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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Monday, May 6, 2013

उत्तराखंड की झीलें (Lakes of Uttrakhand)


 (गढ़वाल क्षेत्र )
            [Lakes of Uttrakhand ;lakes of Chamoli Garhwal; 
lakes of Rudraprayag;lakes of Kedar valley;lakes of Tihri Garhwal ; lakes of Uttarkashi ; lakes of Dehradun; lakes of Haridwar ;lakes of Pithoragarh;lakes of Dwarhat; lakes of Champawat ;lakes of Udham Singh Nagar; lakes of Nainital;lakes of Bageshwar; lakes of Almora series]
                                                                       डा. बलबीर सिंह रावत 

शुद्ध , साफ़, शीतल जल की झीलें किसी भी क्षेत्र की सुन्दरता को पूर्ण करती है. पर्वतीय क्षेत्रों की बदलती दृश्यावलियों में नीले, कांच सी साफ़, पारदर्शी, पानी वाली छोटी बड़ी झीलें तो इन दृश्यावलियों को स्वर्गीय आनद देने वाली  बना देती हैं. उत्तराखंड के उत्तरी भाग को प्राकृति ने झीलों से भरपूर बनाया है. अकेले उत्तरकाशी, चमोली और टेहरी जिलों में १८८० मीटर  से ५३५० मीटर  की ऊचाइयों पर १२ छोटी बड़ी झीलें स्थित हैं। इन में से सबसे बड़ी झील रूप कुण्ड है जो चमोली जनपद में, समुद्र ताल से ५३५० मीटर की ऊचाई पर स्थित है और इसका क्षेत्रफल ७० वर्ग किलोमीटर है. इस झील का पौराणिक और ऐतिहासिक

महत्व है. इसका अधिकांश भाग बर्फ से जमा रहता है, केवल एक छोटे से हिस्से में जल एक कुंड के रूप में दिखता है। यह झील हिमालय क्षेत्र के सौन्दर्यम स्थलों में से एक है। इस के किनारे सैकड़ों वर्ष पुराने नर कंकाल बिखरे पड़े हैं जिनके बारे में कुछ सटीक पता नहीं है की किनके है और वे यहाँ क्यों आये थे। यह स्थान नंदा जात यात्रा की पूजा का यह एक केंद्र बिंदु भी माना जाता है।पर्यटन की दृष्टि से  रूप कुंड एक ऐसी ट्रेल पर स्थित है जो बेदनी बुग्याल, ब्रह्म ताल, और भैन्कल ताल का क्षेत्र बनाता है।  

भैंकल  ताल २५०० मीटर से अधिक ऊँचाई पर स्थित है। इस ताल का नाम नागदेव राजा भेन्क्ल के नाम पर रखा गया है और इसी लिए इसका पौराणिक महत्व भी है. झील के चारों और सघन बन हैं जिनमे भोज पत्र के , बुरांस के , देवदार के और रागा-थुनेर के बृक्ष खड़े हैं। पक्षियों का कलरव, शीतल हवा, नयनाभिराम दृश्यावलियां सुध बुध खोने की लिए इतनी अधिक हैं की मनुष्य अपने को भूल कर प्रकृति में खो जाने को विवश हो जाता है। इस झील के चारों और टूटे तीरों के असंख्य टुकड़े आज भी पड़े हुए दिखाई देते हैं, कई पेड़ों पर चुभे तीर भी देखे जा साकते हैं। . इस से यह साबित होता है की यहाँ पर कभी कोइ भीषण युद्ध लड़ा गया होगा जिसके बारे में कोइ जानकारी नहीं है। इस ताल में मछलिया हैं, पास में एक मंदिर भी है और एक पेड़ पर मनोती की घंटिया भी टंगी हैं।. इन सब से यह साबित होता है की यह स्थान प्राचीन काल से ही पूजा का स्थान रहा है। इस रमणीक झील से आगे तेलंगी बुग्याल है और उससे आगे बेदनी बुग्याल। इन बुग्यालों के मखमली घास, रंग बिरंगे फूल,औषधीय जड़ी -बूटियाँ प्रचुर मात्रा में पायी जाती हैं।

इस क्षेत्र में आने के लिए र्हिषिकेश , कोटद्वार और रामनगर से करणप्रयाग  होकर नंदप्रयाग अना होता है। यहाँ से आगे कनौल , सुतौल और मूना हो कर पहुंचा जा सकता है. अल्मोड़ा से ग्वालदम , बाण , मुन्दौली होकर तथा करण प्रयाग से थराली , देवाल बाण हो कर भी यहाँ पहुचा जा सकता है. मूना नमक स्थान पर एक डाक बँगला भी है जिसे अंग्रेज जिलाधीश श्री मर्नौड ने बनवाया था 

इतने  सुन्दर प्राकृतिक दृश्यावलियों  और ऐतिहासिक - धार्मिक स्थलों के बारे में इतने कम जानकारी का होना हमारी सरकार और विश्वविद्यालयों की उदासीनता को उजागर करता है। आशा है की इस लेख को पढने के बाद इन स्थलों का वैज्ञानिक रूप से अध्ययन होगा और सही ऐतिहासिक जानकारी जुताई जा सकेगी . साथ ही इस प्रकार पर्यटन को बढ़ावा दिया जाएगा की स्थलों की सुन्दरता और प्राकृतिक परिवेश पर कोइ हानिकारक प्रभाव नहीं पडेगा।

( इस लेख को लिखने के लिए डा. रणबीर सिंह चौहान जे की पुस्तक "गढ़वाल के गढ़ों का इतिहास  एवं पर्यटन के सौन्दर्य स्थल " से जानकारी, साभार , ली गई है)
dr.bsrawat26@gmail.com      .

-- Lakes of Uttrakhand ;lakes of Chamoli Garhwal; lakes of Rudraprayag;lakes of Kedar valley;lakes of Tihri Garhwal ; lakes of Uttarkashi ; lakes of Dehradun; lakes of Haridwar ;lakes of Pithoragarh;lakes of Dwarhat; lakes of Champawat ; lakes of Udham Singh Nagar; lakes of Nainital;lakes of Bageshwar; lakes of Almora series to be continued..