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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Tuesday, February 2, 2010

सरकरी लोन - लघु कथा

हे! बौऊ त्वेतेन हफोर पोस्टमैंन काका बुलाणु पदनू का घौर माँ |

किरणन चौक का किनर बटी बोली अर चलिगे | रुकमा जो जूठा भांडा लेकी छवण माँ जाण छा घंघ्त्तोल माँ पोदिगे| हे ! ब्वे पर्सीत वूनकू मंयोडर येई| चिठ्ठी होंदी त वू ज्योरून किरण का हाथ दे देनी छ. क....खी...कवी....तार....न....ना....मी....भी....निर्बई........ भांडा वखिम छोदिक दौड़ी-दौड़ी पोंचिगे पदनू का घौरमा|

मंगुतुकी ब्वारी ! बाबा मंगुतु का नोऊ एक रजिस्ट्री अन्यी | गों का पता पर अन्यी इन करा तुम्ही लेल्ल्यावा | पण ज्योरो इन बतावा या कख बटी अन्यीच|

ल्यावा अंग्वठा लगावा | रुकमा न अंग्वठा लगें अर रजिस्ट्री देदे पोस्टमैंन का हथमा| ज्योरो इन बतावा या अन्यी कख बटी छ | म्यारत डर का मार.....................................


पोस्टमैंन न सरि चिठ्ठी पैढी अर सार सुणई
बबा ! ये ब्लाक बटी अन्यीं छ | तुमरा ससुरा न वख बटी लौंन ले होलू हौज बणनुतै | लिख्युंच एक मैना भितर लोन लौटई दिया निथर वसूली का खातिर तहशील मा केस भ्यजे जालु.............. |

कर्ज ..........हमरा त स्यारा वि नि छन………..फेर...हौज… | हाँ..हाँ ज्योरो तुम त जणदै छौं म्यार ससुर जीतेन म्वरर्याँ त आठ साल ह्वेगैन | तब या रजिस्ट्री कख बटी | ब्वारी मी कुछ नि जंणदूं……… जन्दी ये कागज लायावा | मीतेन अबेर होनी छ……...हौरी जगु भी जाण अभी . ………पर ज्योरो......................... पोस्टमैंन झ्वाला उठाकी चलिगे| रुकमा मुंड पर हथ लगाकि खौलीसि रेगे | स्व्चण लेगे अब क्य हौलू..... |

copyright@विजय कुमार "मधुर"