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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, May 13, 2018

तीर्थ यात्रियों हेतु मनोरंजन साधन

( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म- ) 
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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -84
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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -   84               
(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--187)       उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग -187

    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन  बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
  ढाकरियों के मनोरंजन साधन 
पर्यटन कोई भी हो पर्यटकों को समय काटने या दिल बहलाने हेतु मनोरंजन आवश्यक होता है। 

   यात्रा या पर्यटन दो प्रकार का होता है - 1 -बाह्य पर्यटन जहां बाहर के यात्री यात्रा करते हैं और 2 -आंतरिक यात्रा जहां निवासी अपने ही क्षेत्र में यात्रा करते हैं। उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र में आंतरिक पर्यटन अधिकतर 'ढाकर ' लाने हेतु होता था।  ढाकर का अर्थ है मुख्य मैदानी बजार से गृह उपयोगी वस्तुओं का ढोकर लाना।  विभिन्न क्षेत्रों से ब्रिटिश गढ़वाल के लोग या ढाकरी  नजीबाबाद , कोटद्वार व दुगड्डा पंहुचते थे।  ब्रिटिश काल में दुग्गड़ा प्रमुख मंडी बन गयी थी व मल्ला -तल्ला सलाण के लोग रामनगर जाते थे।  मनियारस्यूं से उत्तरी भाग वाले बांघाट होते हुए , द्वारीखाल डाडा मंडी होते हुए दुग्गडा पंहुचते थे। ढाकरी  बीच बीच में रात्रि विश्राम लेते थे और विश्राम स्थल पारम्परिक होते थे।  इन विश्राम स्थलों में ढाकरी स्वयं ढुंगळे बनाते थे व अधिकतर नमक मिर्च, कच्चा प्याज या यदि तरकारी उपलब्ध हो तो तरकारी के साथ खाते थे।डा डबराल ने लिखा है कि यात्रा में यात्री सत्तू  व घुइयाँ की सब्जी बनाते थे। ढाकरी भोजन पर अनावश्यक व्यय नहीं करते थे। 
   टिहरी गढ़वाल के लोग ऋषिकेश ढाकर हेतु आते थे। 
      रात्रि में ढाकरी विश्राम स्थल पर स्व रचित स्वांग (नाटक ) खेलते थे।  लोकगीत गाते थे , मैणा (पहेलियाँ ) बुझाते थे व कहावतों व लोककथाओं का आदान प्रदान करते थे।  ढाकरियों मध्य, गायक  गपोड़ी या हास्य रचियिता की बड़ी मांग होती थी।  घडेळा के जागर भी गाये जाते थे। डाडा मंडी व बांघाट जैसे मंडी में बादी  बादण भी आया जाया करते थे और इनाम के ऐवज में नाच गान करते थे। कोटद्वार में हुड़क्या , मिरासी भी यह काम करते थे। इन मंडियों में बाक्की -पुछेर भी अवश्य पंहुचते ही होंगे। ब्रिटिश काल में दुगड्डा आदि वैश्योओं के लिए भी प्रसिद्ध हो गए थे। 
                  हरिद्वार -ऋषिकेश में तीर्थ यात्रियों के मनोरंजन साधन 
  हरिद्वार -ऋषिकेश व झंडा मुहल्ला देहरादून ब्रिटिश काल में तीर्थस्थल ही नहीं वाणिज्य स्थल  भी बन चुके थे तो तीर्थ यात्रियों के लिए व्यापारी  कई मनोरंजन के साधन जुटाते थे जैसे चरखी , जादू टोना।  इन स्थलों पर नर्तक नर्तिकाएँ भी आते थे।  
 हरिद्वार ऋषिकेश में अखाड़ा आदि में भजन कीर्तन व साधुओं के प्रवचन चलते रहते थे।  तीर्थ यात्री सैर सपाटा भी कर लेते थे।  हरिद्वार ऋषिकेश में शुरू से ही राजा महाराजा व धनी  वर्ग अपने लाव लशखर के साथ आते थे तो तीर्थ यात्रिओं को उनके लाव लश्कर (घोड़े , सैनिक आदि ) देखने का अवसर भी मिलता था । व्यापारी सामयिक मनोरंजन साधन जुटाते रहते थे। घडेळा -तंत्र मंत्र तो आज भी प्रचलित हैं ही।  मंदिरों में आरती भी चलती रहती थी। 
नट नाटियों का खेल सदा से ही यात्रियों को लुभाता आया है। 
 हरिद्वार में शायद प्रोजेक्टर से सिनेमा दिखाने का भी रिवाज रहा होगा। देहरादून में सिनेमा प्रसिद्ध थे। 
    गैर हिन्दू साधुओं द्वारा प्रवचन 
 हरिद्वार बौद्ध युग में भी प्रसिद्ध तीर्थ स्थल था और मेलों के समय भीड़ लाभ लेने बौद्ध विद्वान् प्रवचन देने आते थे।  बौद्ध साहित्य में हरिद्वार में अहोगंग स्थान बहुत प्रसिद्ध स्थान माना गया है।  गुरु नानक ने भी हरिद्वार में प्रवचन दिया था व लोगों ने प्रवचन सुना था।  
    हरिद्वार में मिसनरी पादरी भी प्रवचन देने आते रहते थे और  बड़ी भीड़ इन प्रवचनों को सुनती थी।
              चट्टियों में मनोरंजन साधन 
          
