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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Tuesday, January 1, 2013

राजपथ पर बेटियां



बस कुछ दिन बाद ही
देश का गौरव दिखाने के लिए
चमकेगा-गूंजेगा
गर्व से सीना चौड़ा कर-
कदम से कदम मिलकार चलेगा देश
राजपथ पर....।
लेकिन
यह गूंज-यह चमक
क्या सच में सीना चौड़ा कर
कदम से कदम से मिलाकर
चल पाएगें आज राजपथ पर....
उस राजपथ पर
जिस पर आज बेटियां-
रो रही हैं...चिल्ला रही हैं
लहूलुहान हो रही हैं
कड़कड़ाती ठंड में...ठंडे पानी की बोछारों से-
लड़ रही हैं...
पुलिसनुमा कुछ ख़ूंख़ार भेड़ीयों के वार से
घायल हो रही हैं-
फिर भी चल रही...निरंतर चल रही है
कभी ना रुकने वाली यात्रा पर
राजपथ पर...।
जिन बेटियों का भविष्य
संवर रहा था...विश्वविद्यालों में
जो जीवन की तलाश में
निकली ही थीं....अभी-अभी..घोंसले से अपने
जिन्होंने खुद के मायने को समझना शुरू ही किया था
अभी-अभी....
वह बेटियां भी आज सब कुछ छोड़कर-
चल रही हैं राजपथ पर....।
और लोग पूछ रहे हैं
इतनी सारी बेटियों...
क्यों चल रही राजपथ पर?
...और बेटियां...
हाथों में मशाल...मन में विश्वास
आखों में आग...लिए...
चीख रही हैं...चिल्ला रही हैं...
बस अब और नहीं...किसी हाल में नहीं
जागो...हर हाल में जागो
उठो गहरी नींद से...आवाज़ के मिज़ाज को बदलो...
खोल दो पट्टी न्याय की देवी की आंखों से
और...दिखाओ
कि बेटियों अब झूकेगीं नहीं...रूकेगी नहीं
नहीं होगा खिलवाड़-अत्याचार उनके साथ अब
न सहेगें वह अपमान अब...
बस अब नहीं...किसी भी कीमत पर नहीं...
अब इस राजपथ पर,तब तक गूंजती रहेगी आवाज़ बेटियों की
तब तक चलती रहेंगी...बेटियां...।
जब तक मानुष रूपी भेड़ियों को,नहीं चढ़ाया जायेगा...
सूली पर...
जब तक नहीं सुनायी देगी...इन बेटियों की आवाज़
खुद को लोकतंत्र का-
रहनुमा मानने वाले...सफेदपोश...धारियों को
तब तक चलती रहेंगी...गरज़ती रहेंगी आवाज बेटियों की
राजपथ पर...।

- जगमोहन 'आज़ाद'