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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Monday, October 15, 2012

हम कब सुधरेंगे

हम अपने 
 माता-पिता  
 वृद्ध जनों को समय पर 
 भोजन-पानी देने की 
चिंता नहीं करते 
एक घडी  
उनके पास बैठकर  
दुःख दर्द समझने की 
 कभी कोशिश नहीं करते 
 जिन्होंने बालपन से 
हमारे बड़े होने तक 
जिंदगी भर  
हमारे बोझ को कभी 
बोझ नहीं समझा  
उन्हें बोझ समझकर
खुद से अलग कर
दूर रख लेते हैं  
उनके लिए  
कुछ करना तो रहा दूर 
उनके किये का 
एहसान तक नहीं समझते 
जीते जी  
उन्हें नहीं पूछते  
उनकी सेवा नहीं करते 
उनके चले जाने पर  
एकाएक  
पुत्र का कर्तव्य बोध 
 जागने  लगता है  
 दस दिन तक  
 नियम -संयम से रहकर 
कर्मकाण्ड करते हैं 
माँ बाप की घड़ी भर 
एक भी नहीं सुनने वाले 
दिनभर मस्त होकर 
गरुड़ पुराण सुनते हैं 
वार्षिक श्राद्ध पर  
लाखों खर्चकर  
हफ्ते भर तक  
 श्रीमद्भागवत पाठ कराते हैं 
सैकड़ों  का भोजन    
दक्षिणा कराते हैं  
हर साल  
श्राद्ध पक्ष में 
मुंडन कर  
तर्पण कराते हैं  
दान दक्षिणा कर 
 सुख की अनुभूति करते हैं 
काश !
यह कर्तव्य बोध 
माता -पिता के जीतेजी 
जाग गया होता  
माता-पिता की सेवा का पुण्य 
हमें भी मिल गया होता 

   डॉ नरेन्द्र गौनियाल  सर्वाधिकार सुरक्षित ..narendragauniyal@gmail.com