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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, September 13, 2015

जब चिर सुंदरी भुंदरा बौ का कारण छ्वारा, बुड्या रतखुनिम नयाण मिसे गेन

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                  जब चिर सुंदरी भुंदरा बौ का  कारण छ्वारा, बुड्या  रतखुनिम नयाण मिसे गेन 
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                        चबोड़ , चखन्यौ , चचराट   :::   भीष्म कुकरेती    
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     ऊंक गां क्या तुमर विलेज मा बि इन नि ह्वे होलु जन भुंदरा बौक ससुराड़ि गौं मा ह्वे।  सरा गौं मा बूड -बुड्या परेशान कि ये गाँव तै क्या ह्वे गे।  जखम जावो तखम एकी छ्वीं ब्त्था कि अचकालो छ्वारों पर या ऋषि मुनियों बाण कन लग ! यि गांवक युवा वर्ग जखमा ब्यौ बंद वाळ युवा बि छया वी बि गौतम ऋषि तरां रतखुनि से पैलि नये धुएक तयार ह्वे जांदन।  
  किशिर याने टीनएजर्स अर युवाओं की ब्वे , बैणि अर बौ सब दुखी छया बल यूँ किशोरुं अर युवाऊँ घाम आण से पैल नयाण से अब उ अपण सुबेर सुबेर का वाकछल कर्मकांड अर स्वास -निस्वास क्रिया अर प्राणायाम से बंचित ह्वे गेन। 
जब घ्याळ दा घाम आण तक नि बिजद छौ तो अपण स्वास क्रिया ठीक करणो वास्ता घ्याळ दा कि बैणि तौळ उबर से इ धै लगान्दि छे - भैजि घाम ऐ गे , ग्विरमिलाक हूण वळ च , बिजी जा। घ्याळ दा तक वा आवाज कबि बि नि पौंछि होली पर अभ्यास का  खातिर भुलि अपण धरम निभांदि छे। 
नणद की आवाज अभ्यास से जळ भुनिक घ्याळ दाकी बौ रुस्वड़ो  द्वार तक ऐक धै लगान्दि छे - जन जलड़ि   तन डंकुळि ।  हे घ्याळु ! खड़ हो निथर तेरी ब्वेन तेरी ददिक मैत्युं तै अर म्यार मैत्युं तै गैदान की जगा गाळीदान दीण हाँ।  तब बौकि सुणन जरूरी नि छे तो घ्याळ दा पर कुछ फरक नि पड़दो छौ पर ब्वारिक तून/ताना  से घैल - घायल ह्वेकि घ्याळ दाकि ब्वे गाळी मांगळ शुरू कर दींदि छे - ये कन म्वार त्यारू ! निसिणी ह्वेन तेरि ! जा जन सियुं छे तनि सियुं रै   …। 
 इना द्यूराणीक गाळी पुराण से जळीक घ्याळ दाकी बोडी आग की भट्टी बण जान्दि छे अर वा बि अपण बेटा तै बिजाळणो धै सग्वड़ बिटेन लगान्दि छे - ये कन बिजोग पोड़ तेकुण ! खत्ता भरेन तेरि ! जा इनि सियां मा खटला मा तेरी डंडलि सज्यावो ! खड़ु हो।  अब द्यूराण याने घ्याळ दाकि ब्वै अपण गाळयूँ की स्पीड हि नि बढ़ांदि छे अपितु गाळयूं मा मर्च  बढ़ै दींदि छे अर फिर जिठाण तै ताव ऐ जांद छौ तो   वा अपण नौनु तै बिजाळणो वास्ता गाळयूँ मा अम्ल -ऐसिड की मात्रा वृद्धि कर दींदि छे।  हाँ अब गाळी अपण पुत्रों तै नि दिए जान्दि छे अपितु बच्चों का दादीक मैत या ब्वार्युं मैत वळु तै गाळी अर्पित हूंद छा।  पर ना तो घ्याळ दा अर ना ही घ्याळ दा का चचेरा भाइक कन्दूड़ गाळी पुराण का प्रवचन सुणदा छा।  द्यूराणि -जिठाणि की गाळी प्रतियोगिता से गांवक हौरि पवित्र नारी बि प्रभावित ह्वे जांद छा  अर हरेकाक घौरम गाळयूंक मांगळ लगण मिसे जांद छा।  सरा गांमा का चौक अर कुलणियूं मा गाळयूं ऋचाएं गुंजायमान ह्वे जांद छा। सरा गांमा गाळयूं ऋचाऊँ कोलाहल से डौरिक चखुल दुसर गां जिना उड़ जांद छ (हालांकि उख बि गाळी श्लोक  हवा मा तैरणा रौंद छया  )। कवियों की कल्पना रौन्दी छे कि गांवुं मा सुबेर सुबेर गौरया की चहचहाट , कोयल की कू कू अर पंछ्युँ की मधुर आवाज गुंजणि रौंद पर ये गांमा किशोर अर सबि युवाओं का देर से बिजणौ कारण हवा मा गाळी बा काटणि रौन्दि छे। 
   जख तक नयाणो सवाल च तब गांमा किशोर अर युवा अपण लिखल , जूं अर मैल से जान से बि जादा  प्रेम करदा छा तो हफ्ता द्वी ह्फ़्तौं  मा इ किशोर अर युवा पाणीम जैका नयांदा छा।  गुन्दर जन युवा बि छौ जैक शरीर का लिखल , जूं अर मैल गुंदरूक  शरीर से ऊबी  (बोर ) जांद छया किन्तु गुंदरु महीनों तक नयाणो नाम नि लींदो छौ।  गुंदरु तै गरम पाणि देखिक बि जड्ड़ु लगण बिसे जांद छौ।  किन्तु अब गुंदरु रात खुलण से पैलि नयेणो पंद्यरम पौंछि  जांद छौ।  
