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Sunday, September 4, 2016

Garhwali Poems by Dr.Pritam Apachhyan

डा . प्रीतम अप्छ्याण  कि 45 गढवाली  कविताएँ

Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry –-160    


                Literature Historian:  Bhishma Kukreti


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१०१
गजब कर्याले लाला जीटूटि नि बर्खै धार
भैर भितर बी कन कै जौंलुतपुत ह्वेगे सुलार
(मौसम ने गजब कर दिया लाला जीबारिश की धार नहीं टूटी है. अब अंदर बाहर जाना भी मुश्किल हो गयासुलार पजामा भीग कर लुतपुत हो गया है)
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१०२
गुरौ सि सळ्के उमर मेरीद्यो जनु बदळे रूप
ज्वानि चौमास्या घाम सीजीवन चीणा सि झूंप
(मेरी उम्र सांप जैसी सरसराती निकल गई और आसमान के मिजाज सा रूप बदलता रहा. यौवन तो बरसात की धूप जैसा अल्प था. पूरा जीवन ही चीणा (झंगोरे जैसा एक अनाज) की बाल सा लटकता ही रहा)
१०३
कखड़ी झ्यालों गैणि छाराळि करौ द्वी चार
ग्वेर छुळदुमी चोरि खैदेखि नि बार तिवार
(ककड़ी की बेलों पर दो चार छोटे फूल (करौ या मादा पुष्प) गिने थे. बड़ी उम्मीद थी कि ये बड़े होंगे पर नटखट ग्वालों ने पहले हीचोरी से खा दिएबार त्योहारों का ध्यान भी नहीं रखा)
१०४
तीड़ि कपाळ जमीन बीरुसै छयो जब घाम
रगड़ बगड़ अब मेघों कीपाणि का ऐड़ा डाम
(उस वक्त जब सूरज गुस्साया था तो प्राणियों के सर व भूमि तक फटने लगी थी. अब बादलों के गुस्से ने तोड़फोड़ मचाई है. पानी के ठंडे डाम(धातु से शरीर को दागना जो सामान्यत: गर्म होता है) से जीवन दागा जा रहा है. हे ईश्वर ऐसा क्यों?)
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१०५
च्यापति चीनी मांगि कीच्याइ बणौंदो साब
कख बिटि आलो दूध परगौं कमचूस खराब
(साहब लोगो आप आएस्वागत है. चायपत्ती और चीनी मांग कर आपके लिए चाय तो बना देता पर...क्या करूं साहब! दूध कहां से लाऊंआप नहीं जानते कि यह गाँव बड़ा खराब व कंजूस है. अब आप ही कहिए चाय कैसे पिलाऊं? (इस रूपक में साहब वोटर हैंकंजूस विपक्ष है और कहने वाला सरकार है))
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१०६
मन्खि बड़ो विद्वान बलखड़ु ह्वे चैन न लेटि
दैजा मा फुक्दो ब्वारि तैंगर्भ गळौंदो बेटि
(सुना है कि मनुष्य बड़ा विद्वान होता है पर लगता नहीं. उसे तो किसी तरह चैन नहींन खड़े होकर न लेटकर. ऐसा आदमी खाक विद्वान है जो दहेज में बहू को जला देता है और गर्भ में बेटियों को गला देता है?(यहां आदमी माने स्त्री-पुरुष दोनों हैं जो ऐसा करते हैं))
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१०७
जब भी देखा व्यस्त छतेरो मुबाइल फोन
गळाकंठी कू क्वोच वोबतौ त झर्क नि रौन
(जब भी देखता हूंतेरा मोबाइल हमेशा व्यस्त रहता है. तेरा ऐसा गले का हार वह है कौनएक बार उसके बारे में बता दे तो भ्रम-शक सब दूर हो जाएंझर्क मिट जाए)
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१०८
उमर ढळकणी ब्वौल धौंसच तेरि मंशा क्याच
कैकि जग्वाळ्या बैठिं छबाळि माया को ल्याज
(हे रूपसी! उम्र ढलने लगी हैसच सच बता तेरी मंशा क्या हैबचपन के प्रेम का लिहाज करके तू किसके इंतजार में बैठी है?)
