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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Monday, July 20, 2009

मनभावन वर्षा’




मुरझाये पौधे भी खिल उठते
जब काले बादल बरसाते पानी,
आह! इन काली घटाओं की रहती
अपनी अजब- गजब की मनमानी।
देख बरसते बादलों को अपने ऊपर
मलिन पौधे भी प्रफुल्लित हो जाते हैं,
ज्यों बरसाये बादल बूंद- बूंद
त्यों नित ये अद्भुत छटा बिखेरते हैं।
अजब- गजब के रंग बिखरे
इस बर्षा से चहुंदिशि फैले हरियाली,
जब उमड़- घुमड़ बरसे बदरा
तब कितनी मनमोहक दिखती डाली!
आह! काले बादलों वाली बर्षा
तू भी क्या- क्या गुल खिल देती है,
बूंद - बूंद बरस- बरस हरदम
मलिन पौधों को दर्पण सा चमकाती है।
ये घनघोर काली घटाएं तो
बार- बार बरसाये बरसा की बौछारे
बरसकर भर देते मनउमंग तब
जब घर ऊपर घिर- घिर आते सारे।
धन्य - धन्य! वे घर सारे
जिनके ऊपर बरसे ऊपर का पानी,
धन्य- धन्य हैं वे जीव धरा पर
जिनको नित फल मिलता है मनमानी।
कैसे - कहें कहां - कहां कब - कब
बरस पड़े यह काले बादलों का पानी!
धन्य हे ‘मनभावन वर्षा’ तू!
तेरी अपार अभेद अरू अमिट कहानी।

©2009 कविता रावत