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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, November 11, 2015

भाजपा की हार और वरिष्ठ नेताओं की तकरार

चबोड़ , चखन्यौ , चचराट   :::   भीष्म कुकरेती    
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धृतराष्ट्र - संजय ! आज कुरुक्षेत्र युद्ध का अठों दिन खतम ह्वे गे।  म्यार पुत्रों न युद्ध मा क्या पाई , क्या खोई की कमेंट्री तो सुणा। 
संजय -महाराज ! दिख्युं आँख क्या दिखण अर तप्युं घाम क्या तपण ?
धृतराष्ट्र - मतलब आज बि दुर्योधन की सेना जीत नी च। 
संजय -ना माराज ! उल्टां आज कौरव सेना भौत बुरी तरां से हारी।  इथगा करारी हार कि भीष्म पितामह अर द्रोणाचार्य जन जिताऊ जोधा बि शरमाणा छन। 
धृतराष्ट्र - अब तो स्याम ह्वे गे।  हमर सेनापति लोग अपण शिविर मा क्या करणा छन ? जरा अपण दूरदर्शी नजर से मि तै बतादी। 
संजय -महाराज नि सूणो बल कौरव शिविर मा क्या हूणु च। 
धृतराष्ट्र - उंह ! यथार्थ तै सुणण अर भुगतण मेरी नियति च।  तू सच बता। 
संजय -हार का बाद जु हूंद ऊनि कौरव शिविर मा बि हूणु च। 
धृतराष्ट्र - क्या मतलब ? क्या कौरव सेनापति हार का इल्जाम एक हैंक पर लगाणा छन ? हार का ठीकरा एक दुसर की बेज्जती करणो बान प्रयोग करणा छन ?
संजय -हाँ माराज। हार से लथपथ , बेज्जत ह्वेका   अति क्रोध मा सम्राट दुर्योधन ,अंगद राज कर्ण अर गुरु पुत्र अश्वथामा पितामह भीष्म का शिविर मा गेन जख गुरु द्रोणाचार्य अर शल्य बि उपस्थित था। 
धृतराष्ट्र - फिर उख क्या  क्या वार्तालाप ह्वे ? सच सच बताओ दूरदर्शी संजय। 
संजय -ल्या हार का बाद भीष्म का शिविर का आंख्युं दिख्युं हाल क्या कुहाल द्याखो। 
दुर्योधन , कर्ण अर अश्वथामा (अति क्रोध मा एक साथ ) - पितामह भीष्म अर गुरु द्रोणाचार्य ! आठ दिनों की हार का बाद आप क्या करणा छंवां ?
द्रोणाचार्य - हम तिनि हार का कारणों की सूक्ष्म समीक्षा करणा छंवां। 
कर्ण (अट्टहास अर बेज्जती करदारी भाषा मा ) - वाह ! जु सेनापति हार का असली कारण छन , जौंकी जईं -बितीं रणनीति हार का कारण च , जौंकी बकबास नीति से कौरव सेना हार वी कौरव सेना का हार का कारणों की समीक्षा करणा छन ? आप दुयुं तैं सेनाध्यक्ष अर सेनापति पद छुड़ण चयेंद। 
शल्य - कर्ण ! बकबास बंद। 
अश्वथामा - इकमा राधेय  कर्ण क्या गलत बुलणा छन ? हार ह्वे तो सेनाध्यक्ष अर सेनापति तै पद छुड़न ही चयेंद। 
शल्य -  गुरु अश्वथामा ! पता च कि ना कि गुरु द्रोणाचार्य तुमर पिताश्री छन ?
अश्वथामा - राजकरणी मा जीत पिता -पुत्र का संबंधों से अधिक महत्वपूर्ण हूंद। 
कर्ण -सम्राट दुर्योधन ! हार का कारण से तुम अब्याकि अबि पितामह भीष्म अर गुरु द्रोणाचार्य तैं पदविहीन कारो। 
शल्य - वाह बाप ना मारे मेंढकी अर पुत्तर का नाम कमाल !
कर्ण -क्या मतलब ?
शल्य - जब से तू नराधम , वर्णशंकर दुर्योधन का साथ ऐ तब से आज तक पता च तू  तीन दै वृहद युद्ध हारी , दस दै मध्य युद्ध हारी अर भौत दै धनुर्धारी अर्जुन का डौरन युद्धस्थल से भागिक ऐ।  क्या सम्राट दुर्योधनन त्वे तै राजसभा से भैर कार ?
अश्वथामा - शल्य जी ! भूतकाल की बात से आज का युद्ध का संबंध नी च।  आज यी द्वी महारथी , अतिरथी पराजयी योद्धा छन तो यूँ तैं अपण पद छुडन ही चयेंद। 
शल्य - नराधमों ! जब क्वी समूह -समाज हारदो च त वै समूह का सदस्यों मा और अधिक मेलमिलाप हूण चयेंद , एक दुसर से अधिक सौहार्द बढ़ाण चयेंद , एक हैंक से कंधा से कंधा मिलैक काम करण चयेंद , सामूहिक यश -अपयश का भागीदार बणन चयेंद।  हार का बाद  सब्युंक समिण एक हैंकाक धोती नि खुलण चयेंद। पिछली हार से अपण स्वार्थ सिद्धि छोड़िक भविष्य की रणनीति पर जोर दीण चयेंद। 
गुरु द्रोणाचार्य - हा हा आ !
शल्य - गुरु द्रोणाचार्य ! क्या मीन कुछ गलत बोली दे ?
गुरु द्रोणाचार्य - ना ना ! तुमर बात एकदम सही च किन्तु    
शल्य - फिर आपका यु अट्टाहास ?
गुरु द्रोणाचार्य - सब ये आदर्श से सहमत हून्दन कि हार का बाद एकजुटता ही असली जड़ी -बूटी च किन्तु भविष्य मा भी अनुभवशील विचारक ये पथ पर नि चौलल। 
शल्य - मतलब ?
गुरु द्रोणाचार्य - इनि कलियुग मा असूज , संबत 2072 (AD 2015) मा बिहार विधान सभा चुनाव मा भारतीय जनता पार्टी चुनाव हारली अर भाजपा का जन्मदाता , पोषक , पित्र रूपी योद्धा खुलेआम अपण स्वार्थ, राजनैतिक महत्वाकांक्षा अर वर्चस्व का खातिर अपणी राजनीतिक दल की खुलेआम छिछलेदारी कारल। नेपथ्य से भैर आणो लालसा मा अपणी लगाईं डाळी ही तै काटणो बान भौत सा अथक प्रयत्न कारल। 
शल्य - यूंक नाम ?
गुरु द्रोणाचार्य - लालकृष्ण आडवाणी , मुरली मनोहर जोशी अर यशवंत सिन्हा ! 





12/11/15 ,Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai India 
*लेख की   घटनाएँ ,  स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में  कथाएँ चरित्र , स्थान केवल व्यंग्य रचने  हेतु उपयोग किये गए हैं।