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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, September 4, 2016

Garhwali Poetries by Payash Pokhara, Part 4

Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry –-
                    Literature Historian:  Bhishma Kukreti
-
"लोकतंतर सारी का उज्याड़ खवा"
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गुर्राव जन लोकतंतर मड़-मड़कै गीं ।
नेतजि बल उत्तराखंड तड़-तड़कै गीं ॥
उत्तराखंड की रांठि-बांठि लगैकि ।
सर्या ल्वै निचोड़िक सड़-सड़कै गीं ॥
झ्वळि-झुंगरुछंछ्या-पळ्यौ हम जनै ।
अफु निरपणि की खीर थड़-थड़कै गीं ॥
कपळि मा डाम धार डाम बणैंकि ।
पाड़पाणिपैसा खड़-खड़कै गीं ॥
भैर-भैर लड़ैं-लड़ैं भितनां एक भै ।
गौंमा मवार सबुथैं भड़-भड़कै गीं ॥
खै पे कि लद्वड़ि-पुटिगि मलासिक ।
जुठा पत्तळा हम जनै रड़-रड़कै गीं ॥
आवा साब बैठा साब हथज्वड़ै काया ।
वो खटुला पीड़ा कुरसी चड़-चड़कै गीं ॥
वोट दियाल अब जादा नि बोल तू ।
तेरि छुयुं मा नेतजि नड़-नड़कै गीं ॥
अपणु समझिक मिल हथ क्य पखड़ । नेतजि 'पयाशथैं हड़ु हड़-हड़कै गीं ॥
@पयाश पोखड़ा ।
"आ भट्ट अंग्वाळ बोटि जा"
(
बस एकदां जरा सोच त सै)
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जिद्द्यरु छे तू भि,जिद्दमार छौं मि भि,
सोच त सैफेरि हम द्वियों थैं,
पुळ्याळु को ?
आज जरसि तिड़क्वाळ चा,भोळ पक्का द्विफाड़ चा,सोच त सैफेरि यूं चिर्वाड़ थैं,मौळ्याळु को ?
इनै न बाच न बचन,न क्वी सानी हुणी छन हथन,सोच त सैफेरि ये अबच्यौ मा,बच्यालु को ?
चिनखि-चिनखि सि बत्था,जिकुड़ि मा करीं छन कट्ठा,सोच त सैफेरि इनम यो रिश्ता,निभालु को ?
ब्यगळैकि द्विया का द्वि,सुखि नि राया कभि भि क्वी,सोच त सैफेरि द्वियूं थैं कट्ठा,करालु को ?
तेरि नाक भि तड़तड़ि,मेरि धौंण भि च टक खड़ि,सोच त सैफेरि ईं बड़अदमैं मा,निस्यालु को ?
आग सि खुद सुलगीं रैलि,जिकुड़ि मा याद बिल्कीं रैलि,सोच त सैफेरि खुदेड़ जिल्की थैं,छडालु को ?
मिल भि नजर आगास राख,तिल भि भुयां कब द्याख,सोच त सैफेरि ईं तिड़्यांण भ्याळुंद,लमडालु को ?
जिदंगि कि उमर क्य गणंदि,न मि जणंदु न तु जणंदि,सोच त सैफेरि एक दिन यखुलि,रै जालु को ?
मुंजै जालि कै दिन कैकि आंखि,अरे ! मिल वैकि बात किळै नि राखि,सोच त सैफेरि यो सोचि-सोचिक,पछतालु को ?पछतालु को ??पछतालु को ???
@पयाश पोखड़ा ।
चार मुक्तक "जिन्दगी" का मुक तक
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जिंदगी तेरि झैळ मा गैळ ग्यौं मि ।
माटु छाइ माटा मा रैळ ग्यौं मि ॥
जिंदगी की अटका-भटकों की दैन मा ।
आळा-अमलटा लखुड़ु मा जैळ ग्यौं मि॥
जिंदगी की या कन मेसिकि दुस्मनै चा ।
सरैळ म्यारु यखमै पर ज्यान कनै चा ?अब इनि समझि ल्हे त्वैमा हैरि ग्यौं मि ।
पर तेरि या जीत भि कतगा दिनै चा ?
