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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, January 30, 2013

उत्तराखंड की नयी औद्योगिक नीति


-प्रस्तावक: डा .बलबीर सिंह रावत


किसी भी प्रदेश के विकास के लिए उद्द्योग और कृषि दो प्रमुख क्षेत्र हैं जिन को संतुलित महत्व देना आवश्यक है। उत्तराखंड के परिपेक्ष में औद्योगिक विकास ही वोह प्रयास है जिस से अधिक आशा है और सही औद्योगीकरण से इस उद्देश्य की पूर्ति हो सकती है।

उत्तराखंड ऐसा प्रदेश है जिसमें अधिकांस भाग पर्वतीय है . और पर्वतीय भाग में मैदानी उद्द्योग विकास नीति से सिडकुल और बड़े बड़े कल कारखाने नहीं लगाये जा सकते। मैदानी भागो के उद्द्योग केवल नौकरी देते हैं, और वोह भी कानून के जोर से की एक निश्चित प्रतिशत जगहें उत्तराखंडियों को ही दी जांय। इस से पर्वतीय क्षेत्रों से पलायन बढ़ता जा रहा है। कच्चा माल अधिकतर बाहर से आता है, उत्पादन कर केन्द्रीय सरकार ले जाती है। तो उत्तराखंड के हिस्से में क्या आता है?

पर्वतीय क्षेत्रों में नाना प्रकार के कच्चे माल हैं, विशिष्ट प्रकार की कृषि और प्राकृतिक उपजें हैं, असीमित मात्रा में काष्ट है, विश्व प्रसिद्ध मंदिर हैं, जलवायु है, अत्यंत प्रभावशाली और आकर्षक द्र्श्यावालियाँ हैं। स्वास्थ्य वर्धक आबोहवा है। लगनशील मानव संसाधन है , सड़कों का जाल है , बिजली बना सकने की असीमित संभावनाएं हैं। और इन्ही के बूते पर और इन्ही के गलत दोहन और पर्वतीय मानव संसाधन की अव्ह्व्लना के कारण पलायन करने की विवशता की मार न झेल पाने के कारण ही तो प्रथक राज्य का सफल आन्दोलन चला था।

राज्य बन गया, 12 साल हो गए। पर्वतीय विकास में औद्योगिकीकरण को नकारा ही गया है क्यों हुआ ऐसा, क्यों हमारे अपने ही नेता , मंत्री , सब वही देसी मॉडल के पीछे भाग रहे हैं? क्यों का उत्तर आप ढूँढिये । 

मेरे निम्न सुझाव है:-

1- हर ब्लोक स्तर पर , जहां सबसे सुगम और सुविधाजनक हो, एक औद्योगिक केंद्र बने जहा से घर घर तक कुटीर उद्द्योग के प्रशिक्षण, उत्पादन और संकलन की व्यवस्था हो हो।

2- प्रशिक्षण के लिए प्रशिक्षक प्रशिक्षण केंद्र और , हो सके तो एक वोकेशनल हांई स्कूल भी हो जिसमे इच्छुक जूनियर हाई स्कूल पास विद्यार्थी पढ़ सकें,हो , यही पर महिला उद्योग प्रशिक्षण की सचल व्यवस्था भी हो जो उन्हें मशीनो से आकर्षक डिजाइनों वाली बुनाई कढाई सिखा सके, स्थानीय कच्चे मालों से प्रयट्टकों के और अन्य बाजारों के लिए हाथों हाथ बिक सकने वाली वस्तुएं बना सकें। उद्देश्य होना चाहिए की प्रति परिवार सालाना आय 100,000 रुपये के स्तर से ऊपर जा सके। तभी पलायन रुकेगा और राज्य बनाने का सपना पूरा होगा।

3- प्रशिक्षण, टेक्नोलोजी के लिए अवकास प्राप्त विशेषज्ञों की सेवा ली जा सकती है और देश के नामी गरामी संस्थानों से सहभागिता की जा सकती है।

4- इसी प्रकार लघु उद्द्योग भी गाडी सड़कों के साथ साथ यथोचित स्थानों में , स्थानों की विशिष्टताओं के अनुरूप लगाए जा सकते हैं, जिनमे हर वोह उद्द्योग लग सकता है जिसका कच्चा मॉल आस पास बहुलता में उपलब्ध है या कराया जा सकता है

5- जल विद्युत् के छोटे छोटे स्टेशन हर नदी पर, 3-4 गाँव के समूह के लिए , 10-10 या 15-15 किलोमीटर की दूरी पर लगाए जा सकते हैं, जिससे कुटीर और लघु उद्द्योगों को पावर दी जा सकती है, यह 60% गाँव के लिए और 40% प्रदेश के लिए के नियम से होना चाहिए।

6- धार्मिक प्रयट्टन के साथ रास्ते के अन्य मंदिर, दर्शनीय स्थल, और सांस्कृतिक कार्यक्रम को भी जोड़ने से इस उद्द्योग को बढ़ावा मिल सकता है।

7- अन्य प्रयट्टनो को मेलों, खेलकूद प्रतियोगिताओं, फेस्तीव्लों और फल मौसम में "तोड़ो खरीदो" के तथा अन्य आकर्षणों से समर्द्ध किया जा सकता है।

8- काष्ठ उद्द्योग की अपार सम्भावनाये हैं, बशर्ते कि नयी औद्योगिक नीति में काष्ठ प्रसंस्करण से ले कर नौक्ड डाउन रूप में बिभिन्न प्रकार के फर्नीचर बनाने के कारखाने, लकड़ी बहाव वाले नदी किनारों में लगाए जा सकें . यह बिलकुल नया क्षेत्र है उत्तराखंड के लिए और इसमें देहरादून के बन अनुसंधान संस्थान में एक वुड तेक्नोलोजी का , W. Tech डिग्री स्तर की पढाई का प्रबंध किया जा सकता है। और कई कोर्स चलाये जा सकते हैं।

9- आवश्यकता है गम्भीर्ता से पर्वतीय औद्योगिकीकरण की नीति बनाने की और उसमे सम्बंधित बैज्ञानिको , विशेशाग्याओं की सलाहकार समितियां बना कर उनसे मार्गदर्शन लेने की, अकेले राजनीतिज्ञ और नौकरशाह यह काम नही कर सकते क्योंकि वे किन्ही दुसरे क्षेत्रों के विशेषग्य है .

10- पर्वतीय औद्योगिकीकरण एक महा अभियान है और इसमें जिससे जितना योगदन हो सकता उसका स्वागत और समावेश होने से ही उद्द्येश्य की पूर्ती होगी , केवल प्रतीतात्मक विकास का कुअसर सब जगह नजर आ रहा है। आगामी 5 सालों में नयी पर्वतीय विकास नीति का सुप्रभाव हर गाव मे नजर आएगा तो हे नीति को सफल माना जाएगा।

डा। बलबीर सिंह रावत।