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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Tuesday, September 29, 2009

"तू बिराणी चीज"

क्या तरसेण त्वै फर,
प्यारी सुवा तू,
जन, नारंगी की दाणी,
चोळी तरसदी जन,
बोदि, सरग दिदा पाणी.

धणिया कू बीज सुवा,
धणिया कू बीज,
मन तरसेणु त्वै फर,
तू बिराणी चीज.

लगल्यौं कू झाड़ सुवा,
लगल्यौं कू झाड़,
जू होन्दि तू मेरी सुवा,
घुमौन्दु पहाड़.

जै भागी की होलि तू,
पराणु की प्यारी,
खुश होलु त्वै तैं हेरि,
दुनिया मा न्यारी.

रंग रूप यनु तेरु,
जन बुरांश कू फूल,
मन मेरु रंगमत,
गयौं अफु भूल.

होंसिया उमर तेरी,
होलि सोळा साल,
त्वै जनि नि देखि मैन,
कुमौ गढ़वाल.

धणिया कू बीज सुवा,
धणिया कू बीज,
क्या बोन्न लठ्याळि,
तू बिराणी चीज.

(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
निवास: संगम विहार, नई दिल्ली
24.9.2009, दूरभास:9868795187
E-Mail: j_jayara@yahoo.com