ह्वैलि जुन्यळि रात त बौग सार दे ।
आलि कैकी याद त बौग सार दे ॥
जिंदगि कख आंद दुबरा बौड़ि की ।
लगालि त्वै धै-धाद त बौग सार दे ॥
फेरि बौड़िगे वी यकुलांस रुमुकदां ।
जिंदगी तोड़िगे वी बुरांस रुमुकदां ॥
फंखुड़ु जमदै फत्यला फुर्र ह्वैगीं ।
घोल छोड़िगे वी हिलांस रुमुकदां ॥
@पयाश पोखड़ा ।
"ख्वज्यांदा रयां"
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हम त गढ़वाळ का गरूड़ ह्वै गंवा ।
हम त कुटदरा का मूड़ ह्वै गंवा ॥
ठण्डी हवा-पाणि की नि कैर गाणि ।
हम त औड़ळ-बथौं-सूड़ ह्वै गंवा ॥
क्वी भर्वसूं नि हमरु कब बद्ळै जंवा ।
हम त आज ह्यूंदभोळ रूड़ ह्वै गंवा ॥
घमकै ल्हे हुड़कि थैं जतगा घमकांदि ।
हम त ढ्वल्कि का फुट्यां पूड़ ह्वै गंवा ॥
रौलि-गदनि-पंद्यरि सबि बाटु बिरड़ि गीं।
हम त सिक्कासैर्यूं मा बिरूड़ ह्वै गंवा ॥
पयाश पोखड़ा ।
एक भुज्यळ्या गज़ल केडो"मैती" का नौ
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अबि वो भलिकै ल्वैखाळ नि ह्वाई ।
अबि दैंण पाळि का बैंपाळ नि ह्वाई ॥
कैरले जत्गा खटकरम कैर सकदि तू ।
अबि त्यारु सर्या गौं छुयांल नि ह्वाई ॥
कै मुखल बुलाण वो कि चम्म घार आ ।
अबि बूण भज्यां वैथैं साल नि ह्वाई ॥
जै जिमदरा का बाना वो घार बौड़िना ।
दिख्यात वख एक पूळि पराळ नि ह्वाई ॥
दिन-रात कच्वरणा रैं वो मेरि खुद थैं ।
अबि बल ज़िकुड़ि का कुहाल नि ह्वाई॥
@पयाश पोखड़ा ॥
कटकिटी जिन्दगि का इतगा,
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कटकिटी जिन्दगि का इतगा,निमकणा-निमकणा कत्तर ह्वैगीं ।
कि गंणदा-गंणदा एक ना,बलकण साठ-सत्तर ह्वैगीं ॥
इत हौरि कुछ कामा का,न काजा का राया ।
बस पैना-ख्वींडा बदंळा,जिकुड़ा का भैर-भित्तर ह्वैगीं ॥
जौंल माद्यौ मा न मुण्ड नवाईं,न पुजै मा हथ ज्वाड़ा ।
टीना का सि खपटंणा लोग,आज चन्दी का छत्तर ह्वैगीं ॥
पुंगड़ों का वाडा सरकाणा का,जु सल्ली-कुसल्ली छाया ।
वो पट्वरि-परधनु का बस्तों का,सफेद कागज़-पत्तर ह्वैगीं ॥
पयाश पोखड़ा ।
"घाम"
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मिठा मनतता घाम म पीठ तपाणी रै ।
ये बाना खळ्याण म आणि-जाणी रै ॥
आंखि तड़तड़ी नि करणी घाम जनै ।
कभि अंध्यरा मा भि जप्गा लगाणी रै ॥
मुक हथगुळि लगैकि घमझैळ थामि ।
सुरम्यळि आंख्यूं मा सुरमा लगाणी रै ॥
कुएड़ि सि लौंकि चा बणदर्या आंख्यूं मा ।
खुदेड़ ज़िकुड़ि थैं कभि घाम लगाणी रै ॥
चुड़ापट्टि को घाम अर कुंगळो सरैल।
फूक मारि-मारिक घाम थैं स्यळ्याणी रै॥
@पयाश पोखड़ा ।
"तेरि माया"
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सर्र कुऐड़ि सि फ्वळेणि छे तेरि माया ।
मि लौंकदि ज़िकुड़ि मादांदण बणांदा रै ग्यौं ॥
ब्यौलि सि ड्वाला मा सर्र बैठ तेरि माया।