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१०९
झौड़ बर्खा की धीड़ु काअब ह्वे चिटमिट सर्ग
शाळि पंदेरा दनकणामिटी आज का झर्क
(सुबह से लगातार बारिश की झड़ियों के झड़ पड़े पर अभी आसमान जरा चिटमिट होकर थमा है. इसी बीच दौड़ दौड़कर फटाफट सब लोग गौशाला व पानी के धारों का काम निबटा आए. अब आज के सारे झर्क (चिंताएं) मिट गए हैं)
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११०
अपणी डिनर पार्ट्युं मामैकडॉवल का पैक
पेण त प्या या भाड़म् जातुम डेनिस का लैख
(सरकार ने गजब कर दिया है बोडाअपनी डिनर पार्टियों व होटलों में तो इनके मैकडॉवल के पैक चलते हैं. हमें कह रहे हैं कि तुम लोग (माने जनता) डेनिस के लायक ही होपीना हो तो पियो वर्ना भाड़ में जाओ. ये भी कोई बात हुई.....
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१११
जल थल नभ चर अचर अबप्रभू! त्यारै सार
मंशा सबुकी पूरि होतरि जौ सब संसार
(हे बाबा केदार! जलथलआकाश में रहने वाले सभी चर व अचर अब तुम्हारे ही भरोसे हैंतुम्हारे ही सहारे जीते हैं. सबकी मनोकामना पूर्ण हो और यह संसार तर जाएयही कामना है)
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११२
दिवा प्रेम को झपझपकन कै ठोसूं गुल्ल
प्रभू! हर ले डर पिड़ाजरा हैंसण दे मुल्ल
(प्रेम का दिया तो रात दिन झपझप कर रहा हैअब बुझा कि तब बुझा. उस दिए का गुल्ल (कार्बन) भी कैसे हिलाऊंहे भगवन! मन से डर और पीड़ा को हर लीजिए तो थोड़ा सा मैं भी मुस्कुरा लूंगा)
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११३
परसि हैंसि ब्याळी बच्यैआज घुस्ये की काख
भोळ कुजाण लबारुं कोज्यान बचै की राख
(परसों हँसी थीकल बात की और आज सरक सरक कर बगल में बैठ गई है. हे सीधे सरल नायक! कल को ये लबार (बेशर्म) क्या करेंगीपता नहीं. इसलिए तू संभल जा और अपनी जान बचा कर रख)
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११४
जब बिटि नेता ह्वे दिदाबौजी दूण च शिफ्ट
पितरकूड़ि तैं मीलिग्यासगत ताळा कू गिफ्ट
(जी हां साहब! यह सच है कि जिस दिन से बड़े भाई नेता हुए हैंउसी दिन से भाभीजी देहरादून शिफ्ट हो गई हैं. बाल बच्चों सहित सब वहीं चले गए. वहां से गांव के पित्रगृह को मिला है - एक बड़े ताले का उपहार)
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११५
वी छ तु पैली दां वळोबोडी रखणू ख्याल
बांदर सूंगर भगौ निथरऐंसू फोड़लु कपाळ
(ओहो! अरे बेटा नेता! तू वही है ना पिछली बार वाला. तब तो बड़ी बड़ी हांक रहा था. बोडी (ताई जी) मेरा खयाल जरूर रखनामैं सारे कष्ट दूर कर दूंगा. पर तू कान खोल के सुन ले! इन बंदरों व सूअरों को यहां से भगा वर्ना इस बार के चुनाव में मैं तेरा सर तोड़ दूंगी (कतई वोट नहीं दूंगी))
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११६
कळ्त कळ्त कतोळिगेप्रेम कु पाणि पराण
ज्वानि जुटाये जोति ज्यूजीति जगत क्या लाण
(मनप्रेम के जल को कळ्त कळ्त (हाथों से पानी हिलाने की ध्वनि) हिला गया. इस जीवन में यौवन जुटाकरप्राण रूपी बैलों को जोतकर सारा संसार जीत लिया. अब इन बातों को कहां तक बताऊं!)
