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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, September 4, 2016

निरमसि भंण्जु

(प्रणाम ऐसे चरित्र के लिए)
Garhwali Story by: Mahesha Nand
Garhwali Story by: Mahesha Nand
(Internet Presentation and Interpretation: Bhishma Kukreti)
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पूसौ मैना लग्यूं छौ। सच्चि ट्यस्ट दींणू पौड़ि जयूं छौ। वे कि अगल्यार आंद-आंद रुमुक पोड़ि ग्या। ब्यखुनि दां सर्ग घिर्या अर जपजप-जपजप ह्यूं पुंण बैठि ग्या। सच्ची फूफू रांदि छै पौड़ि। वु खुड़बुट अपड़ि फूप्वा ड्यार ऐ ग्या। 
अपड़ा भतिजा द्येखी फूफू खिलपत ह्वे ग्या। वीन वे कि आँखीचौंठी अर गल्वड़्यूं कि चुट्ट-चुट्ट भुक्कि प्या अर वे थैं निवता खंत्ड़ा पेट बैठाळि द्या। तबSरि सच्यू ममा निम्जा(थैला) तंणसट्ट कै लदर-बदर(खाने की बहुत सरी वस्तुएं) ल्है कि ऐ ग्या। वेन पुलबयूंम् भंण्जा द्येखी बोलि--"भंण्जा! त्यारु खांदा मंगौ नाळु कट्यूं च रै जंणि। खांदा-पींदा जोगो छै। अब्बी त्वे चरचर-बरबरा लूंण मा रळीं कछब्वळि घुळांदु। एक कत्तर बैं त हैंकु दैं खग्वटा घाल अर लबळांणी(चबाना) रौ।" सच्या ममै भड़यां बखरै आंसि(सिकार) ल्हीं छै। 
वु कछब्वळि रंळ बैठि अर सच्चिन् बोलि-- "ममा जी! मि भैरथब जांणू छौंसरबट आंदु।"
सच्चि कुलंणा पैथर ग्या। बिंड्डि अबेर ह्वे ग्या पंण सच्चि भितर नि आ। वे थैं सौब जग्वळां। कछब्वळि राळी पत्तौं मा धरीं। समसूत रात ह्वे ग्या पंण सच्यू जन ब्वलेंद छिपनकाळ ह्वे हो। वेकि फूफू अर ममौ खुंणै द्वासि-व्यासि(मन की उद्विग्नता) ह्वे ग्या। गासि जूदा लगि ग्या वूं थैं। 
सर्रा गौं मा खकला-बखला मचि ग्या। ह्यूं पुंणू अर गंवड्यौं कि तुंद्यंणि-बिंद्यंणि (भागम-भाग हल्ला-गुल्ला) मचि ग्या। सगळि रात सि तै थैं ख्वज्यांणा रैनि पंण बुरा सौं जु तै कु भ्यूंत(रहस्य) मीलि हो। बार-बन्या सुकम्वळ् खयेंणा। सौब ब्वन्ना कि बागन दंमळै यालि जंणि वे थैं। 
हैंकदिन बिनसिरिम् चार-पांच बैख सच्चि ख्वज्यांणू वे कगौं ग्येनि। सच्चि दिखौ पांडा फस्सोरी सिंयू। वे कु ममा भरि फिंगरे ग्या। बेन सच्ची ब्वे कु बरगबान कै कि बोलि--- "लोळू खड्यूं छ्वारा द्याखदिहैं! यु क्यांकु त हमSरा ड्यार आ अर सुरक किलै यु लुकां आ। किन्मजात ये खुंण नरनरि(सख्त) कछब्वळि फिरंयी छै। ये कु त फीरि-फीरीयेन हमSरि बि निखंणि करा। सगळि रात हिंयेरन् (बर्फीली हवा) हम अल्डकर्ये ग्यां।"
"
द भुला!" सच्ची ब्वेन खप्प खौळ्येकि बोलि---- "यांलै यु लुकी आ। मी बि भरि खिज्यौं यु खुंण। यु समसूत रात्म ह्यूंमुंड्यंम् (गिरती हुई बर्फ की बूंदें) आ पौड़ि बटि घौर। पंण भुला बुरु नि मांणि। यु मोरि जालु पंण वुक्ख सप्पा नि रांदु जक्ख क्वी सिकार खांणू हो। भरि क्वांसा सरेलौ च यु। ये थैं जीबन फर भरि कळकळि लगद।"
सच्यू ममा सात ख्वला एक्कि खोल पोड़ि ग्या।

Copyright @ Mahesha Nand, 2016

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