मि त्वैकु छूड़ी-निछुड़ि,सुनांगण बणांदा रै ग्यौं ॥
लखुड़ु अयांरा सि फुक्याई तेरि माया ।
मि ज़िकुड़ि की गिंडकी,सांदण बणांदा रै ग्यौं ॥
पुर्णमस्या जून सि चम्म चम्क तेरि माया।
मि औंस्या रात थैं,चांदण बणांदा रै ग्यौं ॥
बन बनिका फूलुला गंठ्यईं छे तेरि माया।
मि पैना काण्डों खुण,चुना-रांगण बणांदा रै ग्यौं ॥
हल्ल हल्क पैथर धम्यलि सि तेरि माया।
मि घुंघरळि लटुल्युं थैं,नांगण बणांदा रै ग्यौं ॥
आंख्यूं मा बिंगाणि बच्याणि सि तेरि माया,मि थाड़ा की सि नचाड़,बादण बणांदा रै ग्यौं ॥
कब बटैकि म्यारा सिर्वणा बैठीं तेरि माया,मि सुपिन्यों मा तेरि,मांगण बणांदा रै ग्यौं ॥
दांदण बणांदा रै ग्यौं ॥
@पयाश पोखड़ा ।
"खंतुड़ु फुक्यां सि"
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चौका का तिर्वळि बैठ्यां छवा,खंतुड़ु फुक्यां सि ॥
सग्वड़ा की ढिस्वळि घैंट्यां छवा,
ठंग्रा सुख्यां सि ॥
हैळ,तांगळ,ज्यू,जिमदरु,खैरि,पस्यौ ।
बांजि पुंगड़ि जनै पैट्यां छवा,स्वीणा लुक्यां सि ॥
खंतुड़ु फुक्यां सि ॥
सुपिना किनमजात सुनिंद प्वण्या छन ।
किळै बिजळण फर बैठ्यां छवा,कुकर भुक्यां सि ॥
खंतुड़ु फुक्यां सि ॥
खुचिलि मा त कभि पीठि मा बैठि ।
आज भि घ्वाड़ा जन कस्यां छवा,कमर झुक्यां सि ॥
खंतुड़ु फुक्यां सि ॥
पुंगुड़ु बांदा बांदा निसुड़ु निखुळि ग्याइ ।
बंसुलु अच्छण्याट बंदळु बण्यां छवा,च्यौलु ठुक्यां सि ॥
खंतुड़ु फुक्यां सि ॥
ळाळ चाट भुक्कि प्याई कखर्यळि सिवाळु,आज लूण सि पण्यां छवा,थूक थुक्यां सि ॥
खंतुड़ु फुक्यां सि ॥
ताड़ लगीं आंखि अभि बुजै नि साकी ।
जग्वळ्या जोगी जण्या छवा,प्राण रुक्यां सि ॥
खंतुड़ु फुक्यां सि ॥
@पयाश. पोखड़ा
"खंतुड़ु फुक्यां सि"
****************
चौका का तिर्वळि बैठ्यां छवा,खंतुड़ु फुक्यां सि ॥
सग्वड़ा की ढिस्वळि घैंट्यां छवा,
ठंग्रा सुख्यां सि ॥
हैळ,तांगळ,ज्यू,जिमदरु,खैरि,पस्यौ ।
बांजि पुंगड़ि जनै पैट्यां छवा,स्वीणा लुक्यां सि ॥
खंतुड़ु फुक्यां सि ॥
सुपिना किनमजात सुनिंद प्वण्या छन ।
किळै बिजळण फर बैठ्यां छवा,कुकर भुक्यां सि ॥
खंतुड़ु फुक्यां सि ॥
खुचिलि मा त कभि पीठि मा बैठि ।
आज भि घ्वाड़ा जन कस्यां छवा,कमर झुक्यां सि ॥
खंतुड़ु फुक्यां सि ॥
पुंगुड़ु बांदा बांदा निसुड़ु निखुळि ग्याइ ।
बंसुलु अच्छण्याट बंदळु बण्यां छवा,च्यौलु ठुक्यां सि ॥
खंतुड़ु फुक्यां सि ॥
ळाळ चाट भुक्कि प्याई कखर्यळि सिवाळु,आज लूण सि पण्यां छवा,थूक थुक्यां सि ॥
खंतुड़ु फुक्यां सि ॥
ताड़ लगीं आंखि अभि बुजै नि साकी ।
जग्वळ्या जोगी जण्या छवा,प्राण रुक्यां सि ॥
खंतुड़ु फुक्यां सि ॥
@पयाश. पोखड़ा
"घ्वाड़ा प्वाड़ा थाड़ा मा"
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बिधैक जी ! बिधैक जी !! 
