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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Monday, July 7, 2014

गढ़वाली हास्य व्यंग्य लेख : जबान (हंसोड्या , चुनगेर ,चबोड़्या -चखन्यौर्या - गीतेश सिंह नेगी )

जबान 

                                                       (हंसोड्या , चुनगेर ,चबोड़्या -चखन्यौर्या - गीतेश सिंह नेगी ,मुंबई )


ना स्वाणु सरैल ना लारा लत्ता द्यखण मा मासै एक छ्वट्टि सी लुथगी , बिना हड्गी एक लुतपुति सी जान  अर नौ देखा धौं बल जबान ,स्वादै चटोर्या अर छ्वीं-बत्थौं खदान ,जब चलद त फिर रुक्दी नि अच्छा -अच्छौं छक्का छुडान्द या जबान ,सरैल चाहे कत्गे कटगुडू किल्लै ना व्हा दिल चाहे कत्गा ही मजबूत किल्लै ना व्हा पर अगर वेमा जबान ना व्हा त सब बेकार ,सैद यी बजह से जबानौ बखानळ वेद ,पुराण ,शास्त्र अर यक्ख तक की अज्कालै व्योपार -व्यवहारै ज्ञान पोथियुं का चट्टा लग्याँ छीं ,हम अज्जी तलक सोच मा प्वडयाँ छौ कि इथ्गी सी लुथगी अर इथगा मान -सम्मान ?

लोग  दाँत किटणा छीं ,आँखा दिखाणा छीं ,लड़ै -झगडा मार -पिटै कन्ना छीं ,थिंचा-थिंची हुणी च पर जबान च कि रुकणौ नौ नि लिणी , उलटा और बी चर्चरी-बर्बरी अर खीखरणयाँ हुन्दा जाणि पर एक बात हमरि समझ मा नि आणि च कि आखिर जबानौ यू भभराट -चचराट किल्लै भै ? आखिर कै खुणी कन्नी इथगा पट्गा -पट्गी या जबान ?

जब खोपड़ी घूम अर दिमागै कीड़ा-किदौला कुरंगुला कबलाण बैठीं ता हम यू सवाल लेकि अपड़ा गौंक नै -२ प्रधान झंडू दा की शरण मा चली ग्यो

भुल्ला बल जन्नि जबान तन्नि खाण

मतलब ?

 भुल्ला मतलब मीठ्ठू गिच्चळ मीठ्ठू  खाण,खट्टू गिच्चळ  खट्टू  अर कडू गिच्चळ  कडू

त भैज्जी तुम्हरू ब्वनौ मतलब च की गिच्चळ  जू बी खाण यीं पुट्गी मा जू कुछ बी जाण वू यीं लुथगी भ्वार की खाण ? मतलब  कि लोग पुट्गी बान जबान चलाणा छीं ?

बिलकुल भुल्ला लोग बरसूँ भटेय हत्थ -खुट्टौं  दगडी जबान बी चलाणा छीं तब्बि यीं दुनिया मा टिक्याँ छीं

त क्या भैज्जी जौंमा जबान नि वूंमा  क्या पुट्गी नि ? ,वू क्या खाणा नी छीं ?

ना ना भै सिन्न रुमुक्ताल बी नि च परमेश्वरै यक्ख ,वू या त चुप रैकि खाणा छीं या फिर हैंन्का जबानी सारु फर भरोसू कैकी कुछ ना कुछ जरूर खाणा छीं ,भुखी कुई नि म्वन्नु यक्ख ,
कुछ लोग त इन्ना बी छीं भुल्ला यीं दुनिया मा जू चुप रै की बी खूब खाणा छीं ,समझि ल्यावा वू चुप रैणक नौ फर ही खाणा छीं

