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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, April 4, 2012

अब अपण ब्व़े-बुबा कुण रूणि छे ?A Garhwali Short Story

A Garhwali Short Story
 
                              अब अपण ब्व़े-बुबा कुण रूणि छे ?

                                                          भीष्म कुकरेती

अलग अलग सुनहरा पिन्जड़ो मा द्वी झंण कळु अर कळुयाण जोर जोर से झगड़ना छ्या. बिगळयाँ बिगळयाँ
पिंजड़ा नी होंदा त जीतू तोता न तोत्याणिक फंकर/पंख चूंचन चूंडि चूंडिक उपाडि देण थौ. सरेला कळुयाणि तैं मौक़ा मिल्दो त
वीन अपण कजे जीतू तोता क सांक चूंचौ न पकडिक फगोसैक चित्त मारी दीण थौ. उन त कळु अर कळुयाण मा अथा प्यार होंद
पण इख शहर मा पिंजडों मा बन्द होण से कळु- कळुयाणियूँ ढब इ बदले गे. अब ओ गांवक गँवड्या बण्या/जंगळि कळु/तोता नि रै गेन.
अब त ऊं तैं अर्बन पैरेट बोलीक भटये जांद. अब ट यूँ मा तोतारोळी नि होंदी बल्कण मा कवारोळी, कखड़ाट, कुकुर-बिरळु तरां झगड़ा होंद.
अब त बौटनी-जूलोजी क खुजनेर बि खौंळयाणा छन बल यो जानवरूं मा बक्कि बनि बनिक अडेपटेसन /अनुकूलन होणु च.
जीतू कळु न ब्वाल," ये अपण बुबा क सैणि ! अब अपण बुबा कुण या ब्व़े कुणि रुणि छे ? जब हम गौंवूं जंगळ मा क्या सुन्दर छ्या , मेनत से अपणि
जिंदगी काटणा छया . त त्वे पर यि जळन्त हुंईं छे बल कन तेरी दीदी अर मौसी मजा से शहरूं मा सुनहरा पिंजडों मा ग्युं कि रुट्टी, बासमती भात,
शहरी अमरुद अर कुज्याण क्या क्या खाणा छन! अर ले पोड़ी तू म्यार पैथर अर मी बि त्यार भकल्योणयूँ मा औऊं अर शहर ऐ ग्यों .सि छंवां पिंजडों मा बन्द."
सरेला कळुयाणि न तोत्याणि भौण मा ना बिरळयाणि भौण मा चिडचिड ह्वेको जबाब क्या छकीक गाळी दे दिनी," ये अपणि बैणिक मैसो ! ह्यां मुर्दा मोरल त्यारो.
मी त अजाण छौ. जानानी जाती छौ. तेरी ब्व़े नि जैन कबि सोराग! तू त मरद मानिक छौ. त्वी बि त उठी अर मि तै लेकी सीधा ऐ गे इख ! "
जीतू कळु न बि अपणि कज्याणि बांठकि धौरी दे,' ये खड्यरीं करैन्क सोराग नि जैन तेरी ब्व़े, नरक जोग इ रै तेरी नानी जौन त्वे तैं भकलाई बल गौं का जंगळ से
भलु त शहरूं सुनहरा पिजड़ा छन."
सरेला कळुयाणि न बि अग्यौ बरखाई," हूं ! गाळी दींद तेरी जीब बि नि फुक्याणी ! अर जो त्यार बुबा इख पैलि बिटेन ऐ गे छौ ? वांक क्या?"
जीतू कळु न ब्वाल," अरे पण मि बोलणु छौं बल क्या पाई हमन इख. बस खान पान अर अपण गोसीक ठाट बाट की बडै करण . बस हर द्फैं
गोसी, गोस्यणि अर मालिक मालिक्याणिक दगड्यो , रिस्तेदारूं चापलूसी करणो अलावा हमन द्याखी क्या च. जरा चापलूसी बन्द कारो त
गोसी, गोस्यणि अर वूंको नौनू हम पर कठगन न घचांग लगै द्यावन. हमन बि सरा जिन्दगी शहरी खान पानऐ खातिर य़ी ब्वाल," माई मास्टर्स आर
द बेस्ट मास्टर्स . दे आर लवली ह्युमन बीइंग्ज .दे आल लव्ज अनिमल्स एंड पेट्स."
सरेला कळुयाणि न जोर से ब्वाल,' पण इखमा सरा दोष म्यारो त नी च ?"
जीतू कळु न ककड़ाटि जवान मा ब्वाल," अरे या बी जिंदगी कि टैम पर खाओ, टैम पर बिजो अर मालिक माल्किणो सलाम ठोको. इ त चलो
