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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, May 22, 2016

एक प्रवासी नारी की बेबस पीड़ा -जिसे गढ़वाली कवि ने नहीं देखा

एक प्रवासी नारी की बेबस पीड़ा -जिसे गढ़वाली  कवि ने नहीं देखा 
अरी पहाड़ी नारी ! तू मेरी सौतन री ! (पलायन के कुछ अनदेखे पहलू ) 

                  चबोड़ ?  चखन्यौ ?   - भीष्म कुकरेती
s = अधा अ 

 मि तैं तुम मिसेज अबोध बंधु बहुगुणा , श्रीमती कन्हयालाल डंडरियाल , श्रीमती रघुवीर सिंह अयाल , श्रीमती ललित केशवान , श्रीमती नेत्र सिंह असवाल , मिसेज पराशर गौड़ , श्रीमती विनोद जेठुरी , मिसेज जगमोहन जयाड़ा , मिसेज बालकृष्ण ध्यानी  , श्रीमती राजेन्द्र सिंग फरियादी या मिसेज गीतेश नेगी कुछ बि बोलि सकदां पर मि ढोल बजैक , तुरही फूंकिक , डौंर बजैक , थाळी छणकैक , कंटर पीटिक ऐड़ैक , बीच बजार मा धै लगैक बुलणु छौं बल स्या पहाड़ी औरत मेरी सौतन,  सौत च,प्रतियोगी च  । 

