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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, February 1, 2012

कुमाउंनी , गढ़वाली एवं नेपाली भाषा-व्याकरण में संधि


Grammar of Kumauni Language
Grammar of Garhwali Language
Grammar of Languages of Uttarakhand
Grammar of Nepali Language
Grammar of Mid Himalayan Languages
मध्य हिमालयी कुमाउंनी , गढ़वाली एवं नेपाली भाषा-व्याकरण का तुलनात्मक अध्ययन भाग -16
( Comparative Study of Grammar of Kumauni, Garhwali Grammar and Nepali Grammar ,Grammar of Mid Himalayan Languages-Part-16)
सम्पादन : भीष्म कुकरेती
Edited by : Bhishm Kukreti
नेपाली में संधि विधान
१- अनियमित सन्धि विधान
सु + आगत = स्वागत ( उ का लोप होना, स स् में परिवर्तित होना, आ का वा में बदल जाना )
खा + आई = खवाई
भन् + आई = भनाई
गर् + आइ = गराइ
२- नियमित संधि विधान
अ- व्यञ्जनान्त मे अ होने से इ के जुड़ने पर इ क ई मे बदलना
शहर + इ = शहरी
ब- इ का इय या इया हो जाना
उदाहरण = इय = उदाहरणीय
शहरी +इया = शहरीया
स- यदि व्यंजनान्त में अ हो तो ए के जुड़ने से ए ही रहता है
अंगार + ए = अंगारे
विकास + ए = विकासे
ड़- व्यनाज्नंत में ओ हो और ए जुड़े तो परिवर्तन भिन्न होता है
कालो = ए = काले
तीतो + ए = तीते
संदर्भ:
१- अबोध बंधु बहुगुणा , १९६० , गढ़वाली व्याकरण की रूप रेखा, गढ़वाल साहित्य मंडल , दिल्ली
२- बाल कृष्ण बाल , स्ट्रक्चर ऑफ़ नेपाली ग्रैमर , मदन पुरूस्कार, पुस्तकालय , नेपाल
३- डा. भवानी दत्त उप्रेती , १९७६, कुमाउंनी भाषा अध्ययन, कुमाउंनी समिति, इलाहाबाद
४- रजनी कुकरेती, २०१०, गढ़वाली भाषा का व्याकरण, विनसर पब्लिशिंग कं. देहरादून
५- कन्हयालाल डंड़रियाल , गढ़वाली शब्दकोश, २०११-२०१२ , शैलवाणी साप्ताहिक, कोटद्वार, में लम्बी लेखमाला
६- अरविन्द पुरोहित , बीना बेंजवाल , २००७, गढ़वाली -हिंदी शब्दकोश , विनसर प्रकाशन, देहरादून
७- श्री एम्'एस. मेहता (मेरा पहाड़ ) से बातचीत
८- श्रीमती हीरा देवी नयाल (पालूड़ी, बेलधार , अल्मोड़ा) , मुंबई से कुमाउंनी शब्दों के बारे में बातचीत
९- श्रीमती शकुंतला देवी , अछ्ब, पन्द्र-बीस क्षेत्र, , नेपाल, नेपाली भाषा सम्बन्धित पूछताछ
१० - भूपति ढकाल , १९८७ , नेपाली व्याकरण को संक्षिप्त दिग्दर्शन , रत्न पुस्तक , भण्डार, नेपाल
११- कृष्ण प्रसाद पराजुली , १९८४, राम्रो रचना , मीठो नेपाली, सहयोगी प्रेस, नेपाल
१२- चन्द्र मोहन रतूड़ी , गढ़वाली कवितावली ( सं. तारा दत्त गैरोला, प्र. विश्वम्बर दत्त चंदोला) , १९३४, १९८९
Comparative Study of Kumauni Grammar , Garhwali Grammar and Nepali Grammar (Grammar of , Mid Himalayan Languages ) to be continued ........