मानियां बिधैक जी !! बिधैक जी !!!
डौंणु त्वाड़ सरकरि घ्वाड़ा कु,नि रै ग्याइ बिचरु कै लैक जी !!
बिधैक जी ! बिधैक जी !!
कन औदि रीटि आई घ्वाड़ा की,दीवाल नंगैकि पल्या छ्वाड़ा की,को ल्हाई वख तुमथैं बुलैक जी !!
बिधैक जी ! बिधैक जी !!
सरकरि चाणा न गिंदड़ा न घास,गिच्चुंद गाज़ अर पुटिगि खलास,हंणकट हुयूं च घ्वाड़ा निखैक जी !!
बिधैक जी ! बिधैक जी !!
झण्डा झालर ल्हेकि झमडाझम्डि,कुरता चिर्या त कैकि उधड़ा बण्डि,अर कत्गै त भजिन पूंछ अळगैक जी !!
बिधैक जी ! बिधैक जी !!
रंगण्या घ्वाड़ा सि लगणि छे सरकार,तबि त तुमल इनि चट्टमचुट्टै कार,सि मसकुट्टा कख धर्यां रैं लुकैक जी !!
बिधैक जी ! बिधैक जी !!
मैंगैळ त पैलि हमरि कमर कचम्वड़ि चा,अब त गोर घ्वाड़ों की खुट्टि त्वड़ि चा,अब नि ब्वळ्यां स्यवा बतावा मीलैक जी!!
बिधैक जी ! बिधैक जी !!
@पयाश. पोखड़ा
"म्यारा रिश्ता"
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अळझ्यां भि सुळझ्यां सि छन रिश्ता ।
बस ठिक-ठक ठ्यां सि छन रिश्ता ॥
खितखित खितकड़ि सि मरणां रैंदी ।
जरा बड़-बड़ा हुदीं जन जन रिश्ता ॥
समळ्दा-समळ्दा कत्गै त बोगिगीं ।
तुलबुळ्या आंसु बणि ठन ठन रिश्ता ॥
कभि मयळ्दु गितु कु गितार बणिकै ।
गोरि छोरि की पैजबी छन छन रिश्ता ॥
जो टुटणा छन न फेरि जुड़णा छन ।
म्यारा बांठा मा ऐनि कन कन रिश्ता ॥
तेरि माया मा मिल अपण्यांस द्याखा ।
घांडि सि बजणि रैन टन टन रिश्ता ॥
झम्म झिंवरैं ठण्डकरै गैन अजकाल ।
ह्यूं की डैळि सि ऐड़ि झन झन रिश्ता ॥
पयाश पोखड़ा ।
"पिर्वळिं आग"
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कभि तू म्यारा ध्वार-धरम त आ ।
स्यळेईं आग फेरि गरम त ह्वा ॥
खुदेणु नि क्वी त यो पराज़ किळै ?बिस्रयामा हि सै यो भरम त ह्वा ॥
तुमर बान पाणि सि जु भुयां फ्वळैगीं ।
वूं आंसु उकर्दा तुमथैं शरम त ह्वा ॥
मेरि आंख्यूं का मोत्याबिंद देखिजा । त्यारा आणा-जाणा कु भरम त ह्वा ॥
औडळ बथौं मा द्यू बाळिक त देखि ।
हवा दगड़ जरा तड़म-तड़म त ह्वा ॥
खरसण्यां सि बांजि सि जिकुड़ि मा ।
पिंग्ळा लाल फुलु की मरहम त ह्वा ॥
@पयाश पोखड़ा ।
"खुद"
आंख्यूं-आंख्यूं मा वा सदनि किळै पुछणि छे बल ॥
तुमरि खुद मा निंद हमरी किळै टुटणि 
छे बल ॥
