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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Friday, July 10, 2009

कै गौं की छैं तू

नाक मा नथुलि, गौळा मा हंसुळि,
लम्बी धौपेंलि तेरी,
त्वै तैं देखि, रग बग होंणी,
सुरम्याळि आँखी मेरी....

तेरी स्वाणि मुखड़ी, जोन सी टुकड़ी,
हाती खुट्टी छन गोरी,
मठु मठु हिटदि, मुल मुल हैंसदि,
तू छै चाँद चकोरी.....

त्वै देखि लोग, यनु बोंना छन,
तू लगणी छैं रूप की राणी,
तेरु मिजाज, छलैया भारी,
रंग रूप की स्वाणि.....

रंग रूप तेरु, कख बिटि ल्ह्याई,
लगणी छैं चाँद चकोरी,
त्वै मेरा सौं, सच बतैदि,
कै गौं की छैं तू छोरी.....

(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिग्यांसू"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
3.7.2009