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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, January 13, 2010

मी मु टाइम नी ( मकर संक्रांत )

जनी टेलीफोनी घंटी बजी , मनिखी मरा दादिल फोन उठै की बोली .." हां को च ?" हैकि तरफ बीटी आवाज आई ... " मी छो बुनू, मी ...! " मी कु ---उ ?" सरू छो बुनू सरू ..?? कदुड बीटी रिसिबर हटे की वे थाई देखि व बुन बैठी .." य बोई , कदुड नि सुणी होली .." उची आवाज माँ जोर जोर से बुन बैठी .. सरू छो सरू ......उ..... /// समनी बीटी दादी बोली इतगा जोर लगानै क्या जरूरत च ! कनु बैरी छो मी ! .. हां, बोल.. खूब छई ?

हां खूब छो ! माँ बोली .. लाटी , आज मकर संक्राद च .. मी तेरी बाट छो जग्वाल लू ! तेरी सोंज्यडय भी नि ऐनी एसू का साल ! व बोली .. माँ मिमु टाइम नि ! इन कैर की त्वी ऐजा ! मिन टिकट भेजियाली ! पर बाबा .. ब्य्टुला आदा च छा अपना मैत, इनु रिवाज छो आज तक !सरू बोली .. टैम २ बात च बोये ... बगत बदली गे ! बोलियल ना मिमु टैम नी ! त्वी ऐजा बस !

पराशर गौर
सुबह ९.३० पर २०१०