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११७
दलबदलूं बिस्वास्युं काटकम भर्यां छन पेट
वोट का ऐंसू ब्वाला दिदाक्या हूण चैंदा रेट
(इस राज्य में दलबदलुओं और विश्वास देने वालों (१८ मार्च के बाद)दोनों के पेट (जेब) खांच खांच कर भर गए हैं. दाज्यू! आप बताओइस बार "वोट" के रेट (जैसे फ्लोर टेस्ट के थे) क्या होने चाहिएफ्री में देकर कोई फायदा है क्या......)
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११८
अंताज्यूं छौ तेरो मीया फिर ह्वे संजोग
आणिकारि की छ्वीं किलैलाणा गौं का लोग
(तुमने मुझे पहले से अंदाजा (ताड़ कर रखा) था या फिर हमारा मिलना मात्र संयोग की बात थीये गांव के लोग इस तरह की अनहोनी बातें क्यों सुना रहे हैं?)
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११९
ज्यूड़ा तोड़ि की मुचि गयांकनकै ठेकेला बागि
अजक्यालूं गळाकंठि छनकुर्च्यूं गुसैं नि जागि
(हरी भरी सार (सत्ता भी हो सकती है) देखकर 'बागीयानि भैंसे अपनी रस्सियां तोड़कर भाग रहे हैं. ये बिना नकेल के किस प्रकार रोके जाएंगेआजकल ये किसी के (पार्टी भी संभव) गले के हार बने हैं पर....पिछला मालिक (सत्ताधीश भी संभव) बेचारा इनकी मनमानी मार से अभी तक उबर नहीं पाया है)
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१२०
टुप्प बुरांसी फूलों माछ्युंतमेल्यों का बीच
उड़े गगन बगि छीड़ौं माबचपन जनु क्वी नी 
(
कभी बुरांस के फूलों मेंतो कभी चीड़ के बीज(दाम या ग्वदामखोजने में लगा रहता हैकभी उड़कर गगनमंडल पहुंच जाता है तो कभी ऊंचे झरनों में बहने लगता हैअहामेरे बचपन तेरे जैसा कोई नहींकोई नहीं!)
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१२१
आँखि मिलै की आँखि ढकीबौग सरैगे आँखि
कळछणि वा छ्वीं पुछदरीरयीं  सौदी आँखि
(
आँखें मिला कर फिर ढक दी और फिर उन्हीं आँखों ने किनारा कर लियाफिर भी घनी काली  तमाम बातों को पूछने वाली वे आँखेअभी भी एकदम ताजी ताजी हैं)
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१२२
डांड गंगाड़ों धार धरूंमन मन मा हो प्रीत
खेल बच्यां रौ नौनु काअर होठूं का गीत
(
पर्वतों  गंगाघाटियों मेंकहीं भी होंहर मन में प्रेम  अपनत्व होबच्चों के खेल कौतुक जिन्दा रहें  प्रत्येक होठों पर गीत थिरकते रहेंईश्वर से ऐसी ही कामना करता हूं.)
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१२३
जीवन की ईं चक्कि मामिन पीसे दिन रात
ल्वे छौंकी की दाळ अरआँसु उमाळी भात
(
जीवन की इस चक्की में मैंने दिनों  रातों को बारीक करके पीसा हैयह आटा दिन-रातों से बना हैयहां तक कि खून का छौंक लगाकर दाल बनाई है और आँसूं उबाल उबाल कर भात पकाना पड़ा है. )
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१२४
गोरो रंग तू ऐंठि नाउदास ना हो काळु
चाम का चारै दिन होंदागुण बीजांदो उज्याळु
(
हे गोरा रंगतू अधिक घमंड मत कर और हे कालेतू इतना उदास मत होचमड़ी का रंग चार ही दिन रहता है प्यारेचमकदार उजाले को तो गुण ही जगाते हैं और संसार में उगाते हैं)
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१२५
बर्त का दिन दे गयां सबीअल्लु गोभि की ढेरि
जै दिन भूकन् कबलायूंवे दिन कैन नि हेरि
(
समय की कैसी बलिहारी है कि जिस दिन मेरा व्रत थाउस दिन सभी लोग मुझे आलू-गोभी (खाने कीढेरियां थमा गएजिस दिन में भूख से बिलबिलाता रहाउस दिन कोई देखने तक नहीं आया)
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गढ़वाळि भाषा कि बधाणि अन्वार देखा शैबो......
