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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, December 5, 2012

पहाडी गावों में गोबर गैस से अनेक फायदे !


डा बलबीर सिंह रावत 

    (उत्तराखंड में आधुनिक मानवीय सुविधाए;, ग्रामीण उत्तराखंड में आधुनिक मानवीय सुविधाए;,  गढ़वाल में आधुनिक मानवीय सुविधाएं; पौड़ी गढ़वाल में आधुनिक मानवीय सुविधाए;, रुद्प्रप्रयाग में आधुनिक मानवीय सुविधाए; चमोली में आधुनिक मानवीय सुविधाए; टिहरी गढ़वाल में आधुनिक मानवीय सुविधाए; उत्तरकाशी में आधुनिक मानवीय सुविधाए; ग्रामीण देहरादून में आधुनिक मानवीय सुविधाए;, नैनीताल में आधुनिक मानवीय सुविधाए;, उधम सिंह नगर में आधुनिक मानवीय सुविधाए;, अलोमोड़ा में आधुनिक मानवीय सुविधाए; चम्पावत में आधुनिक मानवीय सुविधाए; रानीखेत में आधुनिक मानवीय सुविधाए; द्वारहट में आधुनिक मानवीय सुविधाए; पिथोरागढ़ में आधुनिक मानवीय सुविधाए;, पहाड़ो में आधुनिक मानवीय सुविधाए लेखमाला ]                  
 
                       गोबर को सड़ाने से ज्वलनशील, मीथेन (नेचुरल) गैस उत्पन्न होती है जिसके उपयोग सफलता से, कमरों में रोशनी के लिए, रसोई में खाना बना ने, डीजल या पेट्रोल के इंजन चलाने के लिए आसानी से किया जा सकता है। अब तो इसका महत्व और भी बढ़ता जाएगा जब तरल पेट्रोलियम गैस के दाम लगातार बढ़ते जायेंगे . एक परिवार की रसोई ईंधन की आवश्यक्ता के लये 55-60 किलो ताजे गोबर की आवश्यकता होती है। एक 450 किलो वजनी संकर गाय दिन में लगभग 25 किलो गोबर निकालती है। अगर दूध की बिक्री करने वाले परिवार अपनी गायों को खूंटे पर ही चारा खिलाते हैं तो 2 गायों से प्रयाप्त गोबर मिल सकता है। छोटी गायो से कम गोबर होगा तो 3 या 4 गायों के गोबर की जरूरत होगी। जहां जानवर चराने के लये जंगल ले जाए जाते हैं, वहाँ केवल रात का ही गोबर उपलब्ध होगा तो उसी हिसाब से 60 किलो गोबर प्रतिदिन हो या फिर कम गैस से ही काम चलाना होगा।

                            गैस बनाने के लिए एक संयंत्र लगाना होता है। 60 किलो गोबर को घोलने के लिये 250-300 लीटर पानी की जरूरत पड़ती है। यानि कुल 350 लीटर पति दिन, गोबर को पूरी तरह सड़ने के लिए 25-30 दिन लगते हैं तो गड्ढे में 11-12 हजार लीटर को रखने का आकर होना जरूरी है, इस को एक गोला कार टंकी की तरह सीमेंट से चुनाई करके, दो भागों में , बीच में दीवार से अलग अलग दो चैम्बर (ठन्डे पर्वतीय इलाकों में बीच में गोला कार चम्बर बनाना उचित रहता है क्योंकि गोबर के औक्सीजन रहित सडाव के लिए गर्माहट चाहिए जो सड़ने से पैदा होती रहती है, ओह सुरक्षित रह सके) यह प्लांट का डायजेशन चैम्बर होता है जिसने गोबर मिश्रण चैम्बर से पाइप द्वारा सीधे तल में, सबस से नीचे, छोड़ने का प्रावधान किया जाता है। दुसरे चैम्बर से सडे तरल की निकासी का पाइप, ऊपरी भाग से बाहर खाद के गढ़े में डाला जाता है।। गोबर मिश्रण चैम्बर गड्ढे से अलग, सट कर ऐसे ऊंचे पर बनाना होता है की प्लग खोलते ही सारा मिश्रण अपने आप डायजेशन चैम्बर में चला जाय। गोबर का मिश्रण हाथ से या एक हस्त चालित चरखी से किया जा सकता है।

बनती हुयी गैस तो जमा करने के लिए स्टील का बड़ा डोल9-10 हजार लीटर का बना कर गोबर सढाने वाले गड्ढे के उप उल्टा रखा जाता है। इस स्टील गुब्बारे के शिखर पर एक 1-1/2 इंच का कुहनी आकर का वाल्व युक्त पाइप वेल्ड करके रक्खा जाता है। इस पर प्लास्टिक, रबर की पाईप लगा कर गोबर गैस को उपयोग के स्थान ले जाया जाता है। चूंकि गैस के साथ साथ पानी की भाप भी उठती है और यह गैस पाइप में पानी बन कर जमा होती रहती है, तो सबसे निचले स्थान पर मैं पाइप लाइन पर एक वाटर ट्रैप , निकास वाल्व का प्रावधान भी करना उचित रहता है। गोबर गैस की रौशनी और चूल्हे की उपलब्धि तो है इसलिए प्रबंध समय से करलेना ठीक रहता है। नए संयंत्र से उपयोग के लिए गैस 15 दिनों में मिलने लगती है और फिर लगतार मिलती रहती अहि।
गोबर गैस संयंत्र को लगाने के लिए खादी और ग्रामीण उद्द्योग बोर्ड से मार्ग दशन, स्थापित करने में सहायता और सरकार से दी जाने वाली सब्सिडी का प्रावधान होता है। अपने ग्रामम प्रधान से सूचना लीजिये।

इस संयंत्र के लिए पर्याप्त जमीन की जरूरत होती है जो घर के नजदीक हो त्ताकी गैस के पाइप लम्बे (महंगे) न हों और गोबर को छानी से दूर तक उठा कर न ले जाना पड़े। जिनके पास ऐसी सुविध्हये हिएँ वोह इस संयंत्र को, जानकारों की देदेख रेख में अवश्य लग्वायं
सलाह कार :
डा बलबीर सिंह रावत।  dr.bsrawat28@gmail.com
 
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