 तैं पहाड़ की जनानीन  मि तैं वै दिन से इ जलाण -कुढ़ाण शुरू कौर आल छौ जैदिन बटे मी तैं यी याने म्यरो हजबैंड जी  ब्यौ बाद पहाड़ से दिल्ली लेकि ऐ छा। यी कवि हृदयी त नि छन बल्कण मा बकळि जिकुड़ी का छन पर असल मा  गढ़वाली कवि छन।  
सुहाग रातक दुसर सुबेर यी मि तैं  लेकी  दिल्ली ऐ गे छा अर यूंन तब अंदो आंद 'पहाड़  की नार की द्वी साल बाद सुहाग रात ' पर बड़ी हाहाकारी कविता लेखिक छ्पवै छे अर तब से मेरी समज मा ऐ गे पहाड़ की नारी मेरी सौत री ! 
                      दुसर कविता मा यूंन पहाड़ की नारी ठंड मा , ऐड़ी मा सुबेर सुबेर मुंहअंधेरे उठिक जंदर पीसण , घाम आण पर घमघम कुटणो वर्णन करी छौ अर पहाड़ की नारी की असह्य कठण जिंदगी वर्णन से एक कवि सम्मेलन मा श्रोताओं तैं रुलै छौ अर इथगा बढ़िया असलियतबादी कविता से अपण दगड्या कवियों तैं जळै छौ। पर म्यार कजे की कवि की नजर मे पर नि पौड़ी कि मी बि त प्रवास मा पैल यूंक भाइ पढ़ै वास्ता फिर अपण बच्चों की खातिर दिल्ली मा 4 डिग्री की ठंड ह्वेन या ह्वेन 44 डिग्री को उमळतो मि   सुबेर 4 बजी बिजिक कामधाम मा लग जांद छौ।  म्यार सुकुमार हृदयी कजे तैं  मेरी मेनत , परिवार का वास्ता शरीर खपाई की जिंदगी मा कुछ बि करुणा नि दिखे बस पहाड़ी नारी की एवरेस्ट की ऊकाळ वळि जिंदगी दिखे अर युंकुंण त जन बुल्यां प्रवासी नारी राजसी ठाठ करदारी नारी ह्वावु।
                  मेरा यूँ हृदय विदारकी कवि पति  तैं पहाड़ की नारीक लखड़ निड़ाण से लेकि लखड़ों बोझ से पिलसीं -पिल्चीं   जिंदगी अवश्य दिख्याई किन्तु इतना दशाब्द्यूं मा इन नि दिखे कि यूंकि धर्मपत्नी बि  मिट्टी तेल लीणो बान चार चार घंटा राशनै दुकान मा हर हफ्ता खड़ी रैंदी . नारी पीड़ा प्रेमी मेरो कवि हज्बैंड यदि एक कविता मेरी परेशानी पर बि लेखी लींद  तो मि कबि बि नि सोचदु की पहाड़ी  नारी मेरी सौत च। 
                                   पहाड़ की नारी को मैत नि जै सकणो असमर्थता पर तो मेरा कवि पतिन करुण रस मा डुबाइं -भिगाइं खंड काव्य लेखिक जयश्री सम्मान प्राप्त कार किंतु अपण घौरम अपण पत्नी का वूं रिसदा घावूं तैं दिखद , महसूस करदा बिसर गेन जु घाव यूंक पत्नी तैं पिछला बीस साल से पहाड़ नि जै सकणो असमर्थता से पैदा ह्वेन।  वाह हे गढ़वाली कवि ! पहाड़ की नारी का मैत प्रेम माँ तो  , टीस ,  असह्य करुणा किंतु  प्रवासी नारी ज्वा मैत से बिमुख करे गे वींक मैतै  खुद पर एक बि आंसू ना ?  पहाड़ी नारी की खुद की कीमत बेशकीमती हीरा  अर प्रवासी नारी का आंसू की क्वी कीमत ना ? वाह रे गढ़वाली का सुनामधन्य कवि ! 
                                      हे कवि माराज ! पहाड़ की अनपढ़ नारी जब पटवारी का खसरा मा अंगूठा लगान्दी तो तुम अपणी  कविता मा दुनिया की सब स्कूलों तैं जमींदस्त करणै वकालात करदा छया किन्तु दिल्ली मा चालीस साल रैक बि मि अबि बि सरकारी कागजुं मा अंगूठा हि लगांदु किंतु आपन कबि नि स्वाच कि मी बि एक अनपढ़ नारी छौं ? क्या आप तैं ख़याल  बि आयि कि खाली पहाड़ ही ना इख दिल्ली मा बि में सरीखा अनपढ़ प्रवासी नारी छन ? 
                अबि तुमर एक खंड काव्य प्रकाशित ह्वे जैक नाम च 'एकुलास कु बुढ़ापा '।  इ खंडकाव्य पर आप तैं उत्तराखंड कवि शिरोमणि पुरूस्कार बि मील।  ये खंड काव्य मा तुमन पहाड़ मा एक इन बुडड़ी वर्णन कार ज्वा पहाड़ का एक गां मा कथगा इ सालुं से शहर मा रौण वाळ नाती नतिण्यूं  जग्वाळ मा बैठीं च। पर हे पहाड़ नारी प्रेमी कबि मेरि जग्वाळ पर बि त कलम चलाओ कि मि दिल्ली मा रौंद बि दिल्ली मा रौण वाळ अपण नाती नतिण्यूं द्वी साल शकल दिखण से बेजार छौं।   मेरी क़ुदसा पर कलम चलाण मा तुमतै किलै शरम लगदि ?
पहाड़ी नारी तो सौभाग्यवती च कि वींक दुखों पर कलम चलाण वाळ गढ़वाळ मा बि छन अर प्रवास मा बि छन किन्तु मै सरीखा बेबस प्रवासी जनानी पर जब प्रवासी साहित्यकार ही कलम नि चालांदन तो गढ़वाल का साहित्यकार किलै प्रवासी जनानी तैं याद कारल ?
                रामु का बुबा जी ! याने गढ़वाळी का महान कवि जी !  पहाड़ की श्यामु ब्वे पर त तुम खूब कलम चलाणा रौंदा तो  तुमर काखमा बैठीं  प्रवासी रामु की मा तैं बि साहित्य मा भूलां -बिसरां  कबि कब्यार जगा दिलावो ना ! मी बि त गढ़वाली नार छौं ! 
सर्वाधिकार @ भीष्म कुकरेती