अच्छा दिदा !  मी ता सोच्दु की चुप रैण वल्ला बस दुनिया मा सिरफ़ गालि खाणा छीं ,म्यार हिसाबळ त भै जबान चलाण वल्ला आज गौं-बिलोक , सरकार अर ये देश थेय चलाणा छीं ,जौंकी जबान चलणी च वूंकी सब्बि जग्गह चलणी च ,लोग जबान चलै -२ की आज सरकार अर दुनिया तक चलाणा छीं ,बिना जबानै त ये देश मा सरकार बी ढंग मा नि चलदी फिर जिंदगी कन्नक्वे चलण
,यकीन नि व्हा ता अपड़ा "मन्नू ब्वाडा " थेय पूछी लियां पर भैज्जी एक बात समाज नि आणि ?
 
क्या ?

जब जबान पुट्गी बान चलणी च त फिर लोग अप्डी जबान कैथै किल्लै दे दिन्दी ? किल्लै राजा दशरथळ अप्डी जबान द्याई ,किल्लै  माभारत मा भीष्म पितामळ मत्स्यराज से लेकि अम्बा  अर धृतराष्ट्र थेय अप्डी जबान द्याई?

त भुल्ला सुण -सच बात या च कि आज तलक जैल बी अप्डी जबान कैथै द्याई वेल अप्डी निखणी अफ्फी कार ,राजा दशरथळ अप्डी जबान दे त द्याई पर दिणा बाद वुंकि क्या कु दशा व्हेय यु ता तुम थेय पता ही च दागडा दगडी भुगतण प्वाड हमरा रामचंद्र जी अर सीता माता थेय ,जबान दिणा मा त बिचारा भीष्म पितामा कब्बि पैथर नि राई पर वीं जबान की सजा वुन्थेय अप्डी आखिर सांस तक भोरण प्वाड कि ना ?
अर आखिर मा क्या मिल , कुछ ना कत्त ,अर सुण जबान  दिणा मा सदानि पैलू नम्बर यूँ देब्तौं कु रै एक तरफ़ा यी जै कै थेय पैली आँखा बुझिक जबान दिणा रैं
अर बाद बाद  मा जब  युंका सत्ता का चूल हिलण बैठी ग्यीं त यून्ल जबान लींण वल्लै मूण गिडौंण मा बी देर नि कारी अर बदल मा क्या मिल -देबासुर  संग्राम

त भैज्जी आपक मतलब जबान दिणु ठीक नी ? पर मिल त सुण या दुनिया  जबान फर ही टिकीं च ?
हम त छुटम भटेय यी पढ़ना छौ -
                                                 "रघुकुल रीति सदा चली आयी ,प्राण जाई पर बचन ना जाई "

देख भुल्ला समझदार आदिम वू हुन्द जू बग्ता हिसाबळ स्वचद अर चलद ,अगर बचन देकि प्राण बी दिण प्वडदीं ता इन्नु बचन देकी कुई फैदा नि ,
भै अज्कालै हिसाब से ज़रा यीं लैन फर सोच विचार करीला ता तुमल अफ्फी ब्वलण -
                      
                                               "रघुकुल रीति रघुकुल ही रयाँ ,प्राण बचौण त सौं-बचन नि  ख्याँ "

अर एक बात टक्क लग्गैकि सुण भै -पैली ता तू अपड़ा बेसिक "कांसेप्ट " दुरुस्त कैर , या दुनिया जबान फर नी चलणी ,सच्ची बतौँ ता इथगा बड़ी भारी दुनिया मासै एक छवट्टि सी लुथगी सार टिक बी नि सकदी चलणा बात त रै दूर

अच्छा ता भैज्जी फिर या दुनिया कन्नक्वे  चलणी  चा ?