. @ मध्य हिमालयी भाषा संरक्षण समिति
Grammar of Kumauni Language
Grammar of Garhwali Language
Grammar of Languages of Uttarakhand
Grammar of Nepali Language
Grammar of Mid Himalayan Languages
मध्य हिमालयी कुमाउंनी , गढ़वाली एवं नेपाली भाषा-व्याकरण का तुलनात्मक अध्ययन भाग -15
( Comparative Study of Grammar of Kumauni, Garhwali Grammar and Nepali Grammar ,Grammar of Mid Himalayan Languages-Part-15)
सम्पादन : भीष्म कुकरेती
Edited by : Bhishm kukreti
गढ़वाली भाषा में संधि
डा भवानी दत्त उप्रेती ने जहाँ कुमाऊंनी भाषा में दो प्रकार की संधियों के बारे में पुष्टि की वहीं अबोध बंधु बहुगुणा ने गढ़वा ळी में तीन प्रकार की संधियों के उदहारण सहित व्याखा की है
श्रीमती रजनी कुकरेती ने संधियों का विभागीकरण न कर केवल उदहारण दिए हैं.
बहुगुणा अनुसार की संधि इस प्रकार हैं
१- स्वर संधि
२- व्यंजन संधि
३- वि:सर्ग संधि
गढ़वाली में स्वर संधि
गढ़वाली भाषा के महानतम विद्वान् व लेखक अबोध बंधु बहुगुणा ने स्वर संधियों में किया
अ- दीर्घ स्वर संधि :
झट +आदि = झट्टदि
झट् + ट् = झट्ट
गंध + अक्षत = गंधाक्षत
ब- गुण स्वर संधि:
सुर +इंद्र = सुरेन्द्र
सुख + इच्छा = सुखेच्छा
बड़ो + उड़्यार = बड़ोड़्यार
स- वृद्धि स्वर संधि
जण + एक = जणेक, जणैक
तंत = उखद = तंतोखद
द- यण स्वर संधि
भैजी + आदि = भैज्यादि
बौजि + औरु = बौज्योरू
इ- अयादी चतुष्टय संधि
ने + अन = नयन
पो + इतर = पवितर
२- गढ़वाली में व्यंजन संधि
वाक् + ईस
दिक् + गज = दिग्गज
३- गढ़वाली में विस:र्ग संधि
दु: + कर्म = दुस्कर्म
अध्: + गति = अधोगति
शुरुवाती आधुनिक गढ़वाली के कवि चंद्रमोहन रतूड़ी की कविताओं में कुछ विशेष संधि युक्त शब्द भी मिलते हैं
पैर + टेक = पैर्टेक
बढ़दि + और = बढ़द्यौर
बुंदुन + यख + इंद्र= बुंदुन्यखेंद्र
मृग + और + अन्द्कार = मृगौरंधकार
आतुर - और + स्वास = आतुरोर्स्वास
गढ़वाली में संधि व परसर्ग विलोपन
गढ़वाली में संधि व परसर्ग विलोपन भी होता है और कई एक जैसे उच्चारण वाले शब्दों की रचना हो जाती है. श्रीमती रजनी कुकरेती ने निम्न उदहारण दिए हैं
लिखित रूप -------------------उच्चारण ----------------------------वास्तविक अर्थ
तक्खौ -------------------------तखौ ----------------------------------- तख़ च
तख़ औ -----------------------तखौ -------------------------------------तख़ औ
तखौ --------------------------तखौ -------------------------------------तख़ कु
तखै----------------------------तखै---------------------------------------तख कि
तख ऐ ------------------------तखै---------------------------------------- तख ऐ
तख आ ----------------------तखा ---------------------------------------- तख आ
तखाS -----------------------तखा ---------------------------------------तख का
स्यै --------------------------- स्यै ----------------------------------------स्या इ
स्वी ---------------------------स्वी ----------------------------------------स्यू इ
वै ------------------------------वै -------------------------------------------वा इ
वी ------------------------------वी ----------------------------------------- वु इ
त्वी -----------------------------त्वी-----------------------------------------तू इ
जखी --------------------------जखी --------------------------------------- जख इ
तखी --------------------------- तखी --------------------------------------तख इ
सीतै ----------------------------- सीतै---------------------------------------- सीता इ
मिनी ---------------------------मिनी ----------------------------------------मिं इ
तन्नि-----------------------------तन्नि ---------------------------------------तन इ
रामी ------------------------------रामी -----------------------------------------राम इ
रामि का अर्थ गाय/भैंस का भूतकाल का राम्भना भी होता है यथा या गौड़ी किलै रामि होली ?
