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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Friday, May 20, 2016

स्वार्थ सप्तक ( 1906 , प्रेरणात्मक गढ़वाली कविता )

Modern Garhwali Folk Songs, Poems 

      स्वार्थ सप्तक   
( 1906 , प्रेरणात्मक गढ़वाली कविता )

रचना -- सनातनानन्द सकलानी    ( जन्म  1878 -1920 -  गढ़वाल  ) 
Poetry  by - Sanatananand Saklani 
( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला )
-इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या : भीष्म कुकरेती 
-
गरीब भूखा मरवैन त्वैन , दिदा भुलौं से लड़वैन  त्वैन,
अन्याय भारी कर वैन त्वैन, हे स्वार्थ तेरो मुख क्वी न देख! 

भली भली ये सब चीज मैकू , बुरी बुरी ये सब , और कैकू ,
छै तू सिखौंदो इनु जैकु तैकु ,  हे स्वार्थ तेरो मुख क्वी न देख! 

नौन्याळ मेरा त पढ़ी हि जाला , छूं और कैकी यख न निकाळा,
इनी इनी सीख सिखौणवाला ,   हे स्वार्थ तेरो मुख क्वी न देख। 

मानेन तेरा उपदेश जैन , सीखे महा निर्दयता छ वैन ,
पाये नि वैतैं कुछ लाभ कैन ,  हे स्वार्थ तेरो मुख क्वी न देख!  

जाणे भलो शिक्षक जैन त्वैकू , ह्वैनी  पिछाड़े  सुख चैन वेकू ,
छै तू सुखौंदो सुख क भि ल्वै कू ,  हे स्वार्थ तेरो मुख क्वी न देख!   

समाज को क्या ऋण देण मैंन , क्या हाल वांका अब होई गैन ?
यों बात ते चित्त फिरैन  त्वैन,हे स्वार्थ तेरो मुख क्वी न देख!   

खोटो बड़ो ही कलिराज सी तू , सदा भलकाम बिगाड़दी तू ,
नी होण देदो परमार्थ भी तू  ,हे स्वार्थ तेरो मुख क्वी न देख!    

( साभार -- गढ़वाली कवितावली )
Poetry Copyright@ Poet
Copyright @ Bhishma Kukreti  interpretation if any

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