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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Tuesday, March 17, 2009

"फ्योंलि"

फागुण बितिक चैत ऐगि...पहाड़ मां "फ्योंलि" अपणा मैत आयिं होलि. परदेस मां कखन देखण प्यारी फ्योंलि.

"फ्योंलि"

फागुण मैना फ्योंलि फूलिं,
अयिं छ अपणा मैत,
फुलारी वींतै घौर ल्हिजाणि,
लगिगी मैनि चैत.

पय्याँ बिचारू झक्क फुल्युं छ,
हेन्न लग्युं छ फ्योंलि,
पिंगळा रंग मां रंगि फ्योंलि,
लगणी जन ब्योलि.


साख्यौं बिटि प्यारा पहाड़,
औन्दि जान्दि फ्योंलि,
पाख्यौं पिंगळि बणिक बैठि,
लग्दि जन हो ब्योलि.


बिना फ्योंलि का प्यारा पहाड़,
ऐ नि सकदु मौळ्यार,
फुलारी दैळ्यौं मां फ्योंलि चढ़ौन्दि,
ज्व फैलौन्दी छ प्यार.



(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिग्यांसु"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
निवास:संगम विहार,नई दिल्ली
(17.3.2009 को रचित)
दूरभाष: ९८६८७९५१८७