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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Tuesday, September 8, 2015

आदि मानवुं मा व्यंग्य की कल्पना

Satire and its Characteristics, व्यंग्य परिभाषा, व्यंग्य  गुण /चरित्र

         आदि मानवुं मा व्यंग्य की कल्पना 

    (व्यंग्य - कला , विज्ञानौ , दर्शन का  मिऴवाक  : (   भाग   13    ) 

                         भीष्म कुकरेती 
 आदि मानव सभ्यता मा व्यंग्य कन रै होलु , कै तरां से आदि मानव  , प्रागैतिहासिक मनिख , बाबा आदम का जमानो मनुष्य व्यंग्य प्रयोग करदो रै होलु का बारा मा क्वी रिकॉर्ड नि मिल्दो किन्तु हम आसानी से कल्पना कर सकदां कि आदि मानव कै हिसाब से व्यंग्य करदो छया।  आज बि हम खासकर गांवुं मा भौत सा करतब इन करदां जु आदि मानव करदो छौ।  हम रिखाक पलटयूं घास मा रुळि  खिल्दा। हम पटाळ मा रुळि खिल्दां।   हम छौंपा दौड़ करदां।  हम आदि मानवुं तरां आज बि अयेड़ी खिल्दां।  आदि मानव की स्थिति मा माछ मारदवां।  डाळ मा चढ़िक फल तुड़दां।  आज बि रात बिर्त बगैर उज्यळो जंगळ मा , पाख पख्यड़ों मा हिट्दां। बौणम  तैडु खुदण  मा ज्वा औसंद आदि मानव तैं आदि रै ह्वेलि वा इ परेशानी आज बि मनिखौं तैं आंदि परेशानी हूंद।  भूक -तीस आज बि जंगळम  उनि लगद जन आदि मानव तै महसूस हूंदी छै।  आज बि एक मनिख एक हैंकाकि प्रेमिका या पत्नी तै भगैक /या पटैक लिजांदो जन कि आदि मानव मा आम बात छे। याने कि 'हैव्स ' अर 'हैव्स नॉट ' की गेड़ तब बि छै आज बि 'हैव्स ' अर 'हैव्स नॉट  की गेड़ च अर तुलना से ही तो व्यंग्य भाव उपजद।  याने कि आदि मानव मा व्यंग्य रै होलु। 
 माना कि रुळि खिलद एक मनिख्याणी या मनिख रौड़ी गे हो तो व्यंग्यात्मक रूप से समाजो सदस्योंन वै मनिख तै चिरड़ै इ होलु।  छौंपा दौड़ या अयेड़ी खिल्दा भौत सा इन वाकया हर रोज घटादा रै होला जब एक मनिख हैंक पर व्यंग्य कसदा रै होलु। 
 माना कि एक तागतवर मरदन बड़ो घ्वीड़ मार अर जनान्युं तै अपण पास आकर्षित कार तो अन्य मरद निराश ह्वे ह्वाल।  दुसर दिन हैंक मरदन द्वी काखड़ मारि दे हो अर ब्याळि जैन घ्वीड़ मार आज कुछ नि मारी सको हो तो वै तै आजक विजेता ना व्यंग्य्तात्मक रूप से चिरड़ै ही होलु।
  फिर इन व्यंग्यात्मक स्थिति मा मनुष्यन एक सीख बि अफिक ले होलु कि हरेकाक दिन एकी नि रौंद। 
माना कि कै तगतवर मनिखौन कमजोर तै थपड़े तो कमजोर रुण लग गे होलु।  समाजक सदस्य हौंस बि होला अर कुछ तागतवर से नराज बि ह्वे होला।  अब कुछ समय बाद कमजोरान ढुंग ले अर तागतवर मनिखौ खुट पर जोर की मारी दे।  अब तागतवर जोर से रुण लग गे हो अर कमजोर जोर जोर से ताळी पिटण लग गे हो अर हौर सदस्य भौत हंस जावन तो या स्थिति व्यंग्य की ही तो रै होलि। 
 फिर द्वी समुदायों मा प्रतियोगिता , द्वन्द या युद्ध ह्वे होल तो एक हैंक तै डराणो बान मनिख हुंकार तो भरदा हि रै होला कि ना।  कुछ हुंकार   का साथ साथ पथरों हथियार /लठल /पत्थर प्रदर्शनी बि हूंदी रै होली तो अवश्य ही व्यंग्य की भी स्थिति ऐ होली। 
इनि हम कल्पना कौर सकदां कि आदि मानव मा व्यंग्य करणो क्या क्या स्थिति ऐ होली।  हाँ व्यंग्य की स्थिति शायद वै हिसाब से नि रै होली जै हिसाब से आज हम कल्पना करदां। 
समाज बणन मा सामजिक नियम बणनम हास्य अर व्यंग्य को अवश्य हाथ रै होलु।  व्यंग्य का सामजिक नीति बणाण मा क्या हाथ रै होलु याँकि कल्पना करे सक्यांद अर वांक प्रूफ कुछ नी हमम।   



7 / 9/2015 Copyright @ Bhishma Kukreti 

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