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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Monday, May 7, 2012

Garhwali folk Mantra and Folk songs


कुमाऊं व गढ़वाल में प्रचलित दूध फूल को मंत्र
ॐ नमो गुरु को आदेश, जै गुरु कि विद्या तै गुरु को नमस्कार ,
माता पिता को नमस्कार, ऊपर आकाश को आदेश, जगत धरती को आदेश,
दिन को सूरज को आदेश, रात की चन्द्रमा को आदेश, महादेव पार्वती को आदेश, श्री गोपीनाथ भैरवनाथ को आदेश,
गोपी गणों को आदेश, आठ पटरानी को आदेश, अनजानी को पुत्र हनुमंत वीर को आदेश, केशरी का पुत्र
पवन को जायो तुम को आदेश, तुरखणि का पुत्र वीर मैमन्दा तुम को आदेश, गुरु गोरखनाथ को आदेश,
गुरु से विरल को आदेश, गुरु शंभू नाथ को आदेश, चार पीर चौरासी सिद्धों को आदेश, नौ कुलिया नागों को आदेश,
स्वर्ग इंद्र को आदेश, कुंती का पुत्र पाँचों पांडवों को आदेश, श्री कृष्ण जी कि मुरली को आदेश, आग्यांकारी राणी बलाद्कारी
परंच करी, इस मनुष्य कि विथ्या संगारी , काली का पुत्र काल भैरव , बटुकनाथ भैरव, नाद बुध भैरव को आदेश, अब एका कवर
तेरह से मोच छिन , पांच से पोताला छिन, अजरथ परी , गजरथ परी, लाल परी , गोलाबा परी, जदरथ परी, स्याह परी,
काली परी , नीली परी , हरी परी , जाग रै बौणयों, इंद्र का तख्त जाग, कैलाश ब्रिच्छ कामधेनु का अमृत जाग, कु कुंडाली का छैला
जाग, मंदार का फोल जाग, फलों का बिछौना जाग, पाठ पट का मार कि कन्या तेज छन, मखमल मैकाने छन, नाना प्रकार का
सुवाऊ छन, डाली का दरवाजा जाग, गुरु का ध्यान जाग, माता का सत जाग, वेणी गिरी नारसिंग का ध्यान जाग,
गुरु का ध्यान जाग, जौला का जोत जगाना जाग, कांठा सार का मेला जाग, श्रीकृष्ण की द्वारिका जाग, गंगा गोदावरी को आसन जाग,
गंगा, गोदावरी , भागीरथी , अलकनंदा का परिगर जाग, देव पर घर का स्नान जाग, नाना प्रकार का फूल छन, छिली बुरांसी का फूल फुल्दा छन,
बुरांशी की डाले डोले सी करदा छन, जाग रै बैणयों , आँखों का की आंखेली दिखेली, कानों की बैली दिखेली, मुखड़ी की ड्यूडी बजैली दिखैली ,
सिर की सिरुवा दिखेली , जिव्हा की लटांगी दिखेली, नौणि सी गुन्दली फिलौरी दिखेली, क्याला सी गुन्द्की जान्गुड़ी दिखेली , जाग रै बैणयूँ,
महादेव का पौखाज बाजदा छन, पार्वती जी का नाद बजडा छन, गणेश का वीणा बाजदा छन, इस मन्षत की विथ्या छतीस रोग को मार , हर पकु
को उखेला , नौ नाडी बहतर कोण को बाणा उखेला, सुखदों को वाणा उखेला, हल्दों को वाणा उखेला , कायदा को वाणा उखेला, गर्व सोखदो को वाणा
उखेला , राउल को वाणा उखेला, बेली को वाणा उखेला, मुंड मुंडारो को वाणा उखेला, पेट लारो को वाणा उखेला, हाडा फोड़दो को वाणा उखेला,
रगत सोखयों को वाणा उखेला, को अलाख्कारी , दखाल्कारी सिरु चढी, पेट पड़ी , पेरू ना झड़ी, आगे नी चली, पीछे फेरी, इंद्र को आसण नी परि , फोर मन्त्र इश्वरी वाच.
