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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, February 7, 2010

मरना एक मौत का !

एक तरुण ने
जैसे ही अपनी यौबन की दहलीज पर
अपने पाऊ रखे ही थे कि
मौत उसे निगल गई !

पंखे से झूलती उसकी लाश
मौन होकर ......
अपने ऊपर हुए अत्याचारों का
सबूत दे रही थी !
उसका वो मुरझाया चेहरा
उसकी वो लटकी गर्दन
कह रही थी .......
तुम सबने मिलकर मुझे मारा है ?

मुझे मारा है ...
मेरी माँ/बापा कि महत्वाकंशावोने
जो बार बार मुझ पर लादी जाती रही है
बिना मेरी , भावनाओं को समझे !

मुझे मारा है.....;
मेरे स्कूल के माहोल ने
जिसने मुझे बार बार प्रताड़ित किया है
कचोटा हैं , मुझे अन्दर ही अन्दर
हीन भावानौ के बीज बौ बौ कर !

मुझे मारा है ..
मेरे सीनियरो के घमंड ने
जो मुझे सरे आम हँसी का पात्र बनाकर
बार बा र मुझे लजित करते रहे
सब के सामने !

मै,
मरना नही चाता था
परन्तु मेरे पास ....,
इसके सिवा कोई बिकल्प भी नही था !

एक बिकल्प था
" बिद्रोह का ....//"
"बिद्रोह " .... किस किस से करता ?
सब के सब तो
अपने अपने चक्रब्यू में मुझे
फसाते जा रहे थे .....
जिससे बाहर निकलना
मेरे लिए ना मुमकिन सा था !

मुझे मारा है ....
मेरे अंदर के झुझते " मै ' ने
जो लड़ते लड़ते हार गया था
अपने आप से !

मै मर गया हूँ तो क्या ?

जीने कि लालसा और
उमीदो कि किरन अभी भी
सेष है .................!

जब तुम सकब लोग .,
मेरी भावनाओं को और
मेरी पीड़ा को समझ लोगे
तब.....
तब , कोई नही मरेगा
और नहीं मारेगा
वो ........
जियेगा एक सुनहरे भविषय के लिए !

पराशर गौर
५ फरबरी २०१० ३.४५ दिन में