ठीक छौ. पण हम दुयूं तैं प्रेम करणो बि मालिक माल्किणि न टैम फिक्श करी दे भै! अरे हम त्वाता-कळु छंवां क्वी मनिख थुका छंवां कि मनिखों तरा इ .."
इथगा मा दुसरो कमरा से एक जवान त्वातो क गुसैली अवाज आई," मौम डैड ! यू ब्लडी ओल्ड पैरटस ! स्टॉप यौर क्वेरलिंग. माई मास्टर इज
डिस्टरबड एंड फीलिंग एक्युट इरिटेसन. इथगा सालों से इख शहर मा छंवां पण आदत वोई गंवड्या .अकल नाम की चीज त यूँ ओल्ड लोगूँ मा छै नी च."
सरेला कळुयाणि न रूंद रूंद बोली," एक यि छौ हमारो वो बि मालिकौ नौनो दगड रैक हमारि भाषा बोली बिसरी गे. "
जीतू कळु न रुणफति ह्वेक ब्वाल,' ह्यां! कमबख्त ! अपणि भाषा बोली बिसरी जांद त क्वी बात नि छे. ओ त अब हमारो मालिकौ नौनु दगड़
बिगची बि गे. छ्वटो मालिक चरस पीन्दो अर यू हमारो राजकुमार बि अब चरस को धुंवा सुंगण ढबे ग्ये. अब त जब तलक यू निर्भागी तै चरसौ
धुंआ नि सूंगो त ए ऐबी तै निंद नी आन्द. ऊ द्याख नी च परसी छ्वटो मालिक इख नि छौ त ये तैं चरसौ गंध नी मील त सरा रात कनो कणाणु राई.
द्वी तीन दै त ए पर बौळ बि पोड़. "
सरेला कळुयाणि न त रूंद रूंद ब्वाल," अर ये कुण कुछ ब्वालो त खाणै कटोरी अर पिंजड़ो दिवल्यूं पर मुंड फोडिक आत्महत्या करणो धमकी दीन्दो."
इथगा मा जीतू तैं भैर एक डाळ मा जणी पछ्यणी अवाज सुणै दे," ये जीतू! ये जीतू ! "
जीतू बर बबराई बल या त वैको बुबा जी क अवाज च.जीतू न बोली," बुबा जी तुम अर...?"
सरेला कळुयाणि न सिवा लगान्द पूछ,' ए जी ! यि तुमर लटलूं अर फंकरूं रंग तै क्य ह्व़े. त्वातों रंग कख हरची?"
जीतुक बुबा गुंडू कळु न जबाब दे,' अरे बुड्या ह्व़े ग्यों अर क्या च! ये शहर मा अब त्वातों क रंग बि बेढंग ह्व़े जान्दन. "
जीतू कळु न पूछ," तुम त वो एक क्वी जू/चिड़ियाघर मा गेट पर लोगूँ तैं बथान्दा छ्या बल " गो देयर, गो राईट .."
गुंडू कळु न जबाब म ब्वाल ," अरे ऊं जू वळु न निकाळि दे बल अब मि बुड्या ह्वे गेऊं त अब मेरो आकर्षण खतम ह्व़े गे. अर बस मी अब रस्ता मा
ऐ गेऊं .अरे जब मी छ्वटु छौ अर गाँ मा छौ त मनिख इनी अपण लाचार बुड्या बल्दुं तैं बौण खदेड़ी दीन्दा छया कि उख बाग़-ढीराग बुड्या बल्दुं तै खै जावो."
जीतू कळु न पूछ,' अब ?"
गुंडू कळु न कळकळि भौण मा बोल," अब त तेरो इ सहारा च. "
जीतू कळु न त ना पण वूंको चरसी नौनु न जबाब दे ," ग्रैंड पा हमारे यहाँ तो जगह हो ही नहीं सकती बिकॉज माई मास्टर डज नॉट लाइक ओल्ड पैरट ऐट आल.
औन द कोंट्रेटरी ही हेट्स ओल्ड पैरट्स. वो तो मैं नये नये ढंग से अपने यंग मास्टर की चापलूसी करता हूं तो तब जाकर मोंम-डैड यंहा रहते हैं ..नो वे ! यू कांट लिव विद अस."
जीतू कळु न बि हुन्गरी पूज अर ब्वाल," हाँ स्यू सच बोलणु छ . हमी जाणदवां कि हम इख कै कुगति मा छंवां!"
गुंडू कळु न रुंदी भौण मा बोल," अरे जौं त कख जौं ?"
सरेला कळुयाणि सल्ला दे, " ए जी ! इन कारो अपण मुलक चली जाओ . उख बड्या ससुर जी क नौन्याळ छन . गाँ वळ छन त कै डाळ मा जगा ह्व़े इ जाली. अपण डाळ छन अपण जगा च "
गुंडू कळु न उड़दा द उड़दा बोली," हाँ अब ड़्यारम इ जगा बचीं च. पण अब मी गौं जोग रयुं बि नि छौं .पण क्या कन "
