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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Monday, March 19, 2012

डा.नरेंद्र गौनियाल की गढवाली कविताएँ

डा.नरेंद्र गौनियाल की गढवाली कविताएँ

*******धीत******
जै दिन भरे जाली दुन्य की धीत
वे दिन ख़तम हवे जाण सब कुछ
उड़ी जालो चोली पराण
दुन्या को अधितोपन ही
कारण च-दुन्य का निर्माण कु
आस-उम्मीद-आन-औलाद सब धीत ही त च
धीत नि हून्दी त
डाली-बूटी-मन्खी-चखुला बी नि हूंदा
नि आन्दु बार-बार बसंत
हजारों मील दूर बटी अधितो पराण
इले त ऐ जान्द फिर-फिर
अपणा उजड़यां  घोल माँ
जब तक यो अधितोपन च
तब्बी तक च सांस
जन कि
प्यार कि धीत भोरेन पर
ख़तम हवे जान्द पूरी जीवन यात्रा
क्षण भर माँ
जै तै क्वी इत्गा जल्दी
ख़तम नि कन्न चांदु
इले दुन्या अधिती च
धीत से ही संसार च

******धीत *****(३)
भूखा तै गफ्फा
तिसला तै पाणी 
नंगा तै लत्ता
घाम-पाणी से बचनौ
झोपडी
थोड़ी देरे शान्ति
फिर भ्रान्ति
कालचक्र का दगड़ी
बढदी जान्द धीत
थोड़ी देर लदोड़ी भोरे जान्द
तीस मिटी जान्द
बदन ढके जान्द
घाम पाणी से बचे जयेन्द
फिर अशांति
फिर भ्रान्ति
आज कु शौक
भोल कि जरूरत 
जमानों कि रीत
जनम-जनम कब्बी नि पुरेंदी
मन्खी कि धीत ..................डॉ नरेन्द्र गौनियाल

 ****ब्वे *****
ब्वे !
त्यारा समणी यैकी
मैं तै
यनु लगद
जन
चट्ग्दा घाम माँ
घैनी डाली का छैल मूड़ी
बैठी गयूं
******ब्वे ****** २-
ब्वे जनि
ब्वलना माँ
 उन्नी दिखेना माँ
सकल-सीधी
मयाल्दु
हर बगत जीवन तै
रचन पर लगीं
हर समै जीवन तै
बचाण पर मिसीं
घाम -पाणी ह्यूं-आंधी
कुछ नि द्यख्दी
बस दिन-रात
कर्चोड़ा-कर्चोड़
तब बी त्वे खुनि
एक यकुली गफ्फ़ा अक्वे नि
जू भाग पर होलू
वू कखि नि जांदू
इनी त ब्वल्दी तू
तब्बी त छै सुकिं पट्ट
अपणा पोथ्लों का बाना
अन्न त क्य पाणि बी नि पेंदी छ्क्वे
रूखा-सूखा पुंगडों माँ
हल्या ब्वाडा का दगड़
तू डलफोड़ा 
हरदम घिसना रंदीन 
तेरा सूखा हड्गा
जिंदगी का उकाल- उन्दार
पैदल बाटों माँ
खुटयूँ  माँ बिनांदा-पीडांद
गारा-ढुंगा-कांडा
करनी रैंडी
अपनी ही हड्ग्यों की रसि
मुश्किल से कब्बी
सांस सैली
जनेक भ्यून्ल-तून
आमुकी डाली का छैल मूड़ी
लगीं रैंदी तू रक्कोडिकी अश छै
अबेर कु सी बौल्या
फिरबी कनि से जांदी तू
सुनिंद
ब्वे तू
हमरि धरती-हमारू आकाश छै
हमरि आग-हवा -पाणि-पराण छै
हमारा पंचतत्वों की प्रतीक छै ......................डॉ नरेन्द्र गौनियाल