खुदेड़ पराण की खुद भि बक्कीबात हूंद द्याखा ।
सर्या सरैल फर किसळि सि किळै हिटणि 
छे बल ॥
तेरि खुद आज दुन्यां मा तमशु सि ह्वै ग्याइ ।
ईं खुद थैं तु जिकुड़ि मा किळै किटणि 
छे बल ॥
कभि कुटमुणों का ध्वार त कभि फुलु का दगड़ ।
किसरण्यां सि तुमरि खुद किळै रिटणि 
छे बल ॥
इकैकि म्याळि कैकि बिराणां छवां तुमरि खुद ।
समळ्यौण्या सि भडुळ्यूं थैं किळै छिटणि छे बल ॥
'पयाशकी जिकुड़ि मा दुपदुप्पी आग लौंकैकि ।
मिठु दूध जन खुद तुमारि किळै खिटणि छे बल ।
@पयाश पोखड़ा ।
एक गज़ल "लाल माटा की धार" का नौ
**********************************
कभि अफुथैं झंझोड़-झंझाड़ि की देखी ॥
दगड़्यों दगड़ मरोड़-मराड़ि की देखी ॥
जु खुद सदनि जिकुड़ि फर बिल्कीं राया,द्विया हातुन चिरोड़-चराड़ि की देखी ॥
तुमुल क्य चिताण कै फर कन-कन बीत,एक बुन्द ल्वै निचोड़-नचाड़ि की देखी ॥
बस द्वि लतड़ाग त छाई म्यारु गौं-गल्या,उल्यरा पराण फिरोड़-फराड़ि की देखी ॥
गुंदक्या खुट्यूं तिड़क्वळि प्वणि होलि,खुदेड़ जिकुड़ि तिरोड़ि-तराड़ि की देखी॥
लाल माटा की धार जनै ऐजै तू "पयाश",स्कुळ्या प्यार खरोड़ि-खराड़ि की देखी॥
@पयाश पोखड़ा ॥
सौदेर किळै हैर गीं ?
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कूड़ों की धुरपळ्यूं मा,लोग कन बुजिना धैर गीं ।
तंगत्याणी छन दिवली,
अर बुन्याद भि डैर गीं ॥
जनि कूड़ी फर लग्यां,मकड़जळा छडाण बैठू ।
उनि भीतर लुक्यां लोग,खळ्ळ भाजि भैर गीं ॥
खुट्टि प्वड़दै गौं मा,वूंकी रंगमत उड़ि ग्याइ ।
पत्म्वरी हळ्दण्यां मुखड़ि,अपणै उज्याड़ चैर गीं ॥
हैंस्दा-हैंस्दा पुछिन उंका,हाल-चालअसल-कुसल ।
जरसि बात मा वो भग्यान,सर्या गौं मुण्डम धैर गीं ॥
हैंसि-खुसि न्यूति की,अपणा घौर बुलैनि जो ।
पर आंदा-आंदा फेरि वो,झणि किळै ठैर गीं ॥
दाइ-दुस्मनु की बत्था,कभि बुरी नि लागी जौं,मेरि भलि बात भि वो,अपणा अन्ठा मा धैर गीं ॥
गौं की पन्देरि थैं वो,कभि नि छोड़ि साका ।
लोग परदेस भजणा को,नयरी की नयरि तैर गीं ॥
बाब-दादा की कूड़ी फर,अंग्वाळ घाळिक रैन वो ।
पीठ फरकान्दै लोग ता,बूण परदेस जनै सैर गीं ॥
रुप्या कमैन परदेस मा,मोल ल्हीनि सब्या धाणि ।
पर गौं का हवा पाणि दगड़,सौदेर किळै हैर गीं ॥
सौदेर किळै हैर गीं ?????