ठिक्क कै रे द्याळ अैगा
दिल्लि मु बल घ्याळ ह्वेगा
का  मिलणी नौकरी आब
भान मज्यैकी काळ ह्वेगा
ह्वेइ जौलौ कुछ  कुछ ता
पुंगाडा मेनत वाळ ह्वेगा
च्या पकोला भुजि उगोला
गोर भल दुद्याळ ह्वेगा
मौऊ जमीन कुछ नी
किलै हाम देश्वाळ ह्वेगा
गंगसार्या बौ भल किसाण
बाल बच्चूं वाळ ह्वेगा
भात माछौं ह्वोटल चल
मछरदैनी जाळ ह्वेगा
ताबै हामूं घ्यप्सु ब्वना
गौं मा बस डुट्याळ रैगा
(C) 
डॉप्रीतम अपछ्यांण

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१२६
भलु करि दगड़्या त्वैन बीटोड़ि हमारी आस
कोरि कोरि की खायो मीजाणी चलमलो गास
(
अच्छा किया  दोस्तहमारी आशाओं को नष्ट करके तुमने अच्छा कियातुमने मुझे स्वादिष्ट ग्रास समझ करखोद खोद कर खायाअच्छा किया)
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१२७
लोग ब्वदिन तौं कांठौं माअंछर्यों को बल नाच
सासु मैंस की फूकिं क्वीताल डुबाईं क्वा 
(
लोग तो बहुतेरे कहते रहते हैं कि उन पर्वतों में बलवन परियां नाचती रहती हैंपर मुझे लगता है पता नहीं बेचारी कौन होंगीसास-पति द्वारा जलाई गई या गंगा-तालों में डुबाई गई कोई अभागन!!!)
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१२८
झौड़ सकणसट्ट ज्वानि माबर्खिनि भादो सौण
धीत ले माया फेर कबीईं ज्वानीन् नि औण
(
यौवन में जबरदस्त झड़ी पड़ी तो लगा कि सारे सावन भादो बरस पड़े हैंमित्रइस प्रेम को तृप्त होकर पी लोइस यौवन ने फिर दुबारा नहीं आना है..)
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१२९
लप्प लप्प लपल्याण लग्याटिगट पाण कू जूंक
मिन  जाण विधानसभातू अपणो घर फूंक
(
वैसे ही चौमास लगा हैऔर वैसे ही टिकट पाने की मारामारी में जोंक लपलपाने लगी हैंसबकी एक ही इच्छा हैमैं तो विधानसभा जाऊंगा और तुम अपना घर फूंक कर भी मुझे पहुंचाओगे)
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१३०
म्यारा उत्तराखंड त्वेहाईकमाना जौर
अब्बि नि छोड़्या त्वैन कखी नि मिलणी ठौर
(
हे मेरे उत्तराखंडतुझे हाईकमान रूपी बुखार चढ़ गया हैबिना हाईकमान के ऑर्डर के तू सांस भी नहीं ले पा रहा हैयदि तूने अभी भी ये हाईकमान वाले नहीं छोड़ेतो समझ ले कहीं ठौर ठिकाना नहीं मिलने वाला है)
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आजादी 
लोक की वाणी में चिंता भीगुस्सा भीधाद भी...