जीतू कळु न ब्वाल," ह्यां वो बडा जीक नौनु फत्तू दा खुणि सिवा बोली देन अर स्वांरी बौ कुण बि .."
सरेला कळुयाणि न बोल,: अर स्वांरी जिठाण मा बुलिन बल मी वीं तै भौत याद करदू .."
गुंडू कळु अपण भतीजो फत्तू अर वैकी ब्वारी स्वांरी क बारा मा घड्यान्दो घड्यान्दो गौं तरफ उडी गे. अब फत्तू अर वैकी ब्वारी स्वांरी को इ सारा छौ.
उख गाँ क जंगळ मा फत्तू अर वैकी कज्याणि स्वांरी मा महाभारत छिड्यू छौ.
फत्तू कळु न गाळी दींद दींद गुस्सा मा ब्वाल,' ए रांड ! चुप रौ हाँ . बिंडी नि बोल"
स्वांरी कळुयाणि न बि फिटकारी बोल बोलिन, "रांड ह्वेली तेरी बैणि , तेरी ब्व़े , तेरी भतीजी.."
फत्तू कळु न ककड़ाट कार," अरे पर इथगा साल ह्व़े गेन पण त्यार कुणकुण लग्युं रौंद बल शहर किलै नी गेवां.शहर किलै नी गेवां "
स्वांरी कळुयाणि न जबाब दे ," ह्यां जै पर बितदी त वो इ बोल्दो. अब जब मनिख गौं छोड़िक भाजी गेन त अब मुंगरी, फल कख छन रयाँ गौंऊं मा .
अर फिर गाँऊँ मा मनिख नी रयाँ छन त कथगा इ चखुलोँ साखी (जनरेसन) इ ख़तम ह्व़े गेन त हमर लैक फलदार ड़ाळ इ ख़तम ह्व़े गेन. पैल गूणि बांदर
बि कमी छ्या त फल मीली जांदा छया अब त गूणि बांदर हम कळुऊँ खुणि कुछ छोड़दा इ नीन . फिर काण्ड लगीन ये लैंटीना घास पर हम कळुऊँ लैक
डाळ जमणी इ नि दीन्दो , अब त मीलों जैक हम कळुऊँ लैक एक दाणि फल मिल्दन. त मैं तै रोष नि आणों?. द्याखो ना कक्या ससुर जी, जीतू द्यूर, सरला द्युराणि
शहर मा कनो मजा करणा छन. "
फत्तू कळु तै अपण कज्याणि स्वांरी कळुयाणि क पित्याण पर दया बि आँदी पण अब यीं उमर मा वो कारो त क्या करो. वैक द्वी लौड़ छन त शहर मा पण दुयूंक भाग फूटीन कि
गरीब गुरबों ड़्यार छन. अन्क्वेक खाणो बि नि मिल्दो बल. अर इख मनिखों जाण से त्वातों, घुघती अर कथगा इ चखुलोँ साखी इ निपटण लगी गे जां से
बौण जंगळ मा इन डाळ उपजण लगी गेन कि त्वातों जन चखुलोँ को खाणा मा कमी ऐ गे . मेनत से बि खाणो नि मिल्दो. पैल एक बात औरी छे इखाक कळुऊँ मा परिवार बाद अर सहकारौ
जन गुण छ्या. पण अब खाणो कम होण से अनुकूलन क बल पर यूँ कळुऊँ मा बि व्यक्तिवाद ऐ गे .
त इन मा स्वांरी कळुयाणि न पित्याणि छौ.
यूँ द्वी झणो मा इन झगड़ा होणु लग्युं इ रौंद .
स्वांरी कळुयाणि न ब्वाल, ' शहर मा हुंद त मजा से रौंदा, ठाट से रौंदा.."
इथगा मा गुंडू कळु ऐ गे. फत्तू न अपण काका नि पच्छ्याणि. गुंडू कळु न फिर बताई कि वै तैं क्य ह्व़े ग्याई.
फत्तू कळु न अपण व्यथा कथा लगाई कि अब गौंऊं जंगळू मा क्या कुहाल छन.
अर पैथराँ स्वांरी कळुयाणि न करकरो ह्वेक तड़तड़ी भाषा मा ब्वाल," द्याखो जी . अब ज्योर छंवां पण बुलण तो पोडल इ. अब इख तुमारो क्यांको ल़ीण दीण?.
इथगा सालुं से हम ये बांठो सैंकणा छंवां , जग्वळणा त अब यीं जगा पर हमारो अधिकार च. तुमारि हिस्सेदारी त वै बगत इ खतम ह्व़े गे छे जब तुम
ईं जगा छोड़िक शहर चली गे छ्या. जाओ जख जाणै जाओ। अब हिस्सेदारी बात करील्या त ल्वेख्तरी ह्वे जाली"
गुंडू कळु समजी ग्ये बल अब भयात की हिस्सेदारी बात करण बेकार इ च .
अर बुड्या गुंडू कळु एक नई अंतहीन यात्रा पर उडी गे .
Copyright : Bhishma Kukreti