     पर अब कुछ दिन से गांवक सरा दिनचर्या ही बदल गे।  पाकिस्तान मा आतंकबाद खतम ह्वे जावो तो दुनिया कन आश्चर्य कारलि  ऊनि आश्चर्य सरा गाँव मा फैल्युं छौ कि यूँ किशोरों ,  युवाओं तै ह्वाइ क्या च कि रतखुनि मा इ किशोर , युवा अर कुछ प्रौढ़ बि पाणि -पंद्यर बिटेन   नये धुएक  ऐ जांदन।  गांवकी की आर्थिक स्थिति पर बि फरक पोड़ि गे छौ।  गांवमा साबण की खपत बढ़ण से हरेक गृहस्वामिनी इनि परेशान ह्वे गेन जन आज अल्लु - प्याज का भाव से गृहस्वामनी परेशान छन। किशोर तो किशोर , युवा तो युवा अब तो मड़घट जाण जोग बुड्या बि नयाणो बान रात खुलण से पैलि पाणिम,  पंद्यरम , छिंच्वड़म पौंचि जांद छा।  अब सब किशोर , युवाओं अर बुड्यों पर सुबेर सुबेर स्नान करणो रोग लग गे छौ। 
गांवकी जनानी परेशानी की स्थिति मा छे कि ऊंको गाळी ऋचाएं सुणाण से ऊंको प्रणायाम ह्वे जांद छौ अब यु प्राणायाम बंद ह्वे गे  , चिड़ियाएँ दुखी छन  कि अब गांमा जनान्युं जगा डीजे (DJ ) प्रोग्राम ऊँ तै दीण पड़नु च,  इख तलक कि  कुत्ता बिरळ  बि दुखि छन कि अब किशोर , युवाओं अर बुड्यों सुबेर बिजण से ऊँतै सुबेर सुबेर बिजण पड़द। गांव मा किशोर , युवाओं , बुड्यों का सुबेर बिजिक नयांणो प्रकरण से सामाजिक , सांस्कृतिक अर कृषि की आर्थिक  स्थिति बि बदलेणि छे। 
    कुछ दिन तो जनानी आपस मा इ छ्वीं लगाणा रैन कि गाँव मा यु भयंकर बदलाव कनै आयि अर अचाणचक सरा मरद जात इन किलै सुदरी गे।  अब जनान्युन सीबीई का सहारा ल्याई याने जासूसी कार।  
   अर जब मरद जात का सुबेर बिजण अर रोज रतखुनी से पैल पंद्यरम नयाणो   भेद खुल तो जनानी तो जनानी गांवकी गौड़ी अर भैंसी बि बेहोश ह्वे गेन। 
    ह्वै क्या छौ कि भुंदरा बौ जब बिटेन अपण ससुरास आइ तब बिटेन गांवका किशोर , यवा अर बुड्यों मा रतखुनी से पैल नयाणो आदत पड़न शुरू ह्वे गे। 
चिर सुंदरी भुंदरा बौ तै सुबेर चार बजि नयाणो की आदत हि नि छे अपितु नळ, धार  या छिंछवड़ तौळ नयाणो आदत जि पडीं छे। तो भुंदरा बौ ससुरास आणो बाद बि सुबेर उठिक पंद्यर /पाणी /पनघट जांदी छे अर मजा से नयेक ऐ जांदी छे।  किन्तु जनि किशोर युवाओं तै पता चल कि चिर सुंदरी रातखुलण से पैलि धारम नयाँदी तो स्निग्ध  , दिव्य , दीप्तमान सुंदरी तै नयाँद दिखणो इच्छा किशोरों , युवाओं मा जागृत ह्वे गे अर पैथर यु इच्छा रोग बुड्यों पर बि लग गे अर सरा गांवक मरद रतखुनी से पैल बिजण लग गेन अर नयाणो बान पंद्यरम अटकि जांद छा कि  चिर सुंदरी का गात की एक झलक इ दिखे जावो। 
 यु ठीक ह्वे कि मरद जात सुबेर बिजण लग गे किन्तु बिचारा किशोर , युवा अर बूड्यों  की स्निग्ध  , दिव्य , दीप्तमान सुंदरी तै नयाँद दिखणो इच्छा पूरि नि ह्वे साक कारण तिनि रस्तों मा भुंदरा बौका द्यूर -जगत सिंह बिष्ट , बलबीर सिंह रावत अर दिनेश बिजल्वाण बैठ्याँ रौंद छा अर जनि क्वी पाणि जिना  आवो तो यि आठ नौ सालक द्यूर धै लगै दींदा छा - ऐ गेन !  ऐ गेन !  रिक बाग़ ऐ गेन ! 
पर ना तो भुंदरा बौन सुबेर नयाण छ्वाड़ ना ही किशोर , युवा अर बुड्योंन सुबेर बिजण छ्वाड़।  गांवकी अन्य जनानी अब गाळी ऋचाएं सुणाण  से बंचित ही छन। 


(श्री सम्पूर्ण सिंह बिष्ट (डवोली , डबरालस्यूं , पौड़ी गढ़वाल द्वारा सुनाई गयी एक सत्य घटना पर आधारित )।  

  12/9  /15 ,Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai India 
*लेख की   घटनाएँ ,  स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में  कथाएँ चरित्र , स्थान केवल व्यंग्य रचने  हेतु उपयोग किये गए हैं।
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