मेरा फ्वां बागा रे: एक प्रसिद्ध गढवाली लोक गीत
एसिया का प्रसिद्ध लोक गीत; दक्षिण एसिया का प्रसिद्ध लोक गीत; सार्क देशों का प्रसिद्ध लोक गीत;
भारत का प्रसिद्ध लोक गीत; उत्तर भारतका प्रसिद्ध लोक गीत; हिमालय का प्रसिद्ध लोक गीत; मध्य हिमालय का प्रसिद्ध लोक गीत;
उत्तराखंड का प्रसिद्ध लोक गीत; कुमाऊंका प्रसिद्ध लोक गीत; गढवाल का प्रसिद्ध लोक गीत; लेखमाला
प्रस्तुति : भीष्म कुकरेती
जिन लोगो ने साठ और सहतर के दशक में दिल्ली से या लखनौ से कोटद्वार का सफर रेल से किया हो तो उन्हें
याद होगा कि कोटद्वार और नजीबाबाद रेलवे स्टेसन पर उन्हें एक सूरदास जी मिलते थे जो लोक गीत सुनाकर
यात्रियों का भरपूर मनोरंजन करते थे .
मैस्वाग बाग़ लगने पर उनके द्वारा सुनाया गया यह लोक गीत आपको पसंद भी आयेगा और लोक गीतों में
संघर्ष व हास्य किस तरह मिला-जुला होता है का ज्ञान भी देगा .
मुंबई में इस लोक गीत को श्री चन्द्र सिंग राही ने प्रसिद्धी दिलाई थी .
श्री राजेन्द्र धष्माणा ने अपने प्रसिद्ध नाटक 'अर्ध ग्रामेश्वर ' में कोटद्वार स्टेसन का वातवरण
पैदा करने हेतु प्रसिद्ध 'फ्वां बागा रे ' लोक गीत का इस्तेमाल किया. धष्माणा द्वारा इस प्रसिद्ध लोक गीत को
इस्तेमाल करने का अर्थ है कि लोक गीत हमारे हृदय में बसे हैं.
मेरा फ्वां बागा रे: एक प्रसिद्ध गढवाली लोक गीत
बल मरसा को टैर --- मरसा को टैर -गढवाळ मा बाग़ लगी , बाग़ अ कि ह्व़े डैर -मेरा फ्वां बागा रे
बल गुठयारो को कीच-- गुठयारो को कीच-- पैली पैली बाग़ गाया कौड़ी पट्टी बीच - मेरा फ्वां बागा रे
साब लोखो, लपटैन साब, कपटैन साब
सतड़ पतड़ परमेसुर माराज -बागै ह्व़े डैर
ढुंग ध्वाळो भ्याळा - क्वी ब्वाद कुर्स्याळु ह्वालो
क्वी ब्वाद स्याळा- मेरा फ्वां बागा रे
साब लोखो, लपटैन साब, कपटैन साब
सतड़ पतड़ परमेसुर माराज -बागै ह्व़े डैर
अर सुबेदारूंम त बडी घपरोळ हुंई च .
ऊ ब्वना छन साब बल कि द्वी द्वी फूली वळा त ह्वाया पर यू तीन फूल्युं वळु कू आया
बला हुडक्यूँ मच्युं च सुबेदारूं क बीच सचे हाँ
भिभड़ाट मच्युं च - मेरा फ्वां बागा रे
अरे अल्मोड़ा क क्वाया - सूबेदार साबकु बागन
अंग्वठा बुखै द्याया - मेरा फ्वां बागा रे
फिर क्य ह्व़े साब , बला
तमाखू क त्वया -बुडड़ी क बदल बागन
खंतड़ी गमजै द्याया -मेरा फ्वां बागा रे
झंग्वरा कि धाण - तुमन चली जाण बाबू ल्वाखु
बल गाडीन छुटि जाण
यख मिन खौंळयू रै जाण -मेरा फ्वां बागा रे
साब लोखो, लपटैन साब, कपटैन साब
सतड़ पतड़ परमेसुर माराज -बागै ह्व़े डैर
झंग्र्यळू बिंया - - काणु आदिम छौं बाबू ल्वखों
ख्वाटो पैसा नि दियां मेरा फ्वां बागा रे -
एसिया का प्रसिद्ध लोक गीत; दक्षिण एसिया का प्रसिद्ध लोक गीत; सार्क देशों का प्रसिद्ध लोक गीत;
भारत का प्रसिद्ध लोक गीत; उत्तर भारतका प्रसिद्ध लोक गीत; हिमालय का प्रसिद्ध लोक गीत; मध्य हिमालय का प्रसिद्ध लोक गीत;
उत्तराखंड का प्रसिद्ध लोक गीत; कुमाऊंका प्रसिद्ध लोक गीत; गढवाल का प्रसिद्ध लोक गीत; लेखमाला , जारी