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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, February 10, 2010

बतादे सब्योंते किले.....?

बूढ़ - बुढ़य
फवड़ना मुंड कपली
थम्दरौ का बुरा हाल
जवान - जमान घर का दीपक न
ख्हेव दे अपणि जान ।

पढ़े लिखे.....
नौकरी ................
अर छोरी ..................
सबय वेकी मर्जी न ।

बूढ़ - बुढ़य बिचरा
छेन्दा गोरु का
गुयेर वि नि बणि साका ।

वो निर्भगी सब्योंते
पढ़ादु छा पाठ
कांफिडेंस लेवल ...
पोसिटिव अप्प्रोच ......
हाउ टु आचीव द गोल .....
बीच-बीच माँ अंगरेजीकु
करदू छा खूब इस्तमाल ।

बूढ़ - बुढ़य
नि समझदा छा अर्थ
समझदा छा त बस इतगा
नौनु बदु आदिम ह्वेगे
गाडी मोटर की त
सबय करदी सैर
वो आस्मांन माँ उड़दै रेगे ।

आजा लाटा भुन्या
बतादे सब्योंते किले.....?
मोरी जांदी देश का खातिर
चौड़ी हवे जांदी छाती
बीर भूमि माँ जन्म लेकी
गंदी ह्वेगे त्वेसे माटी ।

अन्न पाणि छोड़ी
गंग्जे - गंग्जेकी
बूढ़ – बुढ़योंकी बंद ह्वेगे बाच
बाटु द्य्खदरा न ही वूते
इना दिन दिखैदें आज ।

copyright@विजय कुमार "मधुर"