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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Monday, May 2, 2016

सन् 1750 ई से पहले की गढ़वाली कविता

सन् 1750 ई से पहले की गढ़वाली कविता 
 
(श्री अबोध बन्धु बहुगुणा ने इस कविता  रचयिता का नाम पं जयदेव बहुगुणा माना है (शैलवाणी ) किन्तु गढ़वाली कविता के इतिहासविद व समालोचक डा  जगदम्बा कोटनाला   मानना है कि यह एक लोकगीत था जो अभी भी उत्तरी गढ़वाल में गाया जाता है ) 
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 रंच जुड्यां पंच जुड्यां 
         जुड़िगे घिमसाण जी 
ट्यटा बोद गरुड़ राजाअ 
        ब्यौमा मिन बि जाण जी 
ढैंचु जी त   ढोल्या पैट्या 
            सेंटुलो दमैंया जी 

घुघती मंगळेर पैटी 
         कागा छन डुलेर जी 
गाड वासी गडमळी   अर 
         धार बास्यो सिक्रा जी 
  तब उळकाणो बोद 
      मेरी डांडी लहिक्रा जी  
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प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती