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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Tuesday, August 26, 2014

गढ़वाली की विशेष लिपि हेतु एक और प्रयत्न

गढ़वाली की लिपि संस्कृत का अनुशरण करती  ब्राह्मी से देवनागरी हुयी।  
गढ़वाली की समस्या देवनागरी लिपि में एकमात्र यह है कि गढ़वाली के विशेष स्वर ध्वनि के लिए देवनागरी में कोई लिपिबद्ध अक्षर नही हैं और जब लेखक देवनागरी में गढ़वाली में लिखता है तो  लेखक /लेखिका वह नहे लख पता जो वह अभिव्यक्त करना चाहता है। 
यही कारण है की गढ़वाली भाषा के बहसः विद डा नन्द किशोर ढौंडियाल ने गढ़वाली के लिए अलग लिपि रचित की। डा ढौंडियाल ने सर्वप्रथम इस नई लिपि को 2004 में शैलवाणी के वार्षिक अंक में प्रकाशित किया। किन्तु विद्वानो ने कोई प्रतिक्रिया नही दी।  कुछ सम्मेलनों में गढ़वाली के लिए नई लिपि पर विचार मंथन भी हुआ। डा ढौंडियाल की रचित लिपि संलग्न है। 
कुछ समय पहले देहरादून से श्री मेहरोत्रा जी ने भी लिपि रचना का प्रयोग किया जिसे कुछ स्वार्थी साहित्यकारों ने लताड़ दिया . 

अब श्री आशिस कुकरेती ने भी गढ़वाली हेतु एक नई लिपि रचित की है। आशीष कुकरेती का कहना है कि देवनागरी टाइप करने में कठिन है और कम्प्यूटर में तो अति कठिन है। 
कोडिफाई करने में उनकी लिपि सरल है 
किसी भी भाषा की अपनी लिपि हो तो लाभ ही होगा श्री आशीष द्वारा रचित लिपियान भी संलग्न हैं 
विद्वानो  से अनुरोध कि अपने विचार दें