      हरिद्वार -ऋषिकेश से बद्रीनाथ  यात्रा वर्णन सर्व प्रथम हमे पुर्तगाली पादरी अंद्रादे अंतिनो (1580 -16 34 ) की पुर्तगाली भाषा में लिखी आत्मकथा (1624 ) में मिलता है।  पादरी अंतिनो पहले यूरोपियन यात्री है जो गढ़वाल होते हुए तिबत पंहुचा था (1624 ) । अंतिनो गोवा से आगरा , दिल्ली होते हुए  हरिद्वार पंहुचा था और फिर बद्रीनाथ तीर्थ यात्रियों के साथ श्रीनगर होते हुए माणा पंहुचा था।  अंतिनों ने अपनी यात्रा वर्णन में ऋषिकेश से श्रीनगर -माणा मारहग की कठिनाईयों का वर्णन है किन्तु इस लेखक को तीर्थ यात्रियों के मनोरजन के बारे में अंतिनो के अनुभव न मिल सके।  
    ब्रिटिश अधिकारी आदम ने 'रिपोर्ट ऑन पिलग्रिम रोड्स ' में  ऋषिकेश से बद्रीनाथ यात्रियों की सुविधाओं का वर्णन किया और चट्टी प्रबंधन की भुरू भूरी प्रशंसा की। 
       यद्यपि यात्रियों के मनोरंजन पर अधिक नहीं लिखा गया किन्तु अनुमान लगाया जा सकता है कि तीर्थ यात्रिओं के लिए निम्न मनोरंजन साधन उपलब्ध थे -
कथा वाचक - यात्री अधिकतर समूह में आते थे और कई समूह अपने साथ कथा वाचक लाते थे जो रात्रि विश्राम स्थल पर कथाएं सुनाते थे।  देव प्रयाग के पंडे भी स्थानीय कथा वाचकों का प्रबंध करते थे।  
मंदिरों में भजन कीर्तन चलते थे और यात्री इन भजनों में सम्मलित होते थे। 
भजन कीर्तन - रात्रि विश्राम के वक्त यात्री सामूहिक भजन कीर्तन करते थे। समूह एक भाषी होते थे तो अपनी भाषा के गीत आदि गाकर या लोककथाएं या गाथाएं सुनकर अपना मनोरंजन करते थे। 
गपोड़ी यात्री -  हर समूह में गपोड़ी यात्री मिल ही जाते हैं जो समूह का भरपूर मनोरंजन करते हैं। अंताक्षरी   पहेलियाँ बुझाना खेल    तो भारत के प्राचीन  रहे हैं तो  इन   आंतरिक खेलों  अवश्य  करते ही मनोरंजन करते रहे होंगे। 
गीतकार - समूह में कोई न कोई गीत भी सुनाता था।
  बड़ी चट्टियों पर गढ़वाली बादी बादणों  द्वारा मनोरंजन 
 बड़ी चट्टियों पर सदा कुछ न कुछ धार्मिक कार्यकर्म या मेला , अनुष्ठान नियोजित होते ही रहते थे। ऐसे समय गढ़वाली बादी बादण इन चट्टियों में आ जाते थे और यात्रियों का मनोरंजन करते थे। 
घडेळा - इन चट्टियों में स्थानीय लोग घडेळा  भी रखवाते थे और इस तरह यात्री उन घडेळों  से आनंद उठाते थे। सन 1965 में यह लेखक व्यासचट्टी बैसाखी मेले में गया था तो उसने एक मराठी तीर्थ यात्री समूह को घडेळा का आनंद लेते देखा था।  उस समय बहुत से यात्री पैदल यात्रा भी करते पाए जाते थे। सरौं नर्तक तो इन चट्टियों में अपना प्रदर्शन करते ही रहते थे। 
प्रवचन - किसी साधी दवारा प्रवचन तो आम बात थी। 
जादू टोना - जादू दिखाने वाले भी इन चट्टियों में पंहुच ही जाते थे। 
  ब्रिटिश काल में व्यापारी इन चट्टियों में मनोरंजन साधन जुटाने लगे थे।  
 बायस्कोप - बायोस्कोप दिखने का रिवाज भी शुरू हो गया था। 
 मेलों में तीर्थ यात्री पंडो नृत्य से भी यात्री लाभ उठाते थे। 
बांसुरी विक्रेता या डमरू विक्रेता बांसुरी बजाकर या डमरू बजाकर यात्रियों का मनोरजन करते थे। 

 समय समय पर मनोरंजन माध्यम बदलते रहे होंगे।  ब्रिटिश कल में अवश्य ही नए मनोरंजन माध्यम अवतरित हुए तो बहुत से मनोरजन नए प्रचलित भी हुए। 




Copyright @ Bhishma Kukreti  25/4 //2018

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना शैलवाणी (150  अंकों में ) कोटद्वार गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी 
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -6
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