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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Monday, February 8, 2010

जाणु त्यारु

छोड़ी हम साणी
तू जब बिटिकी गे
सूना ह्वीनी भैर -भित्तर
चौक - डंडयाली रूवे !

रात रा उण्डी-उण्डी
दिन भी छो कुछ मुरुयु मुरुयु
छैल डाँडो कु भी आज
छो कुछ बूझ्यु बू झ्यु
मुंड घुन्ड़ोक पेट धारी
बिखुंन देलिम रा रूणी रै !

रौली छे उदास हुई
ज़ाद देखि त्व़े सणी
बाटा- घाटा छा बुना
दगडी लिजा हम सणी
भित्तर खाली सुनि डंडयाली
आज डंडयाली ह्वे ................... !

सुनू सुनू बोण छो
सुनोपन सारयूमा
स्वीणा रीटि रीटि छा कण सवाल
ब्व़े की रीती आंखयुमा
क्याजी देदी वो जबाब ...
जब जबाब हर्चिगे !

धुरपलिम बैठ्यु कागा
सोची सोची सुचुदु रै
चौका तिरोली लुल्ली घिनडूडी
सुस्गुरा ही भुरुदी रै
उरख्यलोंन तापना तूडिन
भित्तर सिल्वाटी रवे !

डाँडि काँठी गाद गदिनी
छोया रवैनी दिड़ा तोड़ी की
धुरपलिम थरप्यु द्य्ब्ता बुनू
कन बिजोग आज पोड़ीगी
धार पोर जान्द देखी त्वै
गोर -बछरा , गोंडी रामीगे !

पराशर गौर
फरबरी ७ २०१० ०७०
रात ११ बजे