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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Monday, March 26, 2012

Contemporary Garhwali Poem by dr Narendra Gauniyal


*******आखिर कब तक !!?********
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रचनाकार - डॉ नरेन्द्र गौनियाल

सर्र चली गैनी
दिन,मैना , साल
अर हम
गाणि करदा ही रै गयाँ की
हम बि कब्बी भोगला
आजादी को सुख
देश-परदेश,वार-पर
गाँव-गल्यो आली बरकत
अन्न-पाणी
दूध-घ्यू  का घत्गारा
बाटा-घाटा,गोर-गुठ्यार
डंडी-कांठी चरि तरफ
होलि बहार
पण अब्बी तक बि
पढे -लिखै ,औखद-पाणी
तमाम धाणी
जन-जरूरत
सबकुछ खुन
तरसन ही रै गयाँ हम
कतने लोगों तै  नि मिलदु एक गफ्फा
जैसे बुझि सक लादोड़ी कि आग
लैरी-लत्ती -ख़तड़ी,कमली-चदरी
जू ढकी साक हमारी नाक
ये ब्वै !!!
आजादी का इत्गा साल बाद बि
नि मिली सकणी एक कूड़ी
जैक पुटग कुचे सकां हम
घाम-पाणी  से बचनौ
हे भज्ञान  ! हे नेताजी !!
 आजादी का इत्गा साल बाद बि
हमरि भैंसी -ढेबरी अर हम
पीणा रौंला
एक ही खाल कु
गंद्लो पाणि....
आखिर कब तक ?........................
Copyright@ Dr Narendra Gauniyal