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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Friday, August 5, 2016

सौण आलो , गदिरा भरेला

डा शिवा नन्द नौटियाल ( जन्म -1936 , भग्यान,) गाँव- कोठला , कण्डारस्यूं , ब्रिटिश गढ़वाल )
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Poetry by : Shiva Nand Nautiyal
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( विभिन्न युग की गढ़वाली कविताएँ श्रृंखला- 66 )
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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती
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जब मैना सौण को आलो
बरखा होली गदिरा भरेला , स्वीँसाट होलो गाड को।
काळा काळा बादळ आला , रंग मल्हार गाला
अंधेरो होलो चाल चलकेली उज्याळो होलो धार को।
थम थम मोर नाचला , मिंडखा टर्र टर्र बोलाला
पैरा पोड़ला रस्ता टुटला चोट होली रात को।
छाम छम के कोदो गोडेलो , कुयोड़ो होलो रात सि लगली
जबतक कुटी दाथी हाथ मा , नाम नि होलो बाटा को।
घाम की खुद सी लागली , छी छी होली पाणी की
घाम आलो कमाण पोड़ली , रंग अनोखे सौण को।
हरो तरो सभी जगा होलो , छोया फुटला जगु जगु मा
पशु पंछी पाणी पाला , कुयेड़ो फटालो जिकुड़ी को।
जब मैना सौण को आलो
बरखा होली गदिरा भरेला , स्वीँसाट होलो गाड को।