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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Friday, July 10, 2009

कौंताळ

सैडा गौं मा मच्युं छ,
छोरों कू कुजाणि किलै,
देखि त धध्यौणा छन,
बांदरू की डार,
जू अयाँ छन आज गौं तक,
सैलि सगोड़ी सफाचट्ट कन्न का खातिर,
धारू धारू मान्ना फाळी,
कूड़ों मा,खल्याण मा,डाळ्यौं मा.

छोरा हैन्सी हैन्सिक बोन्ना,
आज धध्ये द्यौला हरामी बांदरू सनै,
अपणा गौं सी दूर,
सफाचट्ट करयालि यून,
सब्बि धाणी, यख तक कि,
भीतर बीटि खाण कि भांडी,
ऊठैक ल्हिजाणा छन.

खुश होंणा छन छोरा,
अर कना छन "कौंताळ",
बांदरू का पिछनै भागी भागिक,
कंटर बजैक अर हाथ मा मशाल,
हबरी पटाखा फोड़ना छन.

(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिग्यांसू"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
7.7.2009