संदर्भ:
१- अबोध बंधु बहुगुणा , १९६० , गढ़वाली व्याकरण की रूप रेखा, गढ़वाल साहित्य मंडल , दिल्ली
२- बाल कृष्ण बाल , स्ट्रक्चर ऑफ़ नेपाली ग्रैमर , मदन पुरूस्कार, पुस्तकालय , नेपाल
३- डा. भवानी दत्त उप्रेती , १९७६, कुमाउंनी भाषा अध्ययन, कुमाउंनी समिति, इलाहाबाद
४- रजनी कुकरेती, २०१०, गढ़वाली भाषा का व्याकरण, विनसर पब्लिशिंग कं. देहरादून
५- कन्हयालाल डंड़रियाल , गढ़वाली शब्दकोश, २०११-२०१२ , शैलवाणी साप्ताहिक, कोटद्वार, में लम्बी लेखमाला
६- अरविन्द पुरोहित , बीना बेंजवाल , २००७, गढ़वाली -हिंदी शब्दकोश , विनसर प्रकाशन, देहरादून
७- श्री एम्'एस. मेहता (मेरा पहाड़ ) से बातचीत
८- श्रीमती हीरा देवी नयाल (पालूड़ी, बेलधार , अल्मोड़ा) , मुंबई से कुमाउंनी शब्दों के बारे में बातचीत
९- श्रीमती शकुंतला देवी , अछ्ब, पन्द्र-बीस क्षेत्र, , नेपाल, नेपाली भाषा सम्बन्धित पूछताछ
१० - भूपति ढकाल , १९८७ , नेपाली व्याकरण को संक्षिप्त दिग्दर्शन , रत्न पुस्तक , भण्डार, नेपाल
११- कृष्ण प्रसाद पराजुली , १९८४, राम्रो रचना , मीठो नेपाली, सहयोगी प्रेस, नेपाल
१२- चन्द्र मोहन रतूड़ी , गढ़वाली कवितावली ( सं. तारा दत्त गैरोला, प्र. विश्वम्बर दत्त चंदोला) , १९३४, १९८९
Comparative Study of Kumauni Grammar , Garhwali Grammar and Nepali Grammar (Grammar of , Mid Himalayan Languages ) to be continued ........
. @ मध्य हिमालयी भाषा संरक्षण समिति
Grammar of Kumauni Language
Grammar of Garhwali Language
Grammar of Languages of Uttarakhand
Grammar of Nepali Language
Grammar of Mid Himalayan Languages
मध्य हिमालयी कुमाउंनी , गढ़वाली एवं नेपाली भाषा-व्याकरण का तुलनात्मक अध्ययन भाग -14
( Comparative Study of Grammar of Kumauni, Garhwali Grammar and Nepali Grammar ,Grammar of Mid Himalayan Languages-Part-14)
सम्पादन : भीष्म कुकरेती
Edited by : Bhishm kukreti
कुमाउंनी भाषा में संधि
संधि दो ध्वनियों का जुड़ कर एक हो जाना है.
कुमाउंनी में दो तरह की संधियाँ पाई जाती हैं -
अ- स्वर संधि
ब- व्यंजन संधि
स्वर संधि के उदहारण
१- आन , इन, उन आदि का प्रयोग
च्याला = आन = च्यालान (आ+ आ = आ)
चेलि + इन = चेलिन (इ+ ई = ई )
गोरु = उन = गोरून (उ + ऊ = ऊ )
२- औट का प्रयोग
ओ + ओ = औ
तलौटो ( तलो + औ + ओ )
डलौटो ( डलो +औट +ओ )
व्यंजन संधि के उदाहरण
१- यदि पहले पद का ग् हो और दूसरा पद आदि ध्वनि ह् हो तो ग् और ह् = घ
आग् + हाल्नो = अघानो
२- लघु रूपता
अ- रुपिमिक अवस्था से प्रतिबंधित के पूर्णांक गणनात्मक संख्या वाचक रुपिमो के परस्पर जुड़ने पर -
तीन + बीस = तेईस
चार = बीस = चौबीस
ब- महाप्राण 'ठ' के पश्चात ह्रस्व ह आने से जोड़ शब्द में ह लोप हो जाता है
कांठा +हाल्नो = कांठान्नो
