला नाम गुमान सिंह थोकदार' के नाम से किया जिसका मंचन भी हुआ 
कश्मीरी नाटक 'रिहर्शल ' का भी रूपान्तर गढवाली में हुआ और दिल्ली में मंचित हुआ 
कालिदास कृत अभिज्ञान शाकुंतलम का अनुवाद डा पुष्कर नैथाणी    किया जो कोटद्वार में मंचित हुआ 
 
                 अन्य भाषाओं के समाचारों व समाचार पत्र हेतु गढ़वाली में विभिन्न अनुवाद 

  गढ़वाली भाषा में पहला दैनिक होने का श्रेय 'गढ़ ऐना ' को जाता है जो देहरादून से सन 1987-1991 तक प्रकाशित होता रहा।
 दैनिक समाचार हेतु कई सामग्री अनुवाद करना लाजमी होता है।
गढ़ ऐना की टीम इश्वरी प्रसाद उनियाल (सम्पादक ), क्षितिज डंगवाल, राजेन्द्र जुयाल , प्रकाश धश्माना रोज न्यूज एजेंसी या अन्य  स्रोत्रों से प्राप्त हिंदी , अंग्रेजी समाचारों व लेखों का अनुवाद गढवाली में करते थे और इस तरह गढवाली दैनिक प्रकाशित होता था।
इस तरह के अनुवाद में  में सबसे अधिक योगदान राजेन्द्र जुयाल का रहा है। गढ़वाली साहित्यि राजेन्द्र जुयाल के महान योगदान को सदा याद करता रहेगा 
 
                            अन्य अनुवाद 
 
   डा रानी  लिखित गढवाली रंगमंच हिंदी लेख  का भीष्म कुकरेती द्वारा अनुवाद चिट्ठी पत्री व गढवाल सभा के नाट्य महोत्सव  स्मृति पुस्तिका में प्रकाशित हुआ 
 
                             ब --गढवाली साहित्य का अन्य भाषा में अनुवाद
   
 गढवाली साहित्य का अन्य भाषा में अनुवाद का कार्य छित पुट ही हुआ है।
कन्हया लाल डंडरियाल  की काव्यकृति 'अंज्वाळ पुस्तक का ' का अनुवाद हिंदी में घना नन्द  जदली ने किया  
भीष्म कुकरेती ने कई लोक मन्त्रों और लोक गीतों का भावानुवाद अंग्रेजी में किया जो कि  गढवाली साहित्य की अंग्रेजी में समीक्षा हेतु की गयी 
गिरीश सुंदरियाल का  कविता  संग्रह मौऴयार   में  गिरीश सुंदरियाल की कुछ कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद परिशिष्ट में छपा है।
 इस तरह हम पाते हैं की अन्य भाषाओं में संस्कृत काव्य, धार्मिक -आध्यात्मिक -दार्शनिक व नीतगत विषयों का गढ़वाली भाषा में सर्वाधिक अनुवाद हुआ। विदेशी भाषा के साहित्य  का अनुवाद भी अब शुरू हो गया है। आशा की जाती है गढवाली में अनुदित  साहित्य अपनी अलग पहचान  बनाने में सफल होगा 
 
 Copyright@ Bhishma Kukreti 29/3/2013