उत्तराखंडी ई-पत्रिका की गतिविधियाँ ई-मेल पर

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

Thursday, December 22, 2011

गढवाळी मा जड्डू/ठंड/ पतझड़ पर कविता


गढवाळी मा जड्डू/ठंड/ पतझड़ पर कविता 
भीष्म कुकरेती
जड्डू , ठंड, पतझड़ , ह्यूं एक सत्य च . इन मा
गढवाळी मा ह्यूं आदि पर कविता हूंण जरोरी छ . लोक गीतुं मा
ह्यूं , जड्डू पर गीत छन
नंदा जात लोक गीत मा नंदा अपण ससुरासौ गुम मा ह्यूं को वर्णन करदी अर
अपण ब्व़े बाबुं तैं गाळी दीन्दी .
होलो जसी मेरी होलो ह्यूं को डिसाण
होलो जसी मेरो होलो ह्यूं को ढिकाण
.............
बुबा जी का देस देखा क्या घाम लग्युं च
ससुरा जी का देस बोई कुयड़ी लौन्खी च .
ह्यूं ठंड / पतझड़ तकरीबन सबि उन भाषाओं क कविताओं मा मिल्द
जख ह्यूं पोड़दू
जन कि अंगरेजी मा शेक्सपियर (१६०० अर १६०९) को स्वांग/नाटक 'एज यू लाइक इट' की ' ब्लो ब्लो डौ विंटर विंड '
या सोंनेट की ९७ वीं कविता ; थौमस कम्पीयन की ' हौ लाइक अ विंटर ..' (१६०९); जौन्स कीट्स की 'इन ड्रीय्रर नाईटेड दिसम्बर ' (१९२९)
रौबर्ट फ्रोस्ट की भौत सी कविताएँ ( १९२० ); जोयस वेकफील्ड, अल्डो ताम्बिल्लिनी (१९९०), डेनिज लेवरतोव लेवेर्तोव
आदि कवियुं की जड्डू, हुय्म पतझड़ पर कविता प्रसिद्ध ह्वेन
ऋतु वर्णित लोक गीतुं मा बि ह्यूं/जड्डू /ठंड/पतझड़ को बिरतांत खूब मिल्दो
नरेंद्र सिंह नेगी या वीरेन्द्र पंवार की ऋतु सम्बन्धी गीतुं मा ठंड/ह्यूं को वर्णन मिल्दो
रूसी भाषा मा कति कवियुं न जड्डू/ह्यूं/पतझड़ पर कविता रचीन जन कि जोसेफ ब्रोदस्की
न कथगा इ कविता जद्दू ऋतु पर लेखिन .अलेक्जेंडर ब्लौक की 'ट्वेल्व' कवता मा
ह्यूंदेळी रात को बखान भौत इ रोमांचक च .अन्ना अखमातोवा की ह्यूं सम्बन्धी
कविता ' वोरोनेझ ' न भौत नाम कमाई
फ्रांससी भाषा मा बि कथगा इ ह्यूंद से सम्बन्धित कविता रचे गेन .
पन्द्रवीं सदी को फ्रेंकोइस विल्लन कवि न बि ह्यूं, जद्दो पर भौत बढिया
कविता लिखीं .
एन्ड्रयु डेबिक्की न अपण किताब 'स्पेनिश पोयट्री औफ़ ट्वेल्थ संचरी :मोदेर्निटी एंड बियोंड '
मा स्पेनिश कवितों मा जड्डू /ह्यूं/पतझड़ आदि विषय पर पूरो विवरण दियुं च . इनी जौन
आर्मस्ट्रोंग की किताब मा ऐन ऐन्थोलौजी ओउफ स्पेनिश पोएट्री ' मा बि बर्फ. जड्डू /ह्यूं, पतझड़ की कवितों बारा
मा वर्णन च
नामी गिरामी जापनी कवि जाकुरेन ( ११३९-१२०२ ई) की एक लम्बी कविता
त जड्डू /ह्यूं/पतझड़ पर दुनिया की भौत बढिया कविताओं मा एक कविता च
चीन मा आज ही ना पुराणों जमानो से ह्यूं/ जड्डू , हेमंत, शशिर पर कविता लिख्याणी रैन -
जन कि चांगन के कविता (७५०-७५५ ई), कुईझोंउ (७६६-७६८), दू फु की कविता या माओ झेदोंग ,
आजौ लुइ जिया चैंग का गीत ह्वेन , ह्यूं/जड्डू/पतझड़ चीनी कविताओं मा पाए जांद
जख तलक आधुनिक गढ़वाळी कविताओं सवाल च ये विषय पर निखालिश
ह्यूं/हेमंत/शिशिर संबंधी कविता कम छन पण जु बि छन अपण आप मा विशेष छन
जन कि कळीकळी भौण/ कळकल़ो रौंस/ करूण रस का गढवाळी कवि जग्गू नौटियाल की तौळऐ
कविता एक सच्ची घटना आधारित अर अनुभव गत कविता च . जब १९६० ई. मा गढवाल मा माघ का
मैना सात दिन तलक ह्यूं पड़दो रेई त गढवाळ दुनया से बिगळ यूँ राई . वूं बगत का
वर्णन कवि जग्गू नौडियाल इन करदन . कविता मा क्वी कोम्प्लेक्सिटी नी च
सरल शब्दों मा वर्णन च, कविता बांचद दें इन लगद बल हम १९६० का गढवाळ मा पौंची गे होवां धौं!
अर कविता ऐतियासिक बि च :
बकी बातों ह्यूं
कवि : जग्गू नौडियाल
कवितौ रचना समौ :खैडा, गाँव २४ जनवरी १९६०
ये दिन याद राला ,
ह्यूं पड़ी अबा साला .
सात गती मौ का मैना ,
ह्यूं का पाड़ बंदे गेना ,
भवरेगैनी छाला . ह्यूं पड़ी अबा साला
आंदा जांदा लोक बन्द ,
म्वरणो कू आया छंद
गोरु क्या जी खाला . ह्यूं पड़ी अबा साला
ह्यूं को पाणी तातु कैक
गौड़ी भैंसी वे पिलैक
लगै द्यावा ताल़ा . ह्यूं पड़ी अबा साला
गाजी मोरि हम बि मोरा
क्वी नि आन्दु धोरा
अब ऐगे काल़ा , ह्यूं पड़ी अबा साला
पाणी अब कन लाण
बेटी ब्वारी बांदा ताण
हाथ खुटा लाल , ह्यूं पड़ी अबा साला
बूड बुड्यों ठड ह्व़ेगी
ओजू धारु लगण लेगी
कन यूँ बचौला , ह्यूं पड़ी अबा साला
मोटर सी आणि जाणि
बन्द ह्वेन सब्बी धाणी
येई गढवाळ .ह्यूं पड़ी अबा साला
छुट्टी ल्हेकी क्वी बि आलू
बाठा बटी बौडि जालू
सब्बी सास राला . ह्यूं पड़ी अबा साला
देसु वाला भैजी ऐना
कोटद्वार खौंल़े गेना
कानू कैकी राला , ह्यूं पड़ी अबा साला
उनकू को छ वख क्वी भी
छुट्टी आला जु भी
बैठी बैठी र्वाला (रवाला ) .ह्यूं पड़ी अबा साला
दगडा ल्हाला चाणs गुड़
आंसू आला तड़ बुड
सौडि जाला माला . ह्यूं पड़ी अबा साला
आध बाठा भैजी छया
ऊन चिट्ठी लिखी द्याया
नौं कनअ ह्वाला . ह्यूं पड़ी अबा साला
इस्कूल बन्द रैनि
मास्टर क्वी बि नि गैनी
ह्व़े गे ढंग चाळ .ह्यूं पड़ी अबा साला
डाळी बूटी टूटी गैन
छ्वटि बड़ी सुकी गेन
फौंका टुट डाला , ह्यूं पड़ी अबा साला
ब्योका हाल सुणा अब
इनु दुःख आया तब
पिसीं रेगी दाला , ह्यूं पड़ी अबा साला
रस्ता पौणु भूलि गेन
ह्यूं की रात मौ क मैना
तै मंडा का छाला . ह्यूं पड़ी अबा साला
कैकु घुण्ड कैकु मुंड
रस्ता खुज्याओ तख फुंड
क्वी पडू याँ भ्याला .ह्यूं पड़ी अबा साला
पौंछणे कि कख पूछ
कैक ठनडे गेन मूछ
कैकु आया ल्वाला .ह्यूं पड़ी अबा साला
दूसरा तिसरा दिन पौणा
ऐड़ी ह्वेगी कैकी धौणा
पक्या रै गेनी स्वाला .ह्यूं पड़ी अबा साला
बार बजी रात क्वी
डांड मग हाय ब्वेई
कख मन्न फाळ .ह्यूं पड़ी अबा साला
ब्योली का ब्व़े बाब बल,
पेट मची खळ बळ
कख जौल़ू भ्वाला . ह्यूं पड़ी अबा साला
जौंकू ब्यौ होण छायो
बयोउ ऊन कायो कायो
ह्यूं का गीत गाला . ह्यूं पड़ी अबा साला
कैकी भग गे गाया फंड
क्वी बुड्डी ह्वेन रांड
येई बुड्या धवाळआ , ह्यूं पड़ी अबा साला
बाजा बाजा ज्वान ज्वान
ह्वेगी ऊँ थैं अभिमान
सड़म रौडी वै छाला . ह्यूं पड़ी अबा साला
बाजा बुड्या धंस तौळ
ह्यूं मा प्वड़याँ उडी खौळ
उठाणा कि हाला .ह्यूं पड़ी अबा साला
कैका ड़्यार लखड़ नीन
कख जाण ब्वेई तीन
फंक्या झंगरयाल .ह्यूं पड़ी अबा साला
कैकु साग नी च भात
हेरी बटोळी ल्यखद बात
जग्गू नौडियाला .ह्यूं पड़ी अबा साला
कविता ह्यूं पोड़ ण से जु बि परेशानी , त्रास , दुःख, ह्वेन बताण
मा सक्षम ह्व़े च