अब  ख्वलणै पोड़ाला गिचों का ताळा
अब  ख्वजणै पोड़ाला कुछ उज्याळा
ईं काणी अजादी मा ईं ल्वेलिती व्यवस्था मा
गुजारु नी आज  भोळ
गरीब गुरबौं कि मवासि गोळ....
भांति भांति की रीत भांति का लोग
हम मिलि जुली  रौंदा  छा
भांति भांति का डाळा भांति का फूल
यखचटकिला खिलौंदा  छा
मिलिजुली अजादि पाई पर गुलाम हथूं देद्याई
अब  करणै पोड़ालो कुछ उयार
अब  बगौणै पोड़ली नै बयार
ईं काणी अजादी मा.......
बनबनी का बौण बनबनी को पाणि
चुचौभलि सांजोळ गंगा जि छै
बनबनी की थाति जाति बंडि रिवाज
लोगभली धाण पाण धंधा भि छै
ल्वे बगै गरदन कटै पर देश अब यु देश नि रै
अब  म्यळौणै पोड़ालो फेर मेळाग
अब  पुजौणै पोड़ाली नै नवाण
ईं काणी अजादी मा........
डॉप्रीतम अपछ्यांणदूनागिरीअल्मोड़ा

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१३१
धर्ति हिमालै थामि द्यूंउड़दी बग्दि बयाळ
थामि नि साकू पर कबीजरा सि मनौ उमाळ
(
मैं संपूर्ण धरतीहिमालय  यहां तक कि उड़ते  बहते बयाळों  हवाओं तक को पकड़ सकता हूंपर कभी भी यदि किसी को नहीं रोक सकाबस में नहीं रख सका तो वह मेरे 'मन की भावनाएंथीमन रोकने पर भी नहीं रोकसका)
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१३२
नेता जीतणा घमाघमहायहारणू देश
कख या लिजाली ग्रहदशाक्वो सुलझालो मेस
(
इस प्रदेश  देश में नेता फटाफट जीतते जा रहे हैं परंतु हायदेश  जनता हारती जा रही हैऐसी ग्रहदशाएं पता नहीं हमें कहां ले जाएंगीकौन हमारे उलझे धागों को सुलझा पाएगा?)
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१३२
नेता जीतणा घमाघमहायहारणू देश
कख या लिजाली ग्रहदशाक्वो सुलझालो मेस
(
इस प्रदेश  देश में नेता फटाफट जीतते जा रहे हैं परंतु हायदेश  जनता हारती जा रही हैऐसी ग्रहदशाएं पता नहीं हमें कहां ले जाएंगीकौन हमारे उलझे धागों को सुलझा पाएगा?)
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१३३
मंत्री रुप्या पद गनरत्वे क्या चैंद तु बोल
त्वी  म्यारू पाड़ि भुलाथाम सत्ता कू घोल
(
मंत्री बना दूंरुपयेमालदार विभागगनरघोड़ाबंगलातू बोल तो सही जो मांगेगा दे दूंगातू मेरा प्रिय पहाड़ी भुला हैहे विधायक जी बस मेरी सत्ता के घोंसले को पकड़ कर रखना.)
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१३४
बेटि ह्वयां को हर्ष चादिशा खुलीगे प्यारि
दैणि हुये माँ नंदा तूसुखि रख बेटी ब्वारि
(
बेटी होने का यह कितना महान सुख है कि सारी दिशाएं खुल गई हैजिनकी बेटी नहींउनके लिए सारी दिशाएं बंद हो जाती हैंहे माता नंदातुम हमेशा इनके दाहिने रहकर सभी बेटी-बहुओं को सुखी रखना)
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१३५
राजनीति का पर्दा यीनकटा हूंदन भारि
यकी डोर मा कस्यां भितरभैर चुटौंदन गारि
(
ये राजनीति के 'पर्देबहुत ही बेशरम  नकटे होते हैंअन्दर ही अन्दर ये एक ही डोरी से कसे होते हैं पर बाहर जनता के लिए पत्थर बरसाते रहते हैं.
