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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Monday, January 14, 2013

पहाड़ों में औद्योगिकीकरण (डा रावत)


डा . बलबीर सिंह रावत
मैं अपने अनुभव के आधार पर कह सकता हूँ की अभी तक उत्तराखंड की औद्योगिक संभावनाओं का कोई सार्थक आंकलन ही नहीं हुआ है। केवल मैदानी भागों में सिडकुल बनाने को ही पूरे राज्य का औध्योगीकर्ण समझा जा रहा है। मेरे बिचार से उत्तराखंड की उद्योग संबंधी संभावनाए निम्न क्षेत्रों में हैं:

1. नईं टेक्नोलोजी के: हलके वजन वाले बड़ी कीमत के उत्पाद, जैसे बिभिन्न इलेक्ट्रोनिक उपकरणों के चिप, महंगे और प्रेसिजन ऑप्टिक्स उत्पाद, सर्जरी के नाना प्रकार के उपकरण,सौर ऊर्जा के उपकरण इत्यादि।
2. घरेलू और उद्योग में काम आने वाले ऊंची दामों वाले साजो सामान, तथा कल पुरजे, अति धन्याड्यो हेतु कुटीर वस्तु उत्पादन

3.उन उद्द्योग , ऊनी कपडे और बुनाई वाले वस्त्र जो गुणवता में सर्वश्रेष्ट हो (खाड़ी बोर्ड वाले निम्न श्रेणी के माल बनाते हैं) इसके लिए उच्च परिस्कृत टेक्नोलोजी का समावेश,

4. फल उद्द्योग की इतनी सम्भावानाये हैं कि आधे भारत को विभिन्न प्रकार के मौसमी और बेमौसमी फलो से पूरी आपूर्ति की जा सकती है, बशर्ते की प्रति पेड़ उत्पादकता को आज के 2710 किलो प्रति हेक्टेयर के स्तर से दुगुना कर पाय। फल प्रसंस्करण उद्द्योग की असीम संभावनाए है। इसी तरह, सब्जियों और फूलों की खेती और प्रसंस्करण भी खासे अच्छे क्षेत्र हैं, जैतून , हजेल नट और अन्य प्रजातियों के नए भूमध्यसागरीय जलवायु वाले उत्पाद भी उगाये जा सकते हैं। सब्जियों के सुक्से ( vacuum dehydrated ) बना कर अच्छी कीमत पर बेचे जा सकते हैं।

5. बीज और पौध उत्पादन को भी औद्द्योगिक स्तर पर स्थापित किया जा सकता है। और यह एक प्रचलित कृषि आधारित कुटीर उद्योग के रूप में फैलाया जा सकता है।

6.सगन्ध के फूल, पत्ते और सुगन्धित तेलों का उत्पास्दन प्रसाधन और फार्मेसी उद्द्योगों के लिए बनाए जा सकते हैं
7.खेती से जडी बूटियाँ उगाकर, और जंगलों से इकट्ठा कर के आयुर्वेद की दवायें बनाने के उद्द्योग, बिभिन्न प्रकार के अचार, मुर्र्ब्बे , जेम, अवलेह इत्यादि के उद्द्योग लगाकर प्रदेश को स्वास्थ्य प्र्यत्तन से जिदा जा सकता, है।
8.पशु पालन में भेड़ मरीनो, अंगोरा खरगोश तथा तिब्बती बकरी से उन उद्द्योग, संकर गायों से दूध उद्द्योग की अपार संभावनाएं हैं , इसी तरह शहद उद्द्योग, मत्स्य उद्दोग ( शीतल जल की ट्रोट समेत) भी बढे लाभ दायक धंदे बनाए जा सकते हैं। .

9.बन उद्द्योग ओह क्षेत्र है जहां उत्तराखंड में अन्य उद्योगों से अधिक संभावनाए हैं, और येही क्षेत्र सबसे अधिग उपेक्षित भी हो रक्खा है। हम बजाय गोले और बालन की लकड़ी बेचने के अगर प्रसंस्करण और फर्नीचर उद्योग लगा कर, knocked down स्तिथि में उच्च कोटि का फर्नीचर बनाने के मध्यम स्तर के उद्द्योग लगा ले तो कई कई हजारों परिवारों को स्थायी रोजगार मिल सकता है। पेड़ कटान, ढुलान और पुनह वनीकरण अपने आप में एक उद्द्योग बनाया जा सकता है। वन उत्पाद जैसे गीन्ठी, तैड़ू, डंफू,पत्यूड पात का एकत्रीकरन व् विपणन और वन रिफार्म आवश्यक है

10. पर्यटन उद्द्योग ने प्रदेश में जड़ें जमा तो ली हैं परन्तु अभी प्रति प्रयत्त्क शुद्ध आय बहुत कम है। इस उद्द्योग को कुटीर व हस्तशिल्प उद्द्योग तथा साहसिक खेल और घुमंतू उद्द्योगों से जोड़ दिया जाय तो प्रति आगंतुक 2500-3000 रुपये अधिक की ऐसी आय हो सकती है जिसके 80-90% भाग प्रदेश में ही रुका रहेगा।

11.जल संसाधन उद्द्योग से मेरा आशय छोटे छोटे घराट स्तर के विदुत उद्द्योग से है, जिसकी 100% बिजली आस पास के 2-3 गाँव की अपनी हो और इस बिजली से कुटीर और लघु उद्द्योगों की इकाइया चलाई जा सकें और किसान अपने खाली समय में परिवार की आय बढ़ा सकें। इसी बिजली से सिंचाई और पेय जल समस्या का समाधान भी आसानी से हो सकता है।

अब सवाल बाधाओं का है। सबसे बड़ी बाधा है, half hearted approach की . औली का स्की क्षेत्र याद कीजिये। किसी अग्रिम सोच और पहल करने वाले नौकरशाह के दिमाग की उपज आज दुनिया के शीत कालीन खेल जगत में प्रचलित नाम है। लेकिन एक ही हुआ फिर वही "10 से 5" की ( केवल वेतन लेने की मनोबृति)। जब संकल्प ले कर कुछ नया, कुछ लाभदायक, कुछ हर एक के लिए , वोह सब कुछ , जिससे बृहद रूप से प्रदेश के पर्वतीय क्षेत्रों का औद्द्योगीकरण तेजी से हो जाय, की मानसिक स्थिति और team work की भावना नहीं होगी बाधाएं बढ़ती रहेंगी।

तो मित्रो , मनन कीजिये, सुझाव दीजिये , जोडिये-घटाइये और अपने अपने स्तर पर ग्रामसभा के सरपंच से ले कर मंत्रियों, सचिवों, निदेशकों तक हर संभव साधन से पहुचाइये अपनी-हमारी बात . यही इंटरनेट का सार्थक उपयोग है।

बलबीर सिंह रावत dr.bsrawat28@gmail.com