Discussion on Himalayan Development and Environment Protection
भ्यूंचळ , भूचाल , भूकम्प नरेंद्र मोदीक बि नि सुणदु !
खरोळया ::: भीष्म कुकरेती
ब्याळि १८ /२ /१५ कुण , IIT मुंबई मा हिमालयी सरोकारौक सयाणा जणगरा पद्मश्री डा शेखर पाठक का , There is only one Himalaya ' चर्चा सुणणो मि बि ग्यों। हिमालय पर भौत सा नयो ज्ञान मील। अर जन कि डाक्टर पाठकक बुलण च बल हिमालय तैं जाणणो बीस जिंदगी बि कम छन तो हिमालय तैं एक दिन मा नि समजे जांद।
चर्चा से एक बात जाण कि डा शेखर गंभीर विषय तैं हंसोड्या अर चबोड़्या भौण से भली तरां से समजै दींदन।
डा साबक एक वाक्य मि तैं बड़ो गंभीर लग - बल भूकम्प अपण प्रधान मंत्रिक बि नि सुणदु अर बाढ़ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की बि नि सुणदि।
बड़ी गंभीर बात सरल शंब्दुं मा बुलण सिखण हो तो डा शेखर पाठक से सीखो।
भ्यूंचळ , भळक (भूस्खलन या बाढ़ ) अर बरफबारी वास्तव मा कैक नि सुणदन पर म्यार ददाजी बुल्दा छा कि भ्यूंचळ , बरखा , भळक हमर बूड खूडूं सुणदा छा किलैकि हमर बूड -खूड पृथ्वी की सुणदा छा। विकास का अर्थ हर सौ साल मा बदल जांदन। विकास की चाहत तब बि छै जब हमरबूड खूडूं मा एक लंगोट छे अर एक छुटि कूटि अर बीस पचीस परिवार मा एक सबुळ। पर्यावरण पर घचांक तो तब बि लगदी छे पर तब देखादेखी अपण लौड़ -गौड़ नि मारे जांद छा जन कि आज हमर पत्रकार चीन की देखादेखी करिक बुल्दन कि विकास का वास्ता हिन्दुस्तानी हिमालय की आत्मा पर कुलाड़ी चलावो।
असल मा अब प्रकृति की क्वी सुणण वाळ इ नी च। जु प्रकृति बचाण वाळ मुहावरा , श्रुति , पहेली छे जु हम तैं प्रकृति दगड़ सामजस्य करण सिखान्दा छा ऊँ शब्दुं तैं त अंग्रेजी अर हिंदी खै गे तो धरातल पर प्रकृति दगड़ सामजस्यकरण कनकै करण ?
एक उदाहरण च पैल हमर जिना बच्चा लोकगीत गांदा छा - सरगा दिदा पाणी पाणी ! अर अचकाल बाड़मेर , कच्छ का रण मा दूधीक बच्चा तैं मास्टर रटांद - रेन रेन गो अवे , कम अगेन !
एक उदाहरण दींदु। पैल हरेक हिमालयी गांवुं मा पाणि बचाणो बान भौत सा कौंळ /तरकीब अपनाये जांद छे। अब जब बिटेन नळ ऐन गां वाळ बिसरी गेन कि नळ पर पाणि तबि आल जब सरा गांवका जलस्रोत्र बच्यां राल। आज हम भूलि गेवां कि एक जलस्रोत्र का दुसर जलस्रोत्र से पुटकि पुटक अचूक संबंध हूंद। . एक जलस्रोत्र की राग बिगाड़ो तो दुसर जलस्रोत्र पर कुप्रभाव पड़द । पर जब समाज अपण जुम्मेदारी सरकार पर छुड़ण लग जावो अर सरकार स्थानीय समाज तैं बगैर पूछिक विकासवादी कदम उठाण लग जावो तो ना ही विकास का फायदा ऊँ तैं मिल्दो जौं तैं वु विकास चयेणु च अर पर्यावरण बि नि बचद।
एक उदाहरण दींदु। पैल हरेक हिमालयी गांवुं मा पाणि बचाणो बान भौत सा कौंळ /तरकीब अपनाये जांद छे। अब जब बिटेन नळ ऐन गां वाळ बिसरी गेन कि नळ पर पाणि तबि आल जब सरा गांवका जलस्रोत्र बच्यां राल। आज हम भूलि गेवां कि एक जलस्रोत्र का दुसर जलस्रोत्र से पुटकि पुटक अचूक संबंध हूंद। . एक जलस्रोत्र की राग बिगाड़ो तो दुसर जलस्रोत्र पर कुप्रभाव पड़द । पर जब समाज अपण जुम्मेदारी सरकार पर छुड़ण लग जावो अर सरकार स्थानीय समाज तैं बगैर पूछिक विकासवादी कदम उठाण लग जावो तो ना ही विकास का फायदा ऊँ तैं मिल्दो जौं तैं वु विकास चयेणु च अर पर्यावरण बि नि बचद।
वास्तव मा हमन अपण पांरपरिक भौण छोड़ी दे अर शिक्षण , भक्षण, उपभोग सब उधार ले ऐन। इनि एक शब्द च पर्यावरण। पर्यावरण की सबसे बड़ी बेज्जती रोज हूंद। सुबेर मंत्री जी पर्यावरण बचाणो कसम खांद अर स्याम दैं मंदाकिनी गदनम होटल कु शिल्यानाश करदो।
हम हरेक बातुं तैं अतिशय करदा। विकास करण तो पर्यावरण की सम्पूर्ण छुट्टी अर पर्यावरण बचाण तो विकास तैं भूमि मा गबै दीण। आज अतिशय विकासवादी अर अतिशय पर्यावरणवादी ह्वे गेन। महात्मा बुद्ध की धरती मा मंझम -मध्यम चलो की विचारधारा ही समाप्त ह्वै गे।
पर्यावरण अर विकास का मध्य सामजस्य से ही मानव सभ्यता बचलि। मंझम सिद्धांत का बल पर आज विकास अर पर्यावरण रक्षा से ग्रॉस नेसनल हैपीनेस (GNH ) प्राप्त ह्वे सकद
19/2/15 , Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai India
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