@पयाश पोखड़ा ॥
"जिन्दगि एक घिंडुड़ि चा "
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सर्या दिनमान तिबरि मा च्यूं-च्यूं कै च्यूंच्यांणि रैन्द घिंडुड़ि ॥
कभी भैर कभि भितर ठुमुक-ठुमुक आणि-जाणि रैन्द घिंडुड़ि ॥
ढकींण-डिस्यांण छोडिकि भैर छज्जा मा आ त सै ।
कन उदंकार ह्वै ग्याइ दुन्यां मा इन बिगांणि रैन्द घिंडुड़ि ॥
कभि आरू की डाळि मा त कभि पंयां की फौंकी मा ।
सुबर-सुबेर सर्या दुन्यां कु हाल-चाल बताणि रैन्द घिंडुड़ि ॥
खौळ्यूं-बौळ्यूं सि नि रौ अब हैंसि खितखड़ी मारि ले ।
उरख्यळा मा जैकि खत-खत किलै खखताणि रैन्द घिंडुड़ि ॥
दगड़्यों कु दगुड़ त्वड़ै कु दुख कैथै जि नि राई ।
कख लगीं छे तू भि सुदि-सुदि मन थैं ब्यळमाणि रैन्द घिंडुड़ि ॥
झणि कब क्वी त्वैकु ज़िबाळ लगै द्या देखिले भारे ।
अणब्वळ्या दगड़्यों दगड़ दुन्यादारि निभाणि रैन्द घिंडुड़ि ॥
फुर्र उड़िकै ल्हे आंद म्यारा सौंजड़्यों कु रंत-रैबार ।
खुदेड़ पराणा की जिकुड़ि को कबलाट चिताणि रैन्द घिंडुड़ि ॥
ल्वैखाळ कैरिदीं त्यारा फंखुड़ु ढुंगी मारि-मारिक ।
हैंसदा-हैंसदा मवार कल्यो सि किलै पुर्याणि रैन्द घिंडुड़ि ॥
द्वार मोर खुल्ला राखि झणि कब क्वी न्यूतेर ऐ जाव ।
खल्लि ऐई खल्लि जैलु अंग्वठा सि दिखाणि रैन्द घिंडुड़ि ॥
@पयाश पोखड़ा ।
एक गज़ल--
"
हिटदी जिंदगी"
**************
अपणा बिरणा मी दगड़,अब क्वी रा नि रा ।
यखुलि-यखुलि पैटि ग्यौं, 
अब क्वी आ नि आ ॥
मेरि आंख्यूं मा तेरि मुखड़ि की 
मौळ्यार दिखेणि चा ।
म्यार भांवल मेरि समणि,अब क्वी रा नि रा ॥
आज मिथैं भकोरि-भकोरिक,छक्वैकि रुण देदि ।
भोळ-परबात मेरि आंख्यूं मा,पाणि आ नि आ ॥
बिन ब्वळ्यां नि रै सकदु मिल कतै चुप नि रैणु ।
मेरि छुयूं मा हुंग्रा,अब क्वी द्या नि द्या ॥
फुण्डै सैर पैलि मिथैं,पुटिगि पूजा करण दे ।
म्यारा तरफल बासी तिबसि
अब क्वी खा नि खा ॥
वो बाटु बता जो ठ्यट 'पयाशका
घार तलक जांद ।
फेर धार पोर बियण्यां,अब क्वी आ नि आ ॥
हिटदि जिदंगि की हिटै सदनि,तिर्वळि-तिर्वळि राया ।
हिटदा-हिटदा जिदंगि बाट मा,अब क्वी आ नि आ ॥
@पयाश पोखड़ा ।

-
Copyright @ Bhishma Kukreti Mumbai; 2016
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