स- पहले पद का द्वित व्यंजन के दुसरे व्यंजन के आदि नजन के जोड़ में कभी कभी द्वी तत्व नही रह जाता है
अन्न +जल = अंजल
द- नासिक्य स्पर्श युक्त संख्या वाचक विशेषणों में विशेषण व्युत्पादक पर प्रत्यय अथवा स्वतंत्र रु से जुड़ने पर नासिक्य का लोप हो जाता है
तीन + बीस = तेईस
तीन + तीस =तैंतीस
ध- पूर्णांक गणनात्मक संख्या के साथ -गुण प्रत्यय जुड़ने से ध्वनि लोप है या कहीं ह्र्स्वी करण विद्यमान रहता है
१- तीन +गुनो= तिगिनो
चार + गुनो = चौगुनो
२- सात + गुनो =सतगुनो
आठ +गुनो = अठगुनो
-- दो स्वतंत्र रूपिम समीप आंयें तो जुड़ने पर पहले के अन्त्य स्वर का लोप हो जाता है
गाड़ा+ ख्याता = गाड़ख्याता
गोरु + बकरा = गोरबकरा
ठुला + नाना = ठुल्नाना
प- यदि पहले पद का व्यंजनान्त और दुसरे पद का आदि व्यंजन समान हों तो तो एक का लोप हो जाता है
नाक = कटि =नकटि
नाक =कटो = नकटो
फ- ह्र्स्वीकरण और प्रतिस्पथान में लाघुरुप्ता हो जाती है
सात +ऊँ = सतूं
तेरा = ऊँ = तेरुं
भ- व्यंजन का अंत प्रतिपादक के उपरान्त यदि प्रत्यय आदी व्यंजन हो तो संयोग में प्रतिपादक व्यंजन ह्रस्व हो जाता है
कम + नि = कम्नि
म- ध्वनात्मक समानता -
रुपिमिक अवस्था से प्रतिबंधित सीमा में गणनात्मक संख्यावाचक प्रतिपादक जैसे चालीस, तीस पहले उन जुड़ने से परवर्ती व्यंजनध्वनि लोप हो जाती है
उन + चालीस-= उन्तालिस (उनचालीस)
गं - विस्तार
योगिक क्रिया में विस्तार हो
द्वि + सरो = दुसोरो
तीन + सरो = तिसोरो
संदर्भ:
१- अबोध बंधु बहुगुणा , १९६० , गढ़वाली व्याकरण की रूप रेखा, गढ़वाल साहित्य मंडल , दिल्ली
२- बाल कृष्ण बाल , स्ट्रक्चर ऑफ़ नेपाली ग्रैमर , मदन पुरूस्कार, पुस्तकालय , नेपाल
३- डा. भवानी दत्त उप्रेती , १९७६, कुमाउंनी भाषा अध्ययन, कुमाउंनी समिति, इलाहाबाद
४- रजनी कुकरेती, २०१०, गढ़वाली भाषा का व्याकरण, विनसर पब्लिशिंग कं. देहरादून
५- कन्हयालाल डंड़रियाल , गढ़वाली शब्दकोश, २०११-२०१२ , शैलवाणी साप्ताहिक, कोटद्वार, में लम्बी लेखमाला
६- अरविन्द पुरोहित , बीना बेंजवाल , २००७, गढ़वाली -हिंदी शब्दकोश , विनसर प्रकाशन, देहरादून
७- श्री एम्'एस. मेहता (मेरा पहाड़ ) से बातचीत
८- श्रीमती हीरा देवी नयाल (पालूड़ी, बेलधार , अल्मोड़ा) , मुंबई से कुमाउंनी शब्दों के बारे में बातचीत
९- श्रीमती शकुंतला देवी , अछ्ब, पन्द्र-बीस क्षेत्र, , नेपाल, नेपाली भाषा सम्बन्धित पूछताछ
१० - भूपति ढकाल , १९८७ , नेपाली व्याकरण को संक्षिप्त दिग्दर्शन , रत्न पुस्तक , भण्डार, नेपाल
११- कृष्ण प्रसाद पराजुली , १९८४, राम्रो रचना , मीठो नेपाली, सहयोगी प्रेस, नेपाल
Comparative Study of Kumauni Grammar , Garhwali Grammar and Nepali Grammar (Grammar of , Mid Himalayan Languages ) to be continued ........
. @ मध्य हिमालयी भाषा संरक्षण समिति

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