भुल्ला दुनिया जबान से नि बल्कि जबानौ बग्त-बग्त पलटैंण फरकैंण से चलणी   च ,संसार मा जत्गा दा जबान दीये ग्याई वे से कै हजार लाख करोड़ दा या जबान रिबिड -रैडी -चिफलिक पलटे ग्याई ,जबान पैल्ली बी पलटैणी छाई ,आज बी पलटैणी  च अर ऐथर बी बग्त- बग्त इन्नी पलटैणी रैली ,जबान से पलटण मा जबान थेय भन्डिया कष्ट ना व्ह़ा सैद इल्लै ही परमेश्वरळ जबान लुतलुती अर बिना हड्गै बणे  ताकि मौका आण फर जबान झट से पलट साक ,वा जबान ही क्या जू पलटै नि सकदी ,जबानै  असल शान पलटैण मा ही च ,अगर आज जबान कुछ जादा ही पलटैणी   च ता या मा जबानौ  दोष कम अर भगवानै दोष जादा च ,जबान कु फैदा सिरफ़ अर सिरफ़  पलटैंण  मा ही च , इल्लै मी बोल्दु की जत्गा व्हेय साक अप्डी जबान द्यावा अर मौक़ा आण फर जबान थेय पलटैंण द्यावा पर गलती से बी जबान फर टिक्याँ नि रावा ,

यु ही  अज्कालै  जबानौ कर्म अर यु ही वीन्कू कलजुगी धर्म  च


पर भैज्जी सवाल यो च की अगर आज एक दौ फिर जबान पलटैंण से मुकर जा या फिर वीं फर हड्गी अै जाव त क्या हुंदू  ?

हूँण क्या च भुल्ला -पैली  त वींकि हडगी तोडे जान्दी फिर या त जबान काटिक हत्थ मा धरै जांदी या फिर क्या पता से जबान भैर खैंचे जान्दी

पर भैज्जी लोग त बुल्दिन कि जबान सम्भालिक रखण चैन्द नथिर.........

भुल्ला दुनियक गिच्चौ फिकर नि कैरा कैर उन बी भगवानै जबान दीं ही चलाणा खुणि च अर फिर जबान चलाण मा  गिच्चा बुबौ क्या जान्द  ?



Copyright@ Geetesh Singh Negi ,Mumbai  04/06/2014 

*कथा , स्थान व नाम काल्पनिक हैं। 

[गढ़वाली हास्य -व्यंग्य, सौज सौज मा मजाक  से, हौंस,चबोड़,चखन्यौ, सौज सौज मा गंभीर चर्चा ,छ्वीं;- महर गाँव निवासी  द्वारा  जाती असहिष्णुता सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; कोलागाड वाले द्वारा   पृथक वादी  मानसिकता सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मल्ला सलाण  वाले द्वारा   भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; पोखड़ा -थैलीसैण वाले द्वारा  धर्म सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;पौड़ी गढ़वाल वाले द्वारा  वर्ग संघर्ष सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; उत्तराखंडी  द्वारा  पर्यावरण संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मध्य हिमालयी लेखक द्वारा  विकास संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;उत्तरभारतीय लेखक द्वारा  पलायन सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; मुंबई प्रवासी लेखक द्वारा  सांस्कृतिक विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; महाराष्ट्रीय प्रवासी लेखकद्वारा  सरकारी प्रशासन संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; भारतीय लेखक द्वारा  राजनीति विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; सांस्कृतिक मुल्य ह्रास पर व्यंग्य , गरीबी समस्या पर व्यंग्य, आम आदमी की परेशानी विषय के व्यंग्य, जातीय  भेदभाव विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; एशियाई लेखक द्वारा सामाजिक  बिडम्बनाओं, पर्यावरण विषयों   पर  गढ़वाली हास्य व्यंग्य, राजनीति में परिवार वाद -वंशवाद   पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ग्रामीण सिंचाई   विषयक  गढ़वाली हास्य व्यंग्य, विज्ञान की अवहेलना संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य  ; ढोंगी धर्म निरपरेक्ष राजनेताओं पर आक्षेप , व्यंग्य ,अन्धविश्वास  पर चोट करते गढ़वाली हास्य व्यंग्य  श्रृंखला जारी ]