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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Friday, September 11, 2015

मैं हिमालय बोलणु छऊँ (लम्बी कवितांश )

Modern Garhwali Folk Songs, Poems

मैं हिमालय बोलणु  छऊँ (लम्बी कवितांश ) 
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रचना --    भगवती प्रसाद नौटियाल   
 ( जन्म  - 1931, गौरी कोट , इडवाल स्यूं, पौड़ी    गढ़वाल    )
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इंटरनेट प्रस्तुति और व्याख्या - भीष्म कुकरेती 
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मैं हिमालय बोलणु  छऊँ 
क्य तुम तक म्यरि आवाज 
पौंछणी च ?
क्य बोले - बिंगेणू नी च ?
चुचों क्य ह्वे , तुमारि कन्दूड्यों  तैं 
म्यरि तरौं तुम अज्युं बुड्या नि होयें    … 
ल्या त हौर जोर   करी बोल्दौं (लरै -लरै कि बोल्द )
अरे भै ! मैं हिमालय, हिमालय  बोलणु  छऊँ
नि बींगि अज्युं बि , तब त 
तुम न त उच -कंदुड्या छ्यें न बैरा 
औड़ी कीटी तैं बण्या छैं -बैरा 
अर वांको कारण ?
कारण मैं बतांदु /गुस्सा नि ह्वेन 
म्यरा भूलों , म्यरि भूल्यों /यु कसूर तुम्हारो नी च 
कसूर च वीं रीत भौंणो /ज्व तुमन अपणै याले 
मि तैं -तुमन भुलै याले 
'चल खुट्टि कौथिगै '/तुमतैं आदत पड़गि  
मंडा , झंगोरो बाड़ी /अब क्यापि ह्वेगि 
म्यरा छा जु /वूं मन्ख्योंन , ऋषि - मुन्योन 
म्यरु मान करे , सम्मान करे 
वेद अर पुराणों मा /म्यरि स्तुति करे 
देव द्यब्तौं न /म्यरि खुगलि खुजाये 
शूरबीर , धीर अर पराक्रमी नर नार्यों न 
म्यारा अज्वल भाल पर /तिलक लगाये

..........
……
पर ह्वेकि एक रा 
अपणि भाषा अर संस्कृति को 
मान करा , सम्मान करा 
यीं धर्ती  को 
जैंका माटन 
तुम तैं 
अ , आ सिखाये 
मनिखि बणाये 
वीं तैं नमन करा 
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( साभार --शैलवाणी , अंग्वाळ )
Copyright @ Bhishma Kukreti  interpretation if any

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