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१३६
कैका गिचों पर ताळु नीकैका कच्छों पर नाड़ु
चुनौ भ्याळ यूं लमडै देचौबटा खड्यो गिंदाड़ु
(
इस राज्य में कमाल के नमूने हैंकिसी के मुंह पर ताला नहींजो मर्जी वही कह दे रहे हैंकिसी के कच्छों पर नाड़ा नहीं है (पाठक समझ रहे होंगे). हे राज्य के वोटरइस बार इनको चुनाव की घाटी में लुढ़का दे  इनके नाम पर चौराहे में छल पूजने का 'गिंदाड़ूगाढ़ दे)
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१३७
राजा त्यरा बी चार दिनकर ल्हे लाठीचार्ज
आलो गरीबूं घत्त बीवे दिन द्यूंला रिचार्ज
(
अरे आजकल के राजातेरे भी चार दिन अच्छे चल रहे हैंकर लेजिस पर मर्जी लाठीचार्ज करवा ले पर....ध्यान रखनाहम गरीबों का भी समय आयेगाउसी वोट के दिन तुझे भी रिचार्ज कूपन (???) थमा देंगे)
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१३८
मैंन गंछ्याये गीत यूमैंन मिसाये भौण
पर ल्हीजा गैल्याणी तूमाणी मेरि समळौण
(
हे साथीयह गीत मैंने बनाया और इसकी धुन भी मैंने ही बनाईपर तुम इसे ले जाओमेरी ओर से तुम्हारे लिए यही यादगार निशानी है)
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१३९
सूनु पैरै की भूलिगेचांदि पैराईं याद
प्रेमै अर्जी पौंछि कबझैर घुट्यां का बाद
(
यह भी क्या अजब संसार है जहां आदमी उसे भूल जाता हैजिसे सोना पहनाया (विवाहितापरंतु उसे याद करता है जिसे चाँदी पहनाई (बिना विवाह वाली स्त्री). निर्मोही पुरुष ऐसा कि प्रेम करने भी तब पहुंचा जब जहरनिगला जा चुका था)
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१४०
मान कि रक्षा कर्द गैआजीवन श्रीराम
रूंदौं हैंसाणू कृष्ण रेजीवन भर निफराम
(
श्रीराम आजीवन मान  मर्यादा की रक्षा करते रहेअपने जीवन से उन्होंने मर्यादा का मानक बनाया और पूरी उम्रभर कृष्ण रोते हुओं कोअत्याचारों से पीड़ित लोगों को हँसाते रहेये दोनों हमें जीवन विद्या सिखाने वाले थे.)
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१४१
बर्खा बूंदौं थामि कीपौंछि जि क्वो असमान
मन्खि मरे धरती अमरकनि माया भगवान
(
बारिश की बूंदों को पकड़कर कौन कभी अासमान में चढ़ सका हैयह सब तो ईश्वर की माया है कि उसने कैसी कैसी अद्भुुत रचनाएं की हैंयही कम अचरज है कि मनुष्य आते  जाते रहते हैं पर धरती अमर रहती है!)
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१४२
राजि रखी नारैण रेतैं बाँदौ तकधीर
तनि कबि कनि रै छै अहामेरि बुढ़ळी तस्वीर
(
हे नारायणउस सुन्दरी के सुखों  भाग्य को कुशल मंगल रखनाएेसी ही तस्वीर कभीअहामेरी बुढ़िया की भी थी पर....)
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१४३
सैणि मैंस की अड़ादड़ीनौना पुळपुळ रोंद
गर्ब भकोर्दो ज्यान अररीस मवासी खोंद
(
पति और पत्नी के कलह में सारा दुःख बच्चों को भुगतना पड़ता हैवे हमेशा मन ही मन रोते रहते हैंइसीलिए विद्वान लोग कह गए हैं कि घमंड  अहंकार प्राणों को खाता है तथा क्रोध अपने ही कुल का विनाश करता है)
Copyright @ Pritam Apachhyan ; 2016
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