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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Tuesday, March 17, 2009

गढवाली लोकोक्तियाँ व मुहावरें (औखाँण, औखाण ): भाग-३

इसी श्रृंखला में कुछ और गढवाली औखाणे लेकर आपके समक्ष प्रस्तुत हुआ हूँ ।

  • धुये धुये की ग्वरा, अर लगै लगै की स्वरा नि होन्दा ।
  • कौजाला पाणी मा छाया नि आन्दी ।
  • अपड़ा लाटा की साणी अफु बिग्येन्दी ।
  • बड़ी पुज्यायी का भी चार भांडा, छोटी पुज्यायी का भी चार भांडा ।
  • अपड़ा गोरुं का पैणा सींग भी भला लगदां ।
  • साग बिगाड़ी माण न, गौं बिगाड़ी रांड न ।
  • कोड़ी कु शरील प्यारु, औंता कु धन प्यारु ।
  • जन त्येरु बजणु, तन मेरु नाचणु ।
  • ना गोरी भली ना स्वाली ।
  • राजौं का घौर मोतियुं कु अकाल ।
  • जख मिली घलकी, उखी ढलकी ।
  • भैंसा का घिच्चा फ्योली कु फूल ।
  • सब दिन चंगु, त्योहार कु दिन नंगु ।
  • त्येरु लुकणु छुटी, म्यरु भुकण छुटी ।
  • कुक्कूर मा कपास और बांदर मा नरियूल ।
  • सारी ढेबरी मुंडी मांडी, अर पुछ्ड़ी दाँ न्याउँ (म्याउँ) ।

सन्दीप काला

उत्तराखण्ड, भारत ।
मैं सन्दीप काला आप सभी का अपने ब्लोग मे स्वागत करता हूँ । मैं इस ब्लोग के माध्यम से उत्तराखण्ड की संस्कृति, संगीत व सौन्दर्य से आप लोगो को अवगत कराने का प्रयास कर रहा हूँ । इस प्रयास मे अगर किसी के व्यक्तिगत भावो को ठेस पहुँचे तो मै क्षमा का प्रार्थी हूँ । धन्यवाद ।