उत्तराखंडी ई-पत्रिका की गतिविधियाँ ई-मेल पर

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

Tuesday, March 17, 2009

गढवाली लोकोक्तियाँ व मुहावरें (औखाँण, औखाण ): भाग-१

उत्तराखंड में लोकोक्तियों व मुहावरों का बहुत प्रचलन है । आम बातचीत में रस व प्रभाव डालने के लिये इनका प्रयोग किया जाता है । गढवाली भाषा में इन्हें ’औखाण’ बोला जाता है ।

मैं समय-समय पर आपके समक्ष गढवाली औखाणे प्रस्तुत करने का प्रयास करुगाँ ।
इसी श्रृंखला में कुछ औखाणें प्रस्तुत कर रहा हूँ, जिसमे कुछ मेरी स्वयं की जानकारी से हैं और कुछ अन्य श्रोतो से संग्रहित है ।


  • दान आदिम की बात और आँमला कु स्वाद, बाद मा आन्दु ।
  • गैथ त म्यार यख भी होन्दी , पर डाली का ६ स्येर यखी सुणी ।
  • ब्वे कु दूध पिकतै नि हुवे, त अब बुबा कु घुंडा चुसिक होन्दु ।
  • बान्दर का मुंड मा टोपली नि सुवान्दी ।
  • मि त्येरा गौं औलू क्या पौलू,तु मेरा गौं औलू क्या ल्यालु ।
  • थूका आंसू लगाणा छन, मूता दिवा जगाणा छन ।
  • भेल़ लमड्यो त घौर नी आयो, बाघन खायो त घौर नी आयो।
  • ढेबरि मरिगे, गू खलैगे।
  • नि खांदी ब्वारी , सै-सुर खांदी ।
  • भैर तालु, और भितर बिरालु ।
  • ब्वारी बुबा लाई बल अर ब्वारी बुबन खाई ।
  • जु पदणु गीजि जालो, उ हगणु केकु जालो।
  • रांडो नाक जु नि होन्दू त गू भी खै जांदी ।
  • झूटा सच्चा पितर, गया जैकी दिखेला।
  • कना कना कख गैन, मुसा का छुवरा जवाण हुवेण ।
  • होंदा ही ग्यों , त रोंदा ही क्यों ।
  • उछलि उछलि मारि फालि, कर्म पर द्वी नाली।
  • अकल का टप्पु, सरमा बोझा घोड़ा मां अफु।
  • सौण मरि सासू, भादो आयां आंसू।
  • जु नि धोलो अफड़ो मुख, उक्या देलो हैका तैं सुख।
  • पढ़ाई लिखाई बल जाट, अर १६ दुनी आठ ।
  • करमा दु:ख, घ्यू कु साग ।
  • सुबेरी मुक धोयुँ और बाबु ब्यों करयूँ काम औंदी ।
  • बिरालु मरयूं सबुन देखी, दूध खत्युँ कैन नि देखी ।
  • भिंडि बिराल्युं मा मुसा नि मरियेंदन।
  • जै गौ जाण ही नी, वे गौं कु बाठु क्या पूछण ।
  • मैं राणी, तू राणी, कु कुटलु, चीणा दाणी ।
  • पठालु फ़ुटु पर ठकुराण नी उठु
  • पढिय़ुं फ़ारसी, बेचणु तेल ।
  • जख कुखड़ा नि होन्दा, तख रात नि खुल्दी ?
  • तुम्हारा जौं, तुम्हारो जन्द्रौ।
  • पौ ना पगार, भजदम हवलदार
  • बिगर अफ़ु मरयां, स्वर्ग नि जयेन्दु ।
  • मै लगान्दु आगरा की, राडं लगान्दी घागरा की ।
  • पैंसा नि पल्ला, दुई ब्यो कल्ला ।
  • पिली त अपनी बाणी, नितर लाता की बाणी सही ।
  • तिम्लेया तिम्ली खत्येणी, नांगियां नांगी दिख्येणी ।
  • कख उमड़े कख बरखें।
  • जुलखी धुई, घिच्ची उई ।
  • एक कुंडी माछा, नौ कुंडी झोल ।
  • गोणी अपड़ु पुछ छोटु ही दिख्येन्दु ।
  • सासु बोल्दी बेटी कू , सुणान्दी ब्वारी कू ।
  • फाडू मुंड, अफ़ु नि मुंड्येन्द ।
  • लुखु की साटि बिसैंई, म्यारा चौंल बिसैंई ।
  • हैका देखी लैरी पैरी, अफड़ि देखि नांगी , म्यारा बाबु की मत्ति गये, मीकु स्ये नि मांगी।

सन्दीप काला