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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Friday, January 9, 2015

हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर के इतिहास संदर्भ में आर्यों पारिवारिक जीवन

Aryan Families  in context History of Haridwar, Bijnor and Saharanpur

                        हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर के इतिहास संदर्भ में आर्यों  पारिवारिक जीवन 
                                                        History of Haridwar Part  --43   
                                            हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास -भाग -43                                                                                      
                           
                                       इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती

                आर्यजन सम्मलित परिवार में रहते थे।  वृद्ध पुरुष परिवार का मुखिया होता था। परिवार विभाजित होने पर नया मुखिया बनने /बनाने की प्रथा थी।  विलोम जाति में विवाह कम होते थे।  कभी कभार बड़ी जाति का पुरुष शूद्र महिला से विवाह करता था तो  उलझन पैदा होती थी। 
      बड़ी आयु में विवाह होते थे।  बहुपत्नी प्रथा भी थी।  कन्या शुक्ल का भी प्रचलन था तो कन्या को आभूषण आदि भेंट देने का रिवाज था। 
 विवाह धार्मिक संस्कार माना जाता था अतः तलाक की प्रथा को स्थान नही था।  धार्मिक व संस्कारों में नारी का महत्व था।  विधवाओं को मृत पति की सम्पति पर अधिकार की प्रथा थी। कभी कभी विधवाएं भी पुनर्र्विवाह भी करतीं थीं।  विधवाएं अपने देवर से या अन्य पुरुष से संतान भी जनतीं थीं। 
    समाज में नारियों को भी पढ़ाया जाता था और कई विदुषियों का वर्णन वैदिक साहित्य में मिलता है। 
 अतिथि सेवा एक धार्मिक व सामाजिक  कर्तव्य माना जाता था। 
मन, शरीर  वातावरण की स्वक्छ्ता पर विशेष ध्यान दिया जाता था।  त्याग , सत्य, उच्च  विचारों का बोलबाला था। 

**संदर्भ - ---
वैदिक इंडेक्स
डा शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड  इतिहास - भाग -२
राहुल -ऋग्वेदिक आर्य
मजूमदार , पुसलकर , वैदिक एज 
Copyright@ 
Bhishma Kukreti  Mumbai, India 9 /1/2015 

Contact--- bckukreti@gmail.com 
History of Haridwar to be continued in  हरिद्वार का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास; बिजनौर इतिहास, सहारनपुर इतिहास  -भाग 44 

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