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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, May 23, 2012

गढ़वाली कविता : " खैरीऽ का गीत "

गढ़वाली कविता :  " खैरीऽ का गीत "
रचनाकार : गीतेश सिंह नेगी

  मी त गीत खैरीऽ का लगाणु  छौं ! 

  कांडों थेय  बिरैऽकी ,फूल बाटौं सजाणु छौं
  छोडिक अप्डी , दुन्या कि लगाणु छौं
होली दुनिया बिरड़ी कलजुगी चुकापट्ट मा
  सोचिक मुछियलौंऽल बाटा दिखाणु छौं 

 मी त गीत खैरीऽ का लगाणु  छौं  !  

तिस्वला  रें प्राण  सदनी जू ,अस्धरियौंऽल उन्थेय  रुझाणु छौं
ज्वा  जिकुड़ी फूंकी रैं अग्गिन   मा ,वा प्रीत पाणिल बुझाणु छौं
कु बग्तकि फिरीं मुखडी  सब्या , सुख मा सब सम्लाणु छौं
जौं पिसडौंडमाई सरया जिंदगी मीथै , मलहम उन्ह फर आज लगाणु छौं
                                                 
    मी त गीत खैरीऽ का लगाणु  छौं  !
जौंल बुगाई मिथै  ढंडियूँ मा , उन्थेय  गदना तराणु छौं
 जैल मार गेड खिंचिक सदनी ,वे थेय ही  सुल्झाणु छौं
अटगाई जौंल जेठ दुफरी मा , छैल बांजऽक उन्ह बिठाणु छौं
जैल  बुत्तीं विष कांडा सदनी , फुल पाती वे खुण सजाणु छौं

  
मी त गीत खैरीऽ का   लगाणु  छौं !
 
 जौं ढुंगौंल खैं ठोकर मिल , उन्थेय देबता आज बणाणु छौं
जौंल नि थामू अन्गुलू भी कब्बि  ,कांध उन्थेय लगाणु छौं
  रुसयाँ रैं मि खुण सदनी जू ,   वूं थेय आज मनाणु  छौं
  जौंल रुवाई सदनी मिथै ,भैज्जी वूं थेय  आज  बुथ्याणु छौं
                                                   
मी त गीत खैरीका   लगाणु  छौं  !

रचनाकार : गीतेश सिंह नेगी ,सर्वाधिकार  सुरक्षित
स्रोत : म्यार ब